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रबी सीजन में पशुओं को खिलाएं विशेष चारा, बढ़ेगी दूध की मात्रा

रबी सीजन में पशुओं को खिलाएं विशेष चारा, बढ़ेगी दूध की मात्रा
पोस्ट - October 14, 2022 शेयर पोस्ट

पशुपालक इस प्रकार रखे पशुओं के चारे का ध्यान, नहीं होगी चारे की कमी  

भारत में पशुधन की आबादी तेजी से बढ़ती जा रही है। इस समय कुल पषुओं की संख्या 43.77 करोड़ है, जिसमें गायों की संख्या 20.4 करोड़ एवं भैंसों की संख्या 8.34 करोड़ है। जलवायु परिर्वतन के कारण कृषि से सूखे और हरे चारे की आपूर्ति नही हो पा रही हैं। चारे की आपूर्ति करना इन दिनों चिंता का विषय बना हुआ है। देश के कई राज्यों को अपने पशुओं के चारे की आपूर्ति के लिये अन्य दूसरे राज्यों पर निर्भर रहना पड़ता है। ऐसे में रबी सीजन आते ही चारे की यह समस्या और भी बड़ी हो जाती है। क्योंकि रबी सीजन आते-आते चारे के लिए हरियाली खत्म हो जाती है। इसके अलावा खरीफ सीजन की अधिकतर फसलों से चारा नहीं होता हैं। और अब हाथ से कटाई की बजाए 90 फीसदी फसलों की कटाई कंबाइन मशीन से की जाती है। मैनुअल कटाई और कंबाइन से कटाई की तुलना में तूड़ी 30 प्रतिशत तक कम निकलती है। सर्द मौसम में शुरू होता है और सर्दियों में पशुओं को ऐसे आहार की आवश्यकता होती है जिससे पशुओं की भूख भी मिट जाए और इस मौसम उनकी ऊर्जा भी बरकार रहे। ट्रैक्टरगुरु के इस लेख के माध्यम से हम आपको रबी सीजन में पशुओं के चारे की व्यवस्था के बारें में जानकारी देने जा रह है। 

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पशुपालक पहले से करे व्यवस्था

रबी सीजन आते ही पशुपालकों के लिए पशुओं का चारा एक बड़ी समस्या बनकर सामने आता है। रबी सीजन में सर्द मौसम शुरू होता है और सर्दियों में पशुओं चारे के लिए हरियाली खत्म हो जाती है। और फसलों से भी चारा नहीं हो पता है। ऐसे में पशुपालक पहले से ही व्यवस्था करके रखते हैं। यदि आप भी पशुपालक हैं, तो खरीफ सीजन के बाद पराली को चारे के विकल्प के रूप में उपयोग कर सकते हैं। पराली में मक्की, हरा चारा मिलाकर उसे चारे के रूप में संग्रहित करके रख सकते हैं। जिससे पशुओं की चारे की समस्या भी खत्म हो जाएगी और पराली जलाने जैसी समस्याओं का निपटारा तो होगा। इस प्रकार चारे से अपने पशु के उत्पादन में वृद्धि कर सकते है।

पशुओं के लिए विशेष आहार

पशुओं के चारे मे हरे चारे का विषेष महत्व है और पषु को उसके चारे की आवष्यकता का कम से कम एक तिहाई हरे चारे के रूप मे देना चाहिए। लेकिन सर्दियों के मौसम में हरे चारे की कमी हो जाती है। ऐसे में हरे चारे की आपूर्ति के लिए  किसानों को सर्दियां शुरू होने से पहले हरी घास को काटकर सूखा कर चारे के लिए तैयार कर ले और सर्दियों में इसे हरी घास में मिलाकार चारे के रुप में प्रयोग कर सकते हैं। इसके अलवा सरसों चरी, लोबिया, रजका या बरसीम आदि के साथ ही गेहूं का दलिया, चना, खल, ग्वार, बिनौला पशुओं को खिला सकते हैं। पशुओं को चारे के लिए दानों का मिश्रण भी देना चाहिए। पशुओं को अच्छी गुणवत्ता वाला सूखा चारा, बाजरा कड़बी, रिजका, सीवण घास, गेहूं की तूड़ी, जई का मिश्रण पशुओं को खिला सकते हैं, जिससे दूध उत्पादन में वृद्धि होगी।

