पालक की खेती में मेहनत कम कमाई ज्यादा - जानें, पालक की खेती की जानकारी

पालक की खेती में मेहनत कम कमाई ज्यादा -  जानें, पालक की खेती की जानकारी
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जानें, पालक खेती से जुड़ी कुछ खास बातें और कैसे करें ज्यादा कमाई

हरी सब्जियों में पालक का उपयोग सबसे ज्यादा किया जाता है, क्योंकि इसमें आयरन और एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाए जाते है। पालक बहुत ही लोकप्रिय पत्तेदार सब्जी है। यूं तो पालक सालभर ही खाया जाता है, लेकिन सर्दियों के मौसम में पालक का उपयोग भरपूर मात्रा में होता है। पालक पनीर हो या मक्की की रोटी के साथ पालक व सरसों का साग सभी को पसंद आता है। पालक का मूल स्थान केंद्रीय और पश्चिमी एशिया है और यह अमरांथासियेइ प्रजाति से संबंध रखता है। यह एक सदाबहार सब्जी है, जिसे पूरे साल उगाया जा सकता है। इसकी खेती पूरे विश्व में की जाती है। इसके बहुत सारे सेहतमंद फायदे है। यह बीमारियों से लड़ने की क्षमता को बढ़ाता हैं। यह पाचन के लिए  त्वचा, बाल, आंखों और दिमाग के स्वास्थ्य के लिए अच्छा है। 

पालक से कैंसर-रोधक और ऐंटी ऐजिंग दवाइयां भी बनती हैं। भारत में आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, केरल, तमिलनाडू, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और गुजरात आदि पालक उत्पादक के राज्य हैं। स्थानीय बाजारों से लेकर विदेशों में पालक की डिमांड लगातार पूरे साल रहती हैं। पालक की खेती का अनुमान लगाया जाए तो 150 से 205 क्विंटल तक की उपज हो सकती हैं। जिसे बाजार में 15 से 20 रूपए प्रति किलोग्राम की दर से बेचा जा सकता हैं। जिसे किसान भाई पालक की खेती करके अच्छी कमाई कर सकते हैं। अगर आप भी कम लागत में पालक खेती से अच्छी कमाई करना चाहते है, तो ट्रैक्टर गुरू की आज की इस पोस्ट को अंत तक जरूर पढ़े। इस पोस्ट में आपको पालक की खेती के बारे में जानकारी दी जा रही है।   

पालक की खेती से संबंधित जानकारी

  • पूरे साल करे इसकी खेती से कमाई : वैसे तो पालक की खेती पूरे साल की जाती है, लेकिन अलग-अलग महीनों में इसकी बुवाई करनी जरूरी है। इस तरह किसान भाई पालक की खेती से पूरे साल कमाई कर सकता हैं। पालक की खेती में ज्यादा लागत नहीं लगती। यह कम समय में ही ज्यादा फायदा देने लगती है। एक बार पालक की बुवाई  करें और उसी बुवाई से बार-बार पैसा कमाएं। आपको बता दें पालक की 5-6 बार कटाई की जाती है। इसके बाद लगभग 10 से 15 दिनों में यह दोबारा कटाई करने लायक हो जाता हैं। पालक में विटामिन ए और सी के साथ प्रोटीन, कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन और एंटीऑक्सीडेंट खनिज भरपूर मात्रा में पाए जाये जाते हैं। इसलिए इसका उपयोग सबसे ज्यादा किया जाता हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इसके पोषण मूल्य को ध्यान में रखते हुए पालक की खेती बड़े पैमाने पर कर पूरे साल इसकी खेती से लाखों की कमाई कर सकते हैं। 

