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औषधीय पौधों की खेती : इन 5 औषधीय फसलों की खेती से होगा अधिक मुनाफा

औषधीय पौधों की खेती : इन 5 औषधीय फसलों की खेती से होगा अधिक मुनाफा
पोस्ट -15 दिसम्बर 2022 शेयर पोस्ट

औषधीय पौधों की खेती:  टॉप 5 औषधीय फसलों की खेती, बंपर पैदावार के साथ दोगुना मुनाफा

कोरोना महामारी के बाद देश में किसानों के बीच औषधीय फसलों का चलन काफी तेजी से बढ़ा है। क्योंकि बाजारों के अंदर औषधीय फसलों की काफी बड़े पैमाने पर मांग है। स्वास्थय को सुरक्षित रखने के लिए लोग आयुर्वेदिक उत्पादनों का बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने लगे है। इस वजह से देश सहित दुनिया भर में आयुर्वेदिक उत्पादों की मांग तेजी से होने लगी है। ऐसे में किसान आज के दौर में बाजार मांग के अनुसार औषधीय फसलों की खेती पारंपरिक रूप से कर रहे है। पिछले कुछ वार्षों से देश के कई राज्यों में किसान औषधीय पौधों की खेती कर अधिक मुनाफा अर्जित कर रहे है। किसान औषधीय पौधों की खेती से कम लागत में बंपर पैदावार के साथ बंपर मुनाफा भी कमा रहे है। बता दें कि भारत में आयुर्वेद पौराणिक काल से ही चला आ रहा है, जो कि पूरे विश्व की सबसे पुरानी चिकित्सा प्रणाली है। भारत में पौराणिक काल से ही औषधीय फसलों की खेती होती आ रही है। देश के कोने-कोने में विभिन्न प्रकार के औषधीय पौधों को उगाया जाता है। इन सब में देश की सरकार के साथ राज्य सरकारें भी सहयोग करती है। औषधीय पौधों की खेती के लिए किसानों को काफी मोटी सब्सिडी भी देती है। ऐसे में हम ट्रैक्टरगुरु के इस लेख के माध्यम से औषधीय फसलों की खेती में 5 ऐसे औषधीय पौधों की जानकारी लेकर आए है। जिनकी खेती कर किसान कम वक्त पर बंपर मुनाफा कमा सकते हैं। खास बात यह है कि औषधीय पौधों की खेती किसानों भाई को एक एकड़ में लाखों रूपये तक का मुनाफा दे सकती है।

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अकरकरा की खेती

अकरकरा अफ्रिकी मूल का एक औषधीय पौधा है। यह अफ्रिका के उत्तर अलजीरिया मे बहुत होता है। इसकी जड़ पुष्ट और कामौददीपक औषधि है। बीते सैंकड़ो वर्षों से इसका इस्तेमाल आयुर्वेद में किया जा रहा है। इसके डंठल व बीज से का इस्तेमाल मुख्य रूप से आयुर्वेदिक दवाओं के बनाने में किया जाता है। जिस वजह से इसके डंठल व बीज की मांग बाजार में बहुत अधिक रहती है। अकरकरा का उपयोग दंतमंजन, तेल व दर्द निवारक दवाइयां बनाने में किया जाता है। इसके पौधों के उपयोग से कई तरह की बीमारियों को ठीक किया जा सकता है। इसकी खेती भारत में मध्य प्रदेश,  गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और हरियाणा में मुख्य रूप से की जाती है। इसके पौधों पर मौसम का अधिक प्रभाव देखने को नहीं मिलता है। इसकी खेती कम मेहनत में अधिक लाभ वाली होती है, इसकी खेती में किसान अधिक पैदावार कर अच्छी कमाई कर सकते है। अकरकरा की खेती करने में लगभग 6 से 7 महीने का समय लगता है। यह सम शीतोष्ण जलवायु में अच्छे से विकास करती है। इसकी खेती पर अधिक सर्दी और तेज गर्मी का ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता है। इसकी खेती में भूमि का पीएच मान सामान्य होना चाहिए।

