पिछले कुछ महीनों से रूस और यूक्रेन के बीच जारी जंग का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। दोनों देशों के बीच करीब छः महीने से अधिक समय से जारी युद्ध की वजह से विश्व की खाद्यान्न आपूर्ति श्रृंखला पटरी से उतर सी गई है। अब भारतीय गेहूं से देश के साथ-साथ दुनिया की जरूरतें भी पूरी की जा रही है। ऐसी स्थिति में किसानों के ऊपर भी अच्छी क्वालिटी वाला अनाज उगाने की जिम्मेदारी बढ़ गई है। रूस दुनिया का शीर्ष गेहूं निर्यातक है। वहीं यूक्रेन इस मामले में पांचवें स्थान पर है। महंगाई और कम गेहूं के उत्पादन के अनुमान के चलते भारत सरकार ने गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। ऐसी स्थिति को देखते हुए हमारे वैज्ञानिकों ने गेहूं की कई ऐसी किस्में विकसित की हैं, जो कम समय और कम खर्च में ही अच्छी क्वालिटी का अनाज देती है, सही समय पर बुवाई करने से फसल की पैदावार भी अच्छी होती है। इन किस्म के गेहूं की किस्मों में से एक पूसा तेजस भी है, जिसे वर्ष 2016 में इंदौर कृषि अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित किया गया था। लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए एवं विश्व की खाद्यान्न आपूर्ति श्रृंखला में गेहूं की यह किस्म वरदान साबित हुई। भारत के मध्य प्रदेश के किसानों को इस गेहूं की किस्म से पैदावार एवं इसके निर्यात में किफी फायदा हुआ है। यहां के किसानों के लिए यह किस्म किसी वरदान से कम नहीं है। तो चलिए ट्रैक्टरगुरू के इस लेख के माध्यम से हमारे वैज्ञानिकों द्वारा तैयार इस खास गेहूं के किस्म के बारें में जानते है।
“पूसा तेजस एचआई 8759” गेहू देश में उपलब्ध गेहूं की किस्मों में से एक है। आज कल गेहूं की यह किस्म मध्यप्रदेश के किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। नई गेहूं किस्म पूसा तेजस से चपाती के साथ पास्ता, नूडल्स और मैकरॉनी जैसे खाद्य पदार्थ बनाने के लिये सबसे उपयुक्त रहती है। पूसा तेजस गेहूं के एक हजार दानों का वजन ही 50 से 60 ग्राम होता है. कड़क और चमकदार दानों वाली पूसा तेज प्रजाति दिखने में जितनी आकर्षक होती है, इससे बने खाद्य पदार्थ भी उतने ही स्वादिष्ट होते हैं।
पूसा तेजस गेहूं किस्म को मध्य भारत के लिए चिह्नित किया था। गेहूं की यह प्रजाति तीन-चार सिंचाई में पककर तैयार हो जाती है। नई गेहूं किस्म पूसा तेजस बुवाई के 115 से 125 दिनों के अंदर 55-75 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन होता है। गेहूं की यह उन्नत प्रजाति प्रोटीन, विटामिन-ए, आयरन व जिंक जैसे पोषक तत्वों से समृद्ध है। साथ ही इस किस्म में गेरुआ रोग, करनाल बंट रोग और खिरने की संभावना भी नहीं रहती। इसके अलावा नई गेहूं किस्म पूसा तेजस की फसल में पत्तियां चौड़ी, मध्यमवर्गीय, चिकनी और सीधी होती है, जो किसानों को जोखिम में भी बेहतर उत्पादन दे सकती है।
गेहूं की खेती रबी सीजन में की जाती है। रबी सीजन की प्रमुख नगदी फसलों में इसकी गिनती सबसे ऊपर होती है। भारत में इसका उत्पादन और खपत दोनों ही काफी ज्यादा है। भारत में गेहूं की खेती के प्रमुख राज्य पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश एवं उत्तर प्रदेश मुख्य हैं। भारत लगभग हर क्षेत्र में सामन्य किस्मों के गेहूं की खेती होती है। मार्च में समाप्त हुए वित्त वर्ष में भारत ने 7.85 मिलियन टन गेहूं का निर्यात किया है। जोकि उससे पहले के वर्ष में महज 2.1 मिलियन टन था। भारत बंगलादेश के अलावा साउथ कोरिया, ईरान, ओमान और कतर जैसे देशों को गेहूं का निर्यात करता है।
भारत में गेहूं की खेती रबी सीजन में की जाती है। इसकी बुवाई अधिकतर धान की फसल के बाद ही की जाती है। पूसा तेजस एचआई 8759 गेहूं की खेती धान की तर्ज पर ’श्री’ पद्धति गेहूं सघनीकरण पद्धति से करें तो गेंहू के उत्पादन में ढाई से तीन गुना वृद्धि हो सकती है। सामान्य तौर पर नवंबर-दिसंबर के मध्य में बुवाई कर लें। इस दौरान प्रति एकड़ के लिये 50 से 55 किलोग्राम बीज, प्रति हेक्टेयर के लिये 120 से 125 किलोग्राम बीज और प्रति बीघा के हिसाब से 20 से 25 किलोग्राम बीजदर का प्रयोग करना चाहिए।
गेहूँ की बुवाई से पहले खेत तैयार करने के के लिए मिटटी पलटने वाले हल से तथा बाद में डिस्क हैरो या कल्टीवेटर से 2-3 जुताईयां करके खेत को समतल करते हुए भुरभुरा बना लेना चाहिए, डिस्क हैरो से धान के ढूंठे कट कर छोटे छोटे टुकड़ों में हो जाते हैं। इन्हें शीघ्र सड़ाने के लिए 20-25 कि०ग्रा० यूरिया प्रति हैक्टर कि दर से पहली जुताई में अवश्य दे देनी चाहिए। इससे ढूंठे, जड़ें सड़ जाती हैं ट्रैक्टर चालित रोटावेटर से एक ही जुताई द्वारा खेत पूर्ण रूप से तैयार हो जाता है।
बीजों को कतार में 20 सेमी की दूरी में लगाए। इसके लिए देशी हल या पतली कुदाली की सहायता से 20 सेमी की दूरी पर 3 से 4 सेमी गहरी नाली बनाते है और इसमें 20 सेमी. की दूरी पर एक स्थान पर 2 बीज डालते है। बुवाई बाद बीज को हल्की मिट्टी से ढंक देते है। बुवाई के 2-3 दिन में पौधे निकल आते है। कतार तथा बीज के मध्य वर्गाकार (20 बाय 20 सेमी) की दूरी रखने से प्रत्येक पौधे के लिए पर्याप्त जगह मिलती है।
पूसा तेजस के बीजों की बुवाई से पहले बीजों का उपचार करने की सलाह दी जाती है. इसके लिये कार्बोक्सिन 75 प्रतिशत या कार्बनडाजिम 50 प्रतिशत 2.5-3.0 ग्राम दवा से प्रति किलोग्राम बीजों का उपचार करना चाहिए।
खाद और उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना चाहिए, गेहूँ की अच्छी उपज के लिए खरीफ की फसल के बाद भूमि में 150 कि०ग्रा० नत्रजन, 60 कि०ग्रा० फास्फोरस, तथा 40 कि०ग्रा० पोटाश प्रति हैक्टर तथा देर से बुवाई करने पर 80 कि०ग्रा० नत्रजन, 60 कि०ग्रा० फास्फोरस, तथा 40 कि०ग्रा० पोटाश, अच्छी उपज के लिए 60 क्विंटल प्रति हेक्टेर सड़ी गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए।
गेहूं फसल की समय-समय पर निगरानी, खरपतवार प्रबंधन, निराई-गुड़ाई, कीट नियंत्रण और रोग प्रबंधन आदि प्रबंधन कार्य भी करते रहना चाहिए। गेहूं के बीजों का अंकुरण, पौधों और जड़ों का सही विकास और फसल से बेहतर उत्पादन के लिये माइक्रोराइजा जैव उर्वरक का प्रयोग भी फायदेमंद होता है। पूसा तेजस गेहूं की फसल सिर्फ 3 से 5 सिंचाईयों में पककर तैयार हो जाती है, इससे मिट्टी में सिर्फ नमी बनाये रखकर भी अच्छा उत्पादन ले सकते हैं।
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