ड्रैगन फ्रूट की खेती : एक हेक्टेयर जमीन पर मिलेगी 50 हजार की सब्सिडी

ड्रैगन फ्रूट की खेती : एक हेक्टेयर जमीन पर मिलेगी 50 हजार की सब्सिडी
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ड्रैगन फ्रूट की खेती पर 40 प्रतिशत सब्सिडी, जानें ड्रैगन फ्रूट खेती की विधि  

देशभर में बीते कुछ दशकों के अंदर खेती-किसानी में नई तकनीकों का आविष्कार होने से खेती करना काफी आसान हो गया है। बदलते समय के साथ देश के किसान खेती के परंपरागत तरीकों के स्थान पर इन नई तकनीकों का प्रयोग से दुर्लभ किस्मों की फसलों की खेती कर काफी लाभ अर्जित कर रहे हैं। वर्तमान समय में कई तरह की खेती से लोग जमकर पैसा कमा रहे हैं। ऐसी ही मुनाफेदार दुर्लभ किस्मों की खेती में ड्रैगन फ्रूट भी शामिल है, जो किसानों के लिए काफी मुनाफे का सौदा साबित हो रहा है। धीरे-धीरे किसानों के बीच ड्रैगन फ्रूट की खेती लोकप्रिय हो रही है। भारतीय किसानों के बीच ड्रैगन फ्रूट इन दिनों काफी चर्चा में हैं क्योकि यह भारत से विदेशों में एक्सपोर्ट हो रहा है। देश के कई राज्यों से निकलकर ड्रैगन फ्रूट लंदन और बहरीन तक पहुंच रहे हैं। खेती-किसानी में अच्छी कमाई करने का यह एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी है कि ड्रैगन फ्रूट की खेती कैसे की जाती है। ड्रैगन फ्रूट दिखने में बहुत ही अजीबोगरीब फल है। ड्रैगन फ्रूट का संबंध कैक्टस प्रजाति से है। इसकी खेती के लिए ठंड जलवायु वाले प्रदेश ज्यादा उपयुक्त माने जाते हैं। हालांकि, अब इसकी खेती मैदानी इलाकों में भी होने लगी है। ड्रैगन फ्रूट की खेती को लेकर किसानों में दिलचस्पी बढ़े इसके लिए सरकार भी विभिन्न योजनाओं के माध्यम किसानों को प्रोत्साहित भी कर रही है। ड्रैगन फ्रूट की खेती में अपार संभावना को देखते हुए बिहार सरकार अपने राज्य के किसानों को सब्सिडी भी दे रही है। तो चलिए ट्रैक्टरगुरू के इस लेख के माध्यम से ड्रैगन फ्रूट की खेती पर मिलने वाली सब्सिडी और इसकी खेती से होने वाली कमाई तथा इसकी खेती के बारे में जानते हैं। 

ड्रैगन फ्रूट की खेती पर 40 प्रतिशत तक की सब्सिडी

दरअसल बिहार राज्य एकीकृत बागवानी मिशन के तहत सभी जिलों में शुष्क जमीन पर एक साथ दो फसलों की खेती की कवायद जारी है। बिहार सरकार राष्ट्रीय बागवानी मिशन और मुख्यमंत्री बागवानी मिशन योजनाओं के अंतर्गत विशेष उद्यानिक फसल योजना के तहत ड्रैगन फ्रूट सहित आंवला, बेर, जामुन, बेल, कटहल एवं नींबू के साथ मगही पान, चाय, प्याज तथा हाइब्रिड सब्जियों की खेती के लिए 40-50 प्रतिशत तक की सब्सिडी दे रही है। बिहार कृषि विभाग, बागवानी निदेशालय की ओर से बागवानी फसलों में ड्रैगन फ्रूट की खेती खेती करने पर किसानों को 40 प्रतिशत की सब्सिडी दे रही है। बिहार सरकार ने विशेष उद्यानिकी फसल योजना के तहत प्रति हेक्टेयर जमीन पर ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए अधिकतम इकाई लागत 1 लाख 25 रुपये निर्धारित की गई है, इस निर्धारित राशि पर किसानों को 40 प्रतिशत सब्सिडी के तौर पर यानी 50,000 रुपये मिल जाएंगे। यदि आप भी बिहार राज्य के किसान हैं, तो इस योजना के तहत बिहार सरकार के उद्यान विभाग की वेबसाइट http://horticulture.bihar.gov.in/ पर अपना ऑनलाइन आवेदन देकर योजना का लाभ उठा सकते हैं। 

भारत में ड्रैगन फ्रूट की खेती करने वाले राज्य 

ड्रैगन फ्रूट एक विदेशी फल है, जो कि मैक्सिको और मध्य एशिया में पाया जाता है। इसे सुपर फ्रूट, पिताया या स्ट्रॉबेरी पीयर भी कहा जाता है। ड्रैगन फ्रूट बाहर से अनन्नास की भांति दिखाई देता है, लेकिन अन्दर से गूदा सफेद और काले छोटे-छोटे बीजों से भरा हुआ नाशपाती या कीवी की तरह होता है। इस आकर्षक एवं रहस्यमय फल का रंग लाल-गुलाबी होता है। इसकी त्वचा में हरे रंग की पंक्तियां होती हैं, जो ड्रैगन की तरह दिखाई देती हैं इसलिए इसको ड्रैगन फ्रूट के नाम से भी जाना जाता है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में ड्रैगन फ्रूट की खेती किसानों के लिए एक बेहतर विकल्प हो सकता है। बरसात को छोड़कर पूरे साल ड्रैगन फ्रूट के पौधे लगाए जा सकते हैं। इसकी खेती अमेरिका, वियतनाम और थाईलैंड, मलेशिया जैसे कई देशों में की जाती है। भारत में इसकी खेती  गुजरात, यूपी, एमपी, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में काफी बड़े पैमाने पर होने लगी है।