इसके पौधों की रोपाई भी मेड़ पर की जाती है, मेड़ पर इसके पौधों को 15 से 20 सेंटीमीटर की दूरी पर लगाना चाहिए, तथा रोपाई करते समय 4 से 5 सेंटीमीटर की गहराई में लगाना चाहिए। इसकी खेती में बीज और पौधों की रोपाई को अक्टूबर और नवंबर महीने के बीच में करना चाहिए।

अश्वगंधा की खेती

अश्वगंधा का वनस्पति नाम वीथानीयां सोमनीफेरा है, यह स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभदायक माना जाता है। साथ ही इसे एक महत्वपूर्ण औषधीय फसल के साथ-साथ नकदी फसल भी माना गया है। इसकी खेती मध्यप्रदेश के पश्चिमी भाग में मंदसौर, नीमच, मनासा, जावद, भानपुरा तहसील में व निकटवर्ती राज्य राजस्थान के नांगौर जिले में मुख्य रूप से होती है। इसे ठंडे प्रदेशों में छोड़कर अन्य सभी भागों में उगाया जा सकता है। अश्वगंधा एक मध्यम लम्बाई (40 से. मी. से 150 से. मी.) वाला एक बहुवर्षीय पौधा है। इसका तना शाखाओं युक्त, सीधा, धूसर या श्वेत रोमिल होता है। इसकी जड़ लम्बी व अण्डाकार होती है। इसके पौधों की जड़ों से घोड़े की गंध आती है और घोड़े को अश्व कहा जाता है। इसलिए इस पौधे का नाम अश्वगंधा है। अश्वगंधा के पत्ते, जड़, बीज व फल को औषधि के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। नागौरी अश्वगंधा की बाजार में एक अलग पहचान है। देश में अश्वगंधा की खेती लगभग 5000 हेक्टेयर में की जाती है जिसमें कुल 1600 टन प्रति वर्ष उत्पादन होता है। अश्वगंधा की खेती में बेहद कम लागत आती है तथा लागत से 3 गुना अधिक लाभ मिलता है। अश्वगंधा गर्मी के मौसम में वर्षा शुरू होने के समय लगाया जाता है। इसकी खेती सभी प्रकार की जमीन में की जा सकती है। केन्द्रीय मृदा लवणता अनुसंधान संस्थान, करनाल में किए गए परीक्षणों से पता चला है कि इसकी खेती लवणीय पानी से भी की जा सकती है। इस फसल के लिए 500 से 700 मि.मी वर्षा वाले शुष्क व अर्धशुष्क क्षेत्र उपयुक्त हैं।

सहजन की खेती

सहजन को सहजना, सुजना, सेंजन और मुनगा आदि नामों से भी जाना जाता है। इस वानस्पतिक नाम मोरिंगा ओलिफेरा है। यह एक बहु उपयोगी पेड़ है। इस पेड़ के विभिन्न भाग अनेकानेक पोषक तत्वों से भरपूर पाये गये हैं। सहजन में मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रट, वसा, प्रोटीन, पानी, विटामिन, कैल्शियम, लोहतत्व, मैगनीशियम, मैगनीज, फॉस्फोरस, पोटेशियम, सोडियम आदि पोषक तत्व पाए जाते हैं। इस में 300 से अधिक रोगों के रोकथाम के गुण हैं। इसमें 90 तरह के मल्टीविटामिन्स, 45 तरह के एंटी आक्सीडेंट गुण, 35 तरह के दर्द निवारक गुण और 17 तरह के एमिनो एसिड मिलते हैं। इसके एक बार बुवाई कर देने के बाद यह चार साल तक उपज देता है। इसकी खेती करने के बाद इसका निर्यात का कार्य भी काफी अधिक होता है। इसलिए सहजन की खेती करना आपके लिए काफी लाभकारी व्यवसाय साबित हो सकता हैं। इसकी फसल की बुवाई बहुत ही कम लागत में करके काफी अधिक पैसा कमाया जासकता हैं। इसकी खेती मुख्यतः दक्षिणी भारत के हिस्सों तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश व कर्नाटक में की जाती है।