  • पलाक की खेती के लिए भूमि : उद्यानि विभाग के कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार पालक को अच्छे जीवांश युक्त अच्छी जल निकासी वाली किसी भी प्रकार की भूमि पर उगाया जा सकता हैं। यहां तक इसे लवणीय भूमि में भी उगाया जा सकता हैं, जहां अन्य फसलें नहीं उग सकती हैं। किन्तु बड़े पैमाने पर पालक की खेती के लिए हल्की दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है। आपको ऐसे खेत का चयन करना चाहिए जिसमें पानी का निकास अच्छी तरह हो सके और सिंचाई करने में किसी तरह ही परेशानी न हो। तथा इसकी खेती के लिए भूमि का पी.एच मान 6 से 7 के मध्य होना चाहिए। 

  • पालक खेती के लिए उपयुक्त मौसम : पालक सर्दियों के मौसम की फसल हैं। सर्दियों के मौसम में पालक का उपयोग भरपूर मात्रा में देखने को मिलता हैं। पालक सर्दियों के मौसम में गिरने वाले पाले को भी आसानी से सहन कर लेते हैं, तथा भली प्रकार से विकास भी करते हैं। पालक की फसल को बहुत कम समय में ली जा सकती है। पालक को एक या दो महीने की भीषण गर्मी को छोड़कर कभी भी उगाया जा सकता हैं। पालक सामान्य तापमान में अच्छे से विकास करते हैं, तथा इसके बीजों के अंकुरण लिए 15 से 20 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती हैं। पालक अधिकतम 30 डिग्री तथा न्यूनतम 5 डिग्री तापमान को आसानी से सहन कर सकता हैं। ठंड के मौसम में पालक की उपज बढ़ जाती है और गुणवत्ता भी अच्छी बनी रहती है। तथा जैसे-जैसे तापमान बढ़ता हैं इसकी गुणवत्ता और उपज बिगड़ जाती हैं। 

  • पालक को बोने का सही समय : आपकों बता दें की पालक को अलग-अलग महीने में बुवाई कर इसकी खेती पूरे साल कर सकते हैं, लेकिन पालक की फसल से अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए इसे बोने का सही समय जनवरी-फरवरी, जून-जुलाई और सितम्बर-अक्टूबर महीने का होता हैं। यदि इन्हीं महीनों में पालक की बुवाई की जाए तो पालक की अच्छी पैदावार प्राप्त होती हैं।

पालक की उन्नत किस्म 

  • पंजाब सिलेक्शन : पालक की यह किस्म हल्के हरे रंग के, पतले, लम्बे और संकीर्ण पत्ते वाली है। इस किस्म का तना जामुनी रंग का होता है। पालक की इस किस्म से औसतन पैदावार 115 से 120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।  

  • अर्का अनुपमा :  पालक की यह किस्म गहरे हरे रंग की और आकार में बड़ी, चौड़ी पत्तियों वाली होती है। पालक की यह किस्म 40 दिन बाद पैदावार देने के लिए तैयार हो जाती है। पालक की इस किस्म से औसत पैदावार 125 से 130 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।

  • ऑल ग्रीन : इस किस्म की पौधे की पत्तियों का रंग हरा तथा आकार चौड़ा तथा मुलायम होता है। पालक की यह किस्म 35 से 40 दिन के पश्चात कटाई के लिए तैयार हो जाता है। इस किस्म को सर्दियों में उगाया जाता है तथा इसके पौधों की कटाई 5 से 7 बार किया जा सकता है। 

  • पंजाब ग्रीन : पालक के इस किस्म के पौधे के पत्ते अर्द्ध सीधे और गहरे हरे चमकीले रंग के होते है। यह किस्म बुवाई के बाद 30 से 35 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसकी औसतन पैदावार 125 से 140 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है।

  • पूसा ज्योति : पालक की इस किस्म का पौधा 45 दिन बाद पैदावार देने के लिए तैयार हो जाता है। इस किस्म के पौधे से निकलने वाली पत्तिया लम्बी, चौड़ी तथा गहरे रंग की होती हैं। इसके पौधों के तैयार हो जाने पर 7 से 10 बार कटाई की जा सकती हैं। यह पालक की अधिक पैदावार देने वाली किस्म हैं, जो औसतन पैदावार 150 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के हिसाब देती है। इस किस्म को अगेती और पछेती दोनों ही खेती के उत्पादन के लिए उगाया जाता है।

उत्तर - भारत में पालक की बेहतर उत्पादन देने वाली किस्में :

आल ग्रीन, पूसा हरित, पूसा ज्योति, बनर्जी जाइंट, जोबनेर ग्रीन हैं। किसान को किस्मों का चयन अपने क्षेत्र जलवायु और मिट्टी के हिसाब से करना चाहिए।

पालक के खेत की तैयारी

पालक की अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए इसके खेत को अच्छी तरह से तैयार करें। इसके लिए पहले खेत में 250 से 300 क्विंटल गोबर की सडी खाद प्रति हेक्टेयर की दर से डालकर हैरो या कल्टीवेटर से खेत की जुताई करें। ताकि मिट्टी भूरभूरी हो जाए। साथ ही गोबर की खाद मिट्टी में अच्छी तरह से मिल भी जाए। पैदावार अच्छी हो इसके लिए खेत में पाटा लगाने से पहले 1 क्विंटल नीम की पत्तियों से तैयार की गई खाद को खेत में हर तरफ बिखेर देना चाहिए। बुवाई के समय 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फॉस्फोरस व 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हैक्टेयर की दर से खेत में डाले। इस प्रकार आपका खेत पालक की खेती के लिए पूरी तरह तैयार हो जायेगा। पालक की एक बार कटाई करने के बाद 20 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हैक्टेयर की दर से खेत में डालना चाहिए। इससे पालक की बढवार अच्छी होगी।

  • बीज की मात्र : पालक के खेत की बीजाई छिड़काव एवं कतारों दोनों ही विधि द्वारा की जाती हैं। इसकी खेती के लिए पर्याप्त मात्रा में बीज की आवश्यकता होती है। पालक की खेती से अच्छा उत्पादन प्राप्त करने के लिए अच्छी किस्म के उन्नतशील बीजों का ही प्रयोग करना चाहिए। पालक के अच्छे एवं उन्नतशील बीज को अपने स्थानीय  कृषि मंड़ी या फिर बाजारों से प्राप्त कर सकते हैं। इनके बीजों की बात करें तो 25 से 30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से पर्याप्त होता हैं। इसके बीज को बोने से पहले 5-6 घंटों के लिए पानी में भिगोना जरूरी है। इतना ही नहीं बुवाई के समय खेत में भी नमी होनी चाहिए। बीज को चाहे आप लाइनों में बोएं या छिटकवा विधि से इस बात का ध्यान रखें की बीज ज्यादा पास-पास न गिरें। 

  • पालक के बीजों की बुवाई : पालक की बुवाई दोनों विधि से की जाती हैं। इसकी बुवाई के लिए पहले से तैयार खेत में क्यारियों और मेड़ को तैयार करें। इन क्यारियों को तैयार करते समय क्यारियों के मध्य एक फीट की दूरी अवश्य रखे तथा क्यारियों में लगाए गए बीजों के मध्य 5 से 10 से.मी. की दूरी रखें। इसके बीजों को भूमि में दो से तीन सेमी गहराई में बोना चाहिए। जिससे बीजों का अंकुरण अच्छी तरह से हो। इसके अलावा छिड़काव विधि से बीजों  को खेत में लगाने के लिए खेत में उचित आकार की क्यारियों को तैयार कर उन क्यारियों में छिड़क दिया जाता है। इसके बाद हाथ या दंताली की सहायता से बीजों को भूमि में दबा दिया जाता है।   

पालक के खेत की देखभाल 

  • खेत की सिंचाई : इसके बीजों के बढि़या अंकुरण और विकास के लिए मिट्टी में नमी का होना बहुत आवश्यक है। यदि मिट्टी में नमी अच्छी तरह से ना हो, तो बिजाई से पहले सिंचाई करें या फिर बिजाई के बाद पहली सिंचाई करें। गर्मी के महीने में 4 से 6 दिनों के अन्तराल में सिंचाई करें। सर्दियों में 10 से 12 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई करें। ज्यादा सिंचाई करने से परहेज करें। ड्रिप सिंचाई पालक की खेती के लिए लाभदायक सिद्ध होती है।

  • निराई-गुडाई : पालक हरे पत्तियों वाली सब्जी हैं। इस कारण इसके खेत को अधिक निराई-गुडाई की आवश्यकता होती है। इसके खेत को खरपवार मुक्त रखना ज्यादा जरूरी होता है। अगर इसके खेत में खरपतवार रहती है तो इसके पौधों में कीट लगने का खतरा रहता है जिससे पैदावार पर असर पड़ता है। इसकी खेती में अच्छी पैदावार के लिए खेत को खरपतवार मुक्त रखने के लिए समय-समय पर प्राकृतिक विधि से निराई गुड़ाई करते रहना चाहिए। अगर आप रासायनिक विधि से खरतपवार नियंत्रण करना चाहते हैं, तो इसके लिए आप पेंडीमेथिलीन की उचित मात्रा का छिड़काव करें। पालक के खेत की पहली निराई-गुडाई बिजाई के 15 से 20 दिन बाद किया जाना चाहिए। इसके बाद समय-समय पर खेत में खरपतवार दिखाई देने पर उनकी गुड़ाई कर दें। 

  • कीट एवं रोकथाम : पालक की खेती में कैटर पिलर नामक कीट का प्रकोप पाया जाता हैं,, जो पहले पालक की पत्तियों को खाता है और बाद में तना भी नष्ट कर देता हैं। गर्मियों के मौसम में पत्तों को खाने वाली इल्लियां हो जाती हैं। ऐसे कीटों से फसल को बचाने के लिए किसानों को फसल में जैविक कीटनाशकों का ही प्रयोग करना चाहिए। इसके लिए किसान को नीम की पत्तियों का घोल बनाकर 15 से 20 दिनों के अंतर से फसल पर छिडकाव करना चाहिए। इसके अतिरिक्त 20 लीटर गौमूत्र में 3 किलो नीम की पत्तियां व आधा किलो तंबाकू घोल कर फसल में छिडकाव करने से कीटों पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। इसके अलावा आप चाहें तो वेस्ट डीकंपोजर के घोल में नीम की पत्तियों को मिलाकर भी छिडकाव कर सकते हैं। 

  • कटाई एवं होने वाली कमाई : पालक की फसल की कटाई उसके किस्म, बुवाई का समय, तरीका एवं जलवायु पर निर्भर करती हैं। वैसे तो आमतौर पर पालक की बुवाई करने के बाद लगभग 25 दिनों के बाद जब पत्तियों की लंबाई 15 से 30 सेंटीमीटर तक हो जाए तो पहली कटाई कर देनी चाहिए। कटाई करते समय इस बात का ध्यान जरूर रखें कि पौधों की जड़ों से 5 से 6 सेंटीमीटर ऊपर तक ही पत्तियों की कटाई करें। इसके बाद 15 से 20 दिनों के अंतराल से कटाई करते रहें। कटाई के बाद फसल की सिंचाई जरूर करें। साथ ही उचित मात्रा में नाईट्रोजन का भी छिड़काव कर दें। इससे पौधों जल्दी वृद्धि करेगे।

यदि पालक की खेती का प्रति हैक्टेयर की दर से अनुमान लगाया जाए, तो 150 से 250 क्विंटल तक की उपज हो सकती है। जिसे बाजार में 15 से 20 रुपए किलो की दर से बेचा जा सकता है। इस तरह यदि प्रति हैक्टेयर की दर से लागत के करीब 25 हजार रुपए निकाल दिए जाएं तो भी लगभग 1500 रुपए प्रति क्विंटल की दर से 200 क्विंटल से 3 महीने में करीब 2 लाख 75 हजार रुपए तक की इनकम हो सकती है।

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