बाजरे की खेती : बाजरे की पैदावार बढ़ाने का सही तरीका होगा दोगुना उत्पादन

पोस्ट -06 दिसम्बर 2022 शेयर पोस्ट

बाजरे की खेती के लिए सही तकनीक, होगा दोगुना उत्पादन

भारत में बाजरे की खेती बहुत प्राचीन काल से होती आई है। यह एक ऐसी फसल है, जो विपरीत परिस्थितियो एवं सीमित वर्षा वाले क्षेत्रो तथा बहुत कम उर्वरको की मात्रा के साथ अन्य फसलों के उत्पादन के विपरीत बहुत बेहतर उत्पादन देती है। ऐसे क्षेत्रों में में सबसे ज्यादा बाजरे की खेती होती है। लेकिन भारत में बाजरे की खेती अनाज फसल और हरे चारे के रूप में की जाती है, अन्न के लिए नहीं। पशुओं के चारे के रूप में बाजरे के सभी भागों का इस्तेमाल किया जाता है। बाजरा कम वर्षा वाले क्षेत्र में अनाज तथा चारा दोनों के लिए बोई जाती हैं। बाजरा की फसल दो प्रकार की होती है, एक रबी, दूसरी खरीफ। इसकी खेती सिंचित और असिंचित दोनों जगहों पर की जा सकती है। भारत में बाजार की खेती खरीफ की फसलों के साथ में की जाती है। बाजरा गरीबो के लिए उर्जा, प्रोट्रीन विटामिन एवं मिनरल का मुख्य श्रोत है। इसकी रोटी गेहूं की रोटी से भी ज्यादा फायदेमंद होती है। आटा विशेषकर भारतीय महिलाओ के लिए खून की कमी को पूरा करने का एक सुलभ साधन है। इसकी रोटियां लोगों को ताकत देती हैं। गेहूँ एवं चावल से, बाजरा आयरन एवं जिंक का एक बेहतर श्रोत है। व्यापारिक तौर पर बाजरा गेहूं से महंगा बिकता है। और इसकी खेती से किसानों को दोहरा लाभ मिलता है। इसके पौधे को हरे रूप में कई बार काटा जा सकता है। जिससे पशुओं के चारे की समस्या का हल होता है। भारत में ज्यादातर किसान बाजरे की खेती दोनों उद्देश्य से करते है। यदि आप भी बाजरे की खेती कर दोगुना लाभ कमाना चाहते है, तो ट्रैक्टरगुरु के इस लेख में हम आपको इसकी खेती से संबंधित कुछ तकनीक सही तरीके की जानकारी देने जा रहे है। इस जानकारी से आप इसकी खेती उन्नत तरीके से कर बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते है। 

बाजरा से संबंधित जानकारी

बाजरा मोटे अनाज में गिने जाने वाली एक प्रमुख फसल है। इसे सूखा प्रभावित क्षेत्र में भी आसानी से उगाया जा सकता है। इसके अलावा यह ऊँचा तापक्रम एवं अम्लीयता को भी झेल सकती है। इस वजह से बाजरा उन क्षेत्रों में उगाया जाता है जहां मक्का या गेहूँ नही उगाए जा सकते। बाजरा से किसानों को दोहरा लाभ होता है। इसकी फसल से मानव आहार के लिये अनाज के साथ ही साथ पशु आहार के लिए कडबी (चारा) भी मिलती है। बाजरा मोटे अन्नों में सबसे अधिक उगाया जाने वाला अनाज है। इसे अफ्रीका और भारतीय उपमहाद्वीप मे प्रागेतिहासिक काल से उगाया जाता रहा है। एक प्रकार की बड़ी घास जिसकी बालियों में हरे रंग के छोटे छोटे दाने लगते हैं। इसे दाने का उपयोग उच्च गुणवत्ता वाला अल्कोहल एवं ईथेनॉल बनाने में किया जा रहा है। बाजरे के दानों का आटा पीसकर और उसकी रोटी बनाकर खाई जाती है। फसल के बचे भाग का प्रयोग चारा, ईंधन तथा निर्माण कार्य में भी होता है।

बाजरे की बुवाई कब और कैसे की जाती है?

