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गिनी घास से मिलेगा पशुओं का पौष्टिक आहार और होगी अच्छी कमाई

गिनी घास से मिलेगा पशुओं का पौष्टिक आहार और होगी अच्छी कमाई
पोस्ट - May 14, 2022 शेयर पोस्ट

पशुपालन : नमीयुक्त वातावरण में तेजी से बढ़ती है गिनी घास

किसान भाइयों द्वारा पशुपालन भी किया जाता है और इन सभी प्रकार के पालतू पशुओं को हरे चारे के रूप में यदि उन्नत किस्म की घास उपलब्ध हो जाए तो पशुओं की सेहत अच्छी रहेगी। यह उन्नत किस्म की घास गिन्नी घास के रूप में जानी जाती है। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि यदि इसे हल्के उष्ण और नमीयुक्त वातावरण में बोया जाए तो इसमें अधिक बढ़वार होती है। वहीं गिनी घास पशु  बड़े चाव से खाते हैं। गिन्नी घास की अधिक पैदावार कर किसान इससे अपनी आय भी बढ़ा सकते हैं क्योंकि आजकल हरा चारा भी पशु हाट बाजार में खूब बिकता है। आइए, जानते हैं गिनी घास की खेती कैसे करें?

गिनी घास के लिए उचित तापमान और भूमि 

यहां बता दें कि गिनी घास की उन्नत फसल आर्द्रतायुक्त वातावरण में होती है। इसके लिए न्यूनतम तापमान 15 डिग्री सेल्सियस एवं अधिकतम 38 डिग्री सेल्सियस रहना चाहिए। वहीं इस घास को लगाने के लिए वार्षिक वर्षा 600 मिमी से 1000 मिमी  होना जरूरी है। उचित जल निकासी वाली भूमि पर गिनी घास का उत्पादन किया जाता हे। लेकिन क्ले एवं लोम भूमि सबसे अच्छी मानी जाती है। वहीं बुआई से पहले गहरी जुताई करने के बाद दो जुताई कल्टीवेटर या देशी हल से करेंं। साथ ही पाटा लगा कर खेत समतल कर लें। 

बुआई का उचित समय क्या?

गिनी घास की बुआई का उचित समय जून और जुलाई माह होता है। बुआई करने से एक माह पहले इसके बीजों को नर्सरी में लगाया जाता है। वर्षा आने पर खेत में लगा दिया जाता है। वहीं इस घास के बीज व जड़ ये दोनो आसानी से लगाई जा सकती हैं। 3-4 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर या लगभग 20,000 से 25,000 जड़े एक हेक्टेयर क्षेत्रफल के लिए पर्याप्प्त होती हैं। पौधे से पौधे की दूरी 50 सेमी और लाइन से लाइन की दूरी 100 सेमी रखी जाए। अंतत: फसल लेनी हो तो लाइन से लाइन की दूरी 3 से 10 मीटर तक की रखनी चाहिए। 

दक्षिणी राज्यों में ज्यादा पैदावार 

बता दें कि गिनी घास की पैदावार दक्षिणी राज्यों में अधिक होती है जहां इसके लिए उपयुक्त जलवायु और पर्याप्त वर्षा होती है। वैसे इसका उद्गम अफ्रीका से हुआ। यह घास पशुओं को स्वादिष्ट लगती है। विश्व के उन सभी देशों में यह उगाई जा सकती है जहां उष्ण एवं उष्तोण जलवायु रहती है। भारत में इसकी पैदावार कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, गुजरात आदि में अच्छी होती है। 

गिनी घास की किस्में और इनकी विशेषताएं 

बता दें गिनी घास की कई उन्नत किस्में हैं। इनमें पूसा जाइंट, एन.बी.21, इगफ्री-10, आरबीएन-9, सीओ-1, सीओ-2, सीओ-3, इगफ्री-3, इगफ्री-6, पीबीएन-83 आदि प्रमुख हैं। इनमें पूसा जाइंट भारत के तराई प्रदेशों में लगाई जाती है जबकि एनबी-21, इगफ्री-10 एवं आर.बी.एन.-9 संपूर्ण भारत में आर्द्रता वाले हिस्सों में की जा सकती है। वहीं तमिलनाडु , कर्नाटक एवं अन्य दक्षिणी प्रदेशों में गिनी घास की सी.ओ.-1 एवं सी.ओ. -2 एवं सी.ओ.- 3 किस्में लगाई जाती हैं। वहीं उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, उत्तरपूर्व की पहाडिय़ों के अलावा पंजाब, हिमाचल प्रदेश और उत्तरांचल में इगफ्री-3 एवं इगफ्री-6 गिनी घास उगाई जाती है। 

ऐसे करें गिनी घास की बुआई 

बता दें कि गिनी घास की बुआई के लिए बीज और इसकी जड़ों के डंठल ये दोनों ही काम लिए जा सकते हैं। बीजों द्वारा बुआई करने के लिए एक माह पहले से बीजों को नर्सरी में लगाया जाता है। बारिश आने पर खेत में लगा दिया जाता है। इसकी बुआई का उचित समय जून-जुलाई माना जाता है। 

खाद एवं उर्वरक कब डालें 

गिनी घास के लिए खेत में 220 से 225 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद, नत्रजन 100 किग्रा, फास्फोरस 40 किलोग्राम एवं पोटाश 40 किग्रा प्रति हेक्टेयर डालना चाहिए। गोबर की खाद को बुआई से 10 15 दिन पहले अच्छी प्रकार भूमि में मिलाएं और बुआई के समय फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा खेत में मिला दें। नत्रजन की आधी मात्रा बुआई के 15 दिन बाद छिडक़ दें और शेष मात्रा सर्दी के अंत में यानि मार्च माह में डाल दें। 

सिंचाई कब और कैंसे करें 

गिनी घास में सिंचाई जड़ें लगाने के तुरंत बाद की जानी चाहिए। इसके बाद 7-8 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। जब जड़ें अच्छी प्रकार से जम जाएं तो 15 से 20 दिनों बाद सिंचाई की जा सकती है। सिंचाई पर्याप्त रूप से करें। 

गिनी के बीच में बरसीम आदि भी लगा दें 

गिनी घास की सर्दी के मौसम में अच्छी बढवार होती है। इसके बीच में बरसीम या जई जैसी फसल भी ली जा सकती है। आईजीएफआरआई अनुसंधान में पाया गया है कि बरसीम की फसल गिनी की लाइनों में अच्छा परिणाम देती है। इनके अलावा मक्का, ग्वार, रिजका, लोबिया आदि भी लगाए जा सकते हैं। गिनी की फसल 500 से 600 क्विंटल प्रति एकड़ तक हो जाती है। 

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