लेमनग्रास की खेती

लेमनग्रास खुद में एक औषधीय घास वाला पौधा है। इसे लेमन ग्रास/चायना ग्रास/भारतीय नींबू घास/मालाबार घास अथवा कोचीन घास भी कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम सिम्बेपोगोन फ्लक्सुओसस है। इसकी गंध नींबू की तरह होती है। इसलिए इसे निम्बू या नीबू घास भी कहते है। इसकी खेती के लिए डूंगरपुर, बांसवाड़ा व प्रतापगढ़ के कुछ हिस्से उपयुक्त हैं। जहाँ यह प्राकृतिक रूप से पैदा होती है। इसकी विधिवत खेती केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आसाम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान राज्यों में हो रही है। लेमनग्रास में सिंट्राल व विटामिन ए की मात्रा बहुत अधिक होती है। गंजापन दूर करने के लिए लेमनग्रास या रोहिष घांस को पीसकर सिर और लगाते हैं। इसकी पत्तियां चाय में डालने हेतु उपयोग में लेते हैं। पत्तियों में एक मधुर तिक्षण गंध होती है जो चाय में डालकर उबालकर पीने से ताजगी के साथ साथ सर्दी आदि से भी राहत देती है। लेमनग्रास की खेती कर किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। इस पर मौसम का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और लेमन ग्रास को मवेशी भी नहीं खाते हैं। लेमनग्रास का पौधा बुवाई के 70 से 80 दिनों में तैयार हो जाता है।

सतावर (शतावरी) की खेती

सतावर /शतावर का वानस्पतिक नाम ऐस्पेरेगस रेसीमोसस है। यह एक एक औषधीय गुणों वाला पादप है। जिसे कई प्रकार की दवा बनाने के लिए उपयोग में लाया जाता है। यह लगभग 1 से 2 मीटर तक लंबी बेल के रूप में जंगलों और मैदानी इलाकों में पाई जाती है। आयुर्वेद में इसे ‘औषधियों की रानी’ माना जाता है। इसकी गांठ या कंद का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें जो महत्वपूर्ण रासायनिक घटक पाए जाते हैं वे हैं ऐस्मेरेगेमीन ए नामक पॉलिसाइक्लिक एल्कालॉइड, स्टेराइडल सैपोनिन, शैटेवैरोसाइड ए, शैटेवैरोसाइड बी, फिलियास्पैरोसाइड सी और आइसोफ्लेवोंस। सतावर का इस्तेमाल दर्द कम करने, महिलाओं में स्तन्य (दूध) की मात्रा बढ़ाने, मूत्र विसर्जनं के समय होने वाली जलन को कम करने और कामोत्तेजक के रूप में किया जाता है। वक्त के साथ इसकी मांग व कीमत में बढ़ोतरी हुई है। सतावर की खेती से किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। इसके पौधे को तैयार होने में 1 साल का समय लगाता है। किसान 1 एकड़  भूमि से लगभग 4 से 5 लाख रुपए की कमाई कर सकते हैं। यह भारत, श्री लंका तथा पूरे हिमालयी क्षेत्र में उगता है। इसका पौधा अनेक शाखाओं से युक्त काँटेदार लता के रूप में एक मीटर से दो मीटर तक लम्बा होता है। इसकी जड़ें गुच्छों के रूप में होतीं हैं। वर्तमान समय में इस पौधे पर लुप्त होने का खतरा है। भारत में सतावर की खेती उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान व मध्य प्रदेश में की जाती है। बता दें कि इसका उपयोग सिद्धा तथा होम्योपैथिक दवाइयों में होता है। यह आकलन किया गया है कि भारत में विभिन्न औषधियों को बनाने के लिए प्रति वर्ष 500 टन सतावर की जड़ों की जरूरत पड़ती है।

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