बाजरे खेती ज्वार की खेती से मिलती जुलती होती है। भारत में बाजरे की खेती खरीफ की फसलों के साथ में की जाती है। बाजरे की खेती में इसके बीजों की बुवाई ज्वार के कुछ पीछे वर्षा ऋतु में बोई जाती है। तथा ज्वार से कुछ पहले काटी जाती है। भारत में बाजरा को सिंचाई करके वर्षा से पहले एवं वर्षा आरंभ होते ही इसकी बुवाई की जाती है। इसके बीजों को अंकुरण के वक्त सामान्य तापमान की जरूरत होती हैं। उसके बाद पौधों को विकास करने के लिए 25 से 30 डिग्री तापमान उपयुक्त होता है। लेकिन इसके पूर्ण विकसित पौधे 45 डिग्री तापमान पर भी आसानी से विकास कर लेते हैं। कम बारिश वाले क्षेत्र में इसकी पैदावार अधिक होती है। अधिक बारिश वाले इलाकों में इसकी खेती से बचना चाहिए।

बाजरे की उन्नत किस्में 

बाजरे की व्यावसायिक खेती में अच्छी पैदावार हासिल करने के लिए इसके उन्नत और प्रमाणित संकुल प्रजातियों का प्रयोग करें। कृषि वैज्ञानिकों ने बाजरे की अधिक उपज के लिए नवीनतम संकर और संकुल प्रजातियों को विकसित किया है। बाजरे की नई किस्में अधिक उपज देने की क्षमता है। अनुमोदित दाने के लिए बाजरे की उन्नतशील किस्में इस प्रकार है, जैसे- एम.पी.एम.एच 17(एम.एच.1663), कवेरी सुपर वोस (एम.एच.1553), के.वी.एच. 108 (एम.एच. 1737), जी.वी.एच. 905 (एम.एच. 1055), 86 एम 89 (एम एच 1747), 86 एम. 86 (एम. एच. 1617), आर.एच.बी. 173(एम.एच. 1446), एच.एच.बी. 223(एम.एच. 1468), एम.वी.एच. 130, 86 एम. 86 (एम. एच. 1684), आदि बाजरे की उन्नत किस्में है। यह किस्में सिंचित इलाकों में अगेती खेती करने पर काफी अच्छी पैदावार देती हैं। इन किस्में से किसानों 90 से 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के हिसाब से सूखा चारा मिल जाता है। एवं 15 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से दाने प्राप्त हो सकते हैं।

बाजारे की बुवाई के लिए खेत की तैयारी कैसे करें?

इसकी खेती में खेत की तैयारी करने कि कोई खास आवश्यकता नही होती है। इसके खेत की बुवाई के लिए पहले तीन चार बार जमीन जोत दी जाती है और तब बीज बो दिए जाते हैं। इसके खेतों में खाद देने या सिंचाई करने की विशेष आवश्यकता नहीं होती। लेकिन बेहतर उत्पादन के लिए इसके खेत को दो से तीन गहरी जुताई कर उसमें 10 से 12 टन उचित मात्रा में गोबर की खाद डाल दें। उसके बाद फिर से खेत की जुताई कर खाद को मिट्टी में मिला दें। पलेव के तीन से चार दिन बाद जब खेत सूखने लगे तब रोटावेटर चलाकर खेत की मिट्टी को भुरभुरा बना लें। उसके बाद खेत में पाटा चलाकर उसे समतल बना लें। 

बुवाई के लिए बीजों की मात्रा 

बाजरे की अच्छी उपज लेने के लिए उचित बीज मात्रा के साथ उचित दूरी पर बुआई करना आवश्यक होता है। बीज की मात्रा उसके आकार, अंकुरण प्रतिशत, बुवाई का तरीका और समय, बुआई के समय भूमि में उपस्थित नमी की मात्रा पर निर्भर करती है। बाजरे की फसल के लिए 4-5 किग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है। बाजरे की बुवाई में पंक्तियों में 45 से 50 सेमी. की दूरी पर व पौधे से पौधे की दूरी 10 से 15 सेमी. रखनी चाहिए। बीजों की बुआई से पहले बीजों को उपचारित करने के लिए कार्बण्डाजिम (बॉविस्टीन) 2 ग्राम अथवा एप्रोन 35 एस डी 6 ग्राम कवकनाशक दवाई प्रति किलो ग्राम बीज की दर से बीजोपचार करने से फसल पर लगने वाले रोगों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

