किसानों को बाजरे की खेती से मिलेगा कम समय में अच्छा मुनाफा

किसानों को बाजरे की खेती से मिलेगा कम समय में अच्छा मुनाफा
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आय बढ़ाने में बढ़िया विकल्प साबित होगा बाजरा, कम अवधि में किसानों को मिलेगी ज्यादा आय 

भारत सरकार मोटे अनाज को बढ़ावा देने के लिए देश के सभी राज्यों में इसकी खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहन दे रही है। भविष्य में देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए मोटे अनाज (मिलेट्स) को एक अहम वैकल्पिक अनाज फसल के रूप में देखा जा रहा है। गेहूं-चावल जैसी अनाज फसलों की तुलना में बाजरे में कही अधिक पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जिसके चलते भारत सहित पूरे विश्व में इसे गेहूं-धान के स्थान पर वैकल्पिक फसल के रूप में प्रोत्सहित करने का प्रयास किया जा रहा है। आने वाले समय में बाजरा खेती में धान और गेहूं जैसी फसलों की जगह ले सकता है। 

गेहूं-धान जैसी पारंपरिक फसलों के स्थान पर लगाए बाजरा, कम वक्त में मिलेगा बढि़या मुनाफा

भारत जी-20 समूह के देशों के सहारे वैश्विक बाजार में मोटे अनाज (मिलेट्स) निर्यात को मजबूत बनाने में जुट हुआ है। कृषि में मोटे अनाज की उत्पादकता बढ़ाने के लिए भारत में ’’श्री अन्न योजना’’ को संचालित किया जा रहा है। इसके तहत सरकार द्वारा कृषि उत्पादन को बढ़ाने, खेती की लागत को कम करने और उत्पाद की बेहतर कीमत सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है। 

भारत की पहल पर वर्ष 2023 को पूरा विश्व अंतरराष्ट्रीय पोषक अनाज के वर्ष के रूप में मना रहा है। मिलेट्स (मोटा अनाज) की लोकप्रियता के लिए भारत सरकार हर स्तर पर प्रचार-प्रसार और जागरूकता अभियान भी चला रही है। ऐसे में शुद्ध और प्राकृतिक कृषि उत्पादन में रागी, समा, कंगनी, ज्वार, कुट्टू, काकुन, सांवा, कोदो, चेना जैसे मोटे अनाजों (मिलेट्स) की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए देश की विभिन्न राज्य सरकारें अपने-अपने स्तर पर काम कर रही हैं, जिनमें ओडिशा, कर्नाटक, महाराष्ट्र और तेलंगाना में मोटे अनाज कृषि आधारित योजनाएं भी संचालित की जा रही है। आइए, भारत में पोषक अनाजों में बाजरा की अहमियत जानें। 

उत्पादन और खपत को बढ़ावा देने का प्रयास कर रही भारत सरकार  

मिलेट्स (मोटा अनाज) में ज्वार, रागी, कुट्टू, काकुन, सांवा, कोदो के साथ बाजरा जैसे पोषक अनाज फसलों को देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण कृषि उत्पादन माना जा रहा है। इन पोषक अनाज फसलों में गेहूं-धान जैसी पारंपरिक फसलों के मुकाबले कहीं अधिक पोषक तत्व मौजूद होते हैं, विशेषकर बाजरा में पोषक तत्व सबसे ज्यादा होते हैं। इसमें मैग्नीशियम, पौटेशियम, लोहा, कैल्शियम और जस्ता, जैसे पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। जिस वजह से इसे विटामिन और फाइबर का अच्छा स्रोत माना जाता है। इसमें  मौजूद पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा के चलते बाजरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सूपर फूड फसलों की श्रेणी में रखा गया है। इसके चलते भारत सरकार बाजरे के उत्पादन और खपत को बड़े स्तर पर बढ़ाने के लिए प्रयास कर रही है। ऐसा माना जा रहा है कि बाजरे की खेती को गेहूं-धान के विकल्प के तौर किसानों द्वारा अपनाई जा सकती है। 