ड्रैगन फ्रूट की खेती से होने वाली कमाई

ड्रैगन फ्रूट रोपाई के एक वर्ष पश्चात फल देना शुरू कर देता है। ड्रैगन फ्रूट के पौधे पर मई और जून में फूल लगते हैं तथा जुलाई से दिसंबर तक फल लगते हैं। पुष्पण के एक महीने बाद फल तुड़ाई के लिए तैयार हो जाते हैं। इसकी 6 तुड़ाई की जा सकती है। ड्रैगन फ्रूट के कच्चे फल हरे रंग के होते हैं, जो पकने पर लाल रंग में परिवर्तित हो जाते हैं। फलों की तुड़ाई का सही समय रंग परिवर्तित होने के तीन.चार दिनों बाद का होता है। ड्रैगन फ्रूट का पौधा एक सीजन में 3 से 4 बार फल देता है। प्रत्येक फल का वजन लगभग 300 से 800 ग्राम तक होता है। एक पौधे पर 50 से 120 फल लगते हैं। ड्रैगन फ्रूट की फसल से औसत उपज 5 से 6 टन प्रति एकड़ प्राप्त होती है। इसकी बाजार भाव 80 से 150 रुपए तक है। ड्रैगन फ्रूट के एक एकड़ खेत में हर साल आठ से दस लाख रुपए तक की कमाई आसानी से हो सकती है। 

ड्रैगन फ्रूट की खेती की जानकारी 

ड्रैगन फ्रूट की खेती के लिए उष्णकटिबंधीय मौसम की स्थिति बेहतर होती है। ड्रैगन फ्रूट की खेती 50 सेमी की वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में भी हो सकती है। इसके लिए 20 डिग्री सेल्सियस से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त माना जाता हैं। इस फल को रेतीली दोमट मृदा से लेकर दोमट मृदा जैसी विभिन्न प्रकार की मृदाओं में उगाया जा सकता है। इसकी खेती के लिए कार्बिनक पदार्थ से भरपूर, उचित जल निकास वाली काली मृदा, जिसका पी-एच मान 5.5 से 7 हो, अच्छी मानी जाती है। 

ड्रैगन फ्रूट की जैविक खेती करने से उत्पाद बेहतर होगा। खेत में 20 से 25 टन प्रति हैक्टर की दर से अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद अथवा कम्पोस्ट डालकर खेत की अच्छे से जुताई कर मिला देनी चाहिए। ड्रैगन फ्रूट के पौधे को खेत में लगाने से पहले आपको इसके लिए 6 फुट लंबी आरसीसी पोल लगाने होंगे। हर पौधे के बीच कम से कम 6 फीट की दूरी रखनी जरूरी है।

ड्रैगन फ्रूट के पौधे इस तरह करे तैयार 

ड्रैगन फ्रूट के पौधे दोनों ही तरीकों से तैयार किया जा सकता है। पौधे तैयार करने के लिए बीज को भी लगाया जा सकता है, लेकिन बीज अच्छे किस्म का होना जरूरी है। बीज से लगाने पर यह फल देने में ज्यादा समय लेता है, जो किसान के दृष्टिकोण से सही नहीं है। इसलिए बीज वाली विधि व्यावसायिक खेती के लिए उपयुक्त नहीं है। इसका पौधा यदि ग्राफ्टिंग तकनीक से विकसित हुआ हो, तो ज्यादा बेहतर होगा, क्योंकि इसे परिपक्व होकर फल देने में कम वक्त लगता है। इसे मार्च से जुलाई के बीच कभी भी लगाया जा सकता है। पौधे लगाने के एक साल पश्चात ड्रैगन फ्रूट का पेड़ फल देने के लिए तैयार हो जाता है। 

ड्रैगन फ्रूट के पौधे की देख-रेख

ड्रैगन फ्रूट के पौधों को अन्य फल के पौधों की तुलना में कम पानी की आवश्यकता होती है। इसकी पहली हल्की सिंचाई पौधे लगाने के बाद करनी चाहिए। इसके बाद आवश्यकतानुसार सिंचाई की जा सकती है। फूल आने एवं फल विकास के समय तथा गर्म व शुष्क मौसम में बार-बार सिंचाई की आवश्यकता होती है। ड्रिप इरिगेशन, स्प्रिंकलर इरिगेशन, माइक्रो जेट और बेसिन इरिगेशन जैसी नवीनतम तकनीक इसके लिए उपयोगिक सिंचाई पद्धति है। ड्रैगन फ्रूट में कीट और रोगों का प्रकोप प्रायः कम होता है। फिर भी इसमें एंथ्रेक्नोज रोग व थ्रिप्स कीट का प्रकोप देखा गया है। एंथ्रेक्नोज रोग के नियंत्रण के लिए मैन्कोजेब दवा के घोल का 0.25 प्रतिशत की दर से छिड़काव करें। थ्रिप्स के लिए एसीफेट दवा का 0.1 प्रतिशत की दर से छिड़काव करना चाहिए। 

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