बाजरे की खेती की सिंचाई 

बाजरे के खेतों में खाद देने या सिंचाई करने की विशेष आवश्यकता नहीं होती। इसकी फसल उच्च गर्मी सहन करने वाली फसल है। इसकी फसल को तीन से चार सिंचाई की जरूरत होती है। जबकि इसकी खेती हरे चारे के लिए की गयी खेती है, तो इसके पौधों को अधिक पानी की जरूरत होती है। इस दौरान पौधों को 4 से 5 दिन के अंतराल में पानी देना होता है। बारिश न होने पर 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई जरूर करें।

खरपतवार नियंत्रण 

बाजरे की खेती पैदावार के रूप में करने पर इसके पौधों में खरपतवार नियंत्रण करना चाहिए। इसकी खेती में खरपतवार नियंत्रण प्राकृतिक और रासायनिक दोनों तरीके से किया जाता है। रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए इसके बीजों की रोपाई के तुरंत बाद एट्राजिन की उचित मात्रा का छिडकाव कर देना चाहिए। वहीं, प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए इसके बीजों की रोपाई के 20 से 25 दिन बाद एक बार पौधों की गुड़ाई कर देनी चाहिए। 

बाजरे की खेती में लागत और पैदावार 

बाजरें की फसल बुवाई के बाद 120 से 125 दिनों में कटाई के तैयार हो जाती है। फसल पूर्ण रूप से पकने पर कटाई करें, फसल के ढेर को खेत में खड़ा रखे तथा गहाई के बाद बीज की ओसाई करें। दानो को धूप में अच्छी तरह सुखाकर भण्डारित करें। बाजरे की खेती से औसत पैदावार 15 से 20 क्विंटल प्रति एकड़ हो जाती है। खेती से अच्छी पैदावार के लिए बाजरा- गेहूं या जौ, बाजरा- सरसों या तारामीरा, बाजरा- चना, मटर या मसूर. एकवर्षीय फसल चक्रों को अपनाना चाहिए। वैज्ञानिक तरीके से सिंचित अवस्था में खेती करने पर प्रजातियों से 30-35 क्विंटल दाना 100 क्विंटल/हेक्टेयर सूखी कडवी मिलती है। बाजरे का बाजारी भाव 2,350 से 2,500 रूपए प्रति क्विंटन तक होता है। इससे किसान भाई को इसकी फसल से 60 हजार रूपये तक की कमाई प्रति एकड़ खेत से हो सकती है। साथ ही पशुओं के लिए चारे कि व्यवस्था भी हो जाती है।

FAQ

Ques.1 बाजरे की बुवाई कब की जाती हैं?

बाजरा खरीफ की फसल है। इसकी बुवाई वर्षा ऋतु में की जाती है। और जाड़े के आरंभ में काटी जाती हैं।

Ques.2 एक बीघा में कितना बाजरा बोया जाता हैं?

सामान्य पद्धति से बाजरा की फसल बोने के लिए 5-6 किग्रा. बीज पर्याप्त होता है। वहीं, सीडड्रिल द्वारा इसकी फसल बोने के लिए 4-5 किग्रा. बीज पर्याप्त होता है। किसान को सामान्य पद्धति से बाजरा उगाने पर 22 से 25 क्विंटल पैदावार मिलती है। 

Ques.3 बाजरा की अच्छी वैरायटी कौन सी हैं?

अच्छी पैदावार के लिए बाजरा की सबसे अच्छी वैरायटी बी. 67-2 है। बाजरे की यह किस्म 62-65 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। बाजरा की इस किस्म से 22 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से उपज प्राप्त की जा सकती है।

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