मोटे अनाजों (मिलेट्स) के निर्यात को बढ़ाने पर काम कर रही है सरकार

पीआईबी की रिपोर्ट के अनुसार भारत मोटे अनाजों का एक बड़ा निर्यातक देश है। रिपोर्ट्स के अनुसार भारत जापान, जर्मनी, मैक्सिको, इटली, ब्रिटेन, ब्राजील, नीदरलैंड, इंडोनेशिया, बेल्जियम और अमेरिका जैसे विकसित देशों को सबसे ज्यादा मोटे अनाज का निर्यात करता है। अगर बाजरे की बात करें तो भारत नेपाल, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी, लीबिया, ट्यूनीशिया, मोरक्को, यूके, यमन, ओमान और अल्जीरिया जैसे देशों को सबसे ज्यादा बाजरा निर्यात करता है। 

मोटे अनाज से बने उत्पादों की मार्केटिंग पर सरकार खर्च करेगी 800 करोड़ रुपए

मोटे-अनाजों के उत्पादों को वैश्विक स्तर पर बढ़ाने के लिए सरकार ने वर्ष 2026-27 तक 800 करोड़ रुपये खर्च करेगी। देश की अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने के लिहाज से मिलेट्स उत्पादन के निर्यात पर ध्यान केंद्रित करते हुए एपीडा (खाद्यान्न उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण) ने भारतीय निर्यातकों के लिए 30 देशों को चिन्हित किया है, जिनमें आने वाले वर्षों में बाजरा निर्यात में बढ़ोतरी की अच्छी संभावनाएं हैं। इसके अलावा, पोषक अनाज की आपूर्ति के लिए देश में 21 ऐसे राज्यों को चिन्हित किया है, जहां मोटे अनाज यानि मिलेट्स का उत्पादन काफी बड़े स्तर पर होता है। सरकार इन राज्यों में मिलेट्स की खेती को लगातार बढ़ने का काम कर रही है। 

कम वक्त और लागत में खेती से अधिक मुनाफा 

गेहूं और धान जैसी पारंपारिक अनाज फसलों के उत्पादन में लगभग 4 से 5 महीने का वक्त लगता है। साथ ही इन फसलों के उत्पादन में खाद-पानी और लागत भी अधिक आती है। वहीं, बाजरा, ज्वार जैसे अन्य मोटे अनाज की फसल मात्र 60 से 70 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। खास बात यह है कि इन फसलों पर सर्दी, गर्मी और अधिक बरसात का भी कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता है। गेहूं और धान के मुकाबले बाजरे की खेती हर प्रकार की भूमि पर आसानी से की जा सकती है। इसकी फसल को कम पानी और कम खाद की जरूरत पड़ती है, जिसके चलते इसके उत्पादन में किसानों को कम खर्च करना पड़ता है। वहीं, कम अवधि में फसल तैयार होने से किसानों को खेत में अन्य कम अवधि की दूसरी फसल की बुवाई करने का पर्याप्त समय भी मिल जाता है, जिससे किसान अन्य कम अवधि की फसल की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। 

इसकी फसल 45 से 50 डिग्री के अधिकतम तापमान को भी सहन कर सकती है, जिसके चलते बाजरा पंजाब और हरियाणा जैसे गेहूं और धान उत्पादक प्रमुख राज्यों के लिए एक बढ़िया विकल्प बनता जा रहा है। इन राज्यों में किसान अब खरीफ सीजन में धान के स्थान पर बाजरे की खेती को प्राथमिकता देने लगे हैं। 

बाजरा की खेती कर किसान कमा सकते हैं जोरदार मुनाफा

बाजरा किसानों की इनकम बढ़ाने का एक बढ़िया विकल्प साबित हो सकता है। सरकार मोटे अनाज के निर्यात को बढ़ाने पर भी जोर दे रही है। ऐसे में किसान बाजार उत्पादन कर उससे प्रसंस्कृत ब्रेड, लड्डू, पास्ता, बिस्कुट, प्रोबायोटिक पेय आदि  उत्पाद बनाकर बाजार में निर्यात कर सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मोटे अनाजों से बने उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है, जिसके चलते किसानों को विदेशों में नए बाजार मिल रहे हैं। इससे सीधे तौर पर किसानों को लाभ हो रहा है। किसान बाजरा प्रस्संकरण के उद्योग लगाकर इससे बने उत्पादों को निर्यात कर अच्छी कमाई का एक बेहतर जरिया बना सकते हैं। इन सबमें देश की सरकार भी पूरा सहयोग कर रही है। ऐसे में बाजरा जल्द ही गेहूं-धान के विकल्प के तौर पर सामने आ सकता है।

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