हरा चारे के लिए बेफलीदार एवं फलीदार चारे की खेती कर सकते है

  • पशुओं  को वर्ष हरा चारा मिलना आवष्यक है। इसके लिए पशुपालकों को फसल चक्र की ऐसी योजना बनानी चाहिए ताकि वर्ष भर हरा चारा उपलब्ध रहे। इसके लिए यह है कि उपलब्ध चारे के खेत को तीन भागों मे बाँट लेते हैं। प्रथम भाग में 75-90 सेमी की दूरी पर खरीफ में गिनी घास कतारों मे बोई जाती है।

  • इसी प्रकार रबी सीजन में इसी भाग में रबी की फसल में बरसीम बोकर हरा चारा लिया जाता है। खेत के दूसरे भाग में खरीफ की फसल मे ज्वार की चरी उगाते हैं।

  • तथा रबी मे लूसर्न घास बोकर दो-तीन वर्षो तक चारा प्राप्त कर सकते हैं। खेत के तीसरे एवं अंतिम भाग में रबी मे बरसीम तथा खरीफ मे ज्वार प्रति वर्ष बोकर चारा उगाते हैं। इसके अलावा ऐसे ही कुछ एक वर्षीय एवं दो वर्षीय फसल चक्र निम्न है-

  • एक वर्षीय फसल चक्र - ज्वार-ग्वार-जई,  बाजरा-मटर-जई,  मक्का-बरसीम

  • दो वर्षीय फसल चक्र - ज्वार-बरसीम-ज्वार-लोबिया, ज्वार-बरसीम-मक्का-बरसीम,  मक्का-लूसर्न, नेपियर घास 

बेफलीदार हरे चारे

बेफलीदार हरे चारे दो प्रकार के होते है। एक तो वे, जो स्वयं उग आते हैं, जैसे खर, घास और दूब तथा दूसरे वे जिनकों उगाये जाते हैं, जैसे जई, मक्का,ज्वार और बाजरा:

  • ज्वार - यह दुधारू पषुओं को खिलाने हेतु उत्तरी भारत मे खरीफ की मुख्य फसल है। यह काफी शीघ्र उगकर थोड़ी ही भूमि में अधिक चारा दे देती है। फूलते समय काटने पर ज्वार में पोषक तत्वों की मात्रा बहुत अच्छी होती है। इसकी प्रति एकड़ उपज 140-180 क्विंटल है। 

  • बाजरा - इसे हरे चारे के लिए बहुत कम उगाया जाता है। इसमें फसल लेने के बाद बचा हुआ चारा पषुओं को खिलाया जाता है। किन्तु जब इसके केवल हरे चारे के लिए उगाया जाता है, तो इसकी दाने की फसल की नहीं ली जाती है। पौष्टिकता मे यह ज्वार तथा मक्का से कुछ कम होता है। यह काफी जल्दी बढ़ता है, अतः प्रारम्भिक अवस्था में ही हरा काटकर पषुओं को खिलाया जाता है। 

  • मक्का - मक्का खरीफ के मौसम में तैयार होता है। इसकी बुआई जून से जुलाई तक होती है। लगभग दो माह मे चारा तैयार हो जाता है। एक एकड़ मे लगभग 120 क्विंटल चारा उपलब्ध होता है। फूलते समय इसमें पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध रहते हैं। यह बहुत ही स्वादिष्ट एवं पाचक चारा है। 

  • जई - यह रबी की फसल का मुख्य चारा है। अक्तूबर से दिसम्बर तक इसकी बुआई करते हैं। इसमे प्रोटीन तथा अन्य आवष्यक तत्व पर्याप्त मात्रा में रहते हैं। दो-तीन माह में चारा तैयार हो जाता है। जई की प्रति एकड़ उपज 150-180 क्विंटल है। 

  • गिनी घास - यह बहुवर्षीय हरा चारा है जो वर्ष भर उपलब्ध रहता है। यह जाड़े में निर्जीव रहकर बारिश मे काफी तेजी से उगता है। इसकी 6-8 बार कटाई की जाती है। इसकी उपज 150-250 क्विंटल प्रति एकड़ है। जून-जुलाई मे इसकी बुआई करते हैं और अक्टूबर से हरा चारा मिलने लगता है। खाने में स्वादिष्ट होने के साथ-साथ इसमें पोषक तत्व भी अधिक होते हैं।

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