सोयाबीन की खेती : ग्रीष्‍म कालीन में सोयाबीन की खेती से मिलेगा दोहरा लाभ

सोयाबीन की खेती : ग्रीष्‍म कालीन में सोयाबीन की खेती से मिलेगा दोहरा लाभ
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जानें, कैसे की जाती है सोयाबीन की उन्नत खेती और बुवाई का अनुकूल समय 

वर्तमान समय में देश ने कृषि क्षेत्र में काफी उन्नति की है। बदलते समय के साथ देश के किसानों ने खेती करने के परंपरागत तरीको में काफी बदलाव किया है। किसान बदलते समय के साथ खेती से अधिक लाभ कमाने के लिए परंपरागत खेती के अलावा नगदी फसलों की खेती पर भी ध्यान दे रहे हैं। देश के कई क्षेत्र तो ऐसे हैं जहां के किसान अपने खेत का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। साथ ही वर्तमान समय में नगदी फसलों की आधुनिक खेती कर अधिक लाभ भी अर्जित कर रहे है। जैसे कि हम सभी लोग जानते हैं, कि किसान भाइयों ने रबी सीजन की फसलें गेहूं, जौ, सरसों, आलू, प्याज और मटर की फसल की कटाई कर खेत से निकाल लिया है। और अभी इस समय किसानों के खेत खाली हैं। रबी सीजन की फसलों के बाद इन खाली खेत में बोवनी का कार्य जून में बारिश होने के बाद होगी। ऐसे में अब किसानों अपने खेत को खाली छोड़ने की बजाएं उसमें सोयाबीन की बोवनी करना शुरू कर सकते हैं। सोयाबीन तिलहन फसल है, लेकिन सोयाबीन को तिलहन के बजाय दलहन की फसल मानी जाती है। सोयाबीन के बीजों से अधिक मात्रा में तेल होता है। शाकाहारी मनुष्यों के लिए सोयाबीन को मांस भी कहा जाता है क्योंकि इसमें बहुत अधिक प्रोटीन होता है। सोयाबीन का वानस्पतिक नाम ग्लाईसीन मैक्स है। सोयाबीन स्वास्थ्य के लिए एक बहुउपयोगी खाद्य पदार्थ है। सोयाबीन में पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा पायी जाती है, जिस वजह से यह मानव शरीर के लिए अधिक लाभकारी होती है। है। विश्व का 60 फीसदी सोयाबीन अमेरिका में पैदा होता है। भारत मे सबसे अधिक सोयाबीन का उत्पादन मध्यप्रदेश करता है। मध्य प्रदेश, इंदौर में सोयाबीन रिसर्च सेंटर है। यदि आप भी सोयाबीन की खेती करने का मन बना रहे है, तो ट्रैक्टर गुरु की इस पोस्ट को अन्त तक अवश्य पढ़ें, क्योंकि आज की इस पोस्ट में आपको सोयाबीन की खेती कैसे करें के बारे में जानकारी को साझा किया जा रहा है।

सोयाबीन का महत्व

सोयाबीन एक तिलहन फसल के रूप में जानी जाती है। सोयाबीन में अधिक मात्रा में विटामिन पाये जाने के कारण एन्टीबायटिक दवा बनाने के लिए यह विशेष उपयुक्त है। सोयाप्रोटीन के एमीगेमिनो अम्ल की संरचना पशु प्रोटीन के समकक्ष होती हैं। अतः मनुष्य के पोषण के लिए सोयाबीन उच्च गुणवत्ता युक्त प्रोटीन का एक अच्छा स्रोत हैं। सोयाबीन में कार्बोहाइडेंट के रूप में आहार रेशा, शर्करा, रैफीनोस एवं स्टाकियोज होता है जो कि पेट में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों के लिए लाभदायक होता हैं। सोयाबीन तेल में लिनोलिक अम्ल एवं लिनालेनिक अम्ल प्रचुर मात्रा में होते हैं। ये अम्ल शरीर के लिए आवश्यक वसा अम्ल होते हैं। इसके अलावा सोयाबीन में आइसोफ्लावोन, लेसिथिन और फाइटोस्टेरॉल रूप में कुछ अन्य स्वास्थवर्धक उपयोगी घटक होते हैं। सोयाबीन न केवल प्रोटीन का एक उत्कृष्ट स्त्रौत है बल्कि कई शारीरिक क्रियाओं को भी प्रभावित करता है। विभिन्न शोधकर्ताओं द्वारा सोया प्रोटीन का प्लाज्मा लिपिड एवं कोलेस्टेरॉल की मात्रा पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन किया गया है और यह पाया गया है कि सोया प्रोटीन मानव रक्त में कोलेस्टेरॉल की मात्रा कम करने में सहायक होता है। निर्दिष्ट स्वास्थ्य उपयोग के लिए सोया प्रोटीन संभवतः पहला सोयाबीन घटक है।

सोयाबीन में पाये जाने वाले पोषक तत्व

सोयाबीन ऐसा खाद्य पदार्थ है जो लगभग गाय के दूध के समान पूर्ण आहार माना जाता है। इसके बीज में स्टार्च की कम मात्रा तथा प्रोटीन की मात्रा अधिक पायी जाती है। सोयाबीन एक महत्वपूर्ण खाद्य स्रोत है।  सोयाबीन में 42 प्रतिशत प्रोटीन, 22 प्रतिशत तेल, 21 प्रतिशत कार्बोहाइडेंट, 12 प्रतिशत नमी तथा 5 प्रतिशत भस्म होती है। सोयाबीन को प्रोटीन का सबसे अच्छा स्रोत माना जाता है। राष्ट्रीय पोषण संस्थान के अनुसार 100 ग्राम सोयाबीन में लगभग 36.9 ग्राम प्रोटीन पाया जाता है।

गर्मी के महीने में सोयाबीन की खेती से लाभ 

गर्मी के महीनों में सोयाबीन बोएं, तो इसमें बीमारियां लगने की मात्रा कम होती है और यह बारिश शुरू होने से पहले ही अच्छे से तैयार हो जाती है। सोयाबीन दलहनी फसल होने के कारण इसकी जड़ों में ग्रंथियाँ पाई जाती हैं जो जिनमे वायुमंडलीय नत्रजन संस्थापित करने की क्षमता होती हैं जिससे भूमि की उर्वरता बढ़ती है। ऐसे में किसानों को अन्य फसल जैसे घान, ज्वार, बाजरा मूंगफली, गन्ना आदि की खेती करने में किसी तरह की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है। इससे किसानों का दोहरा फायदा होता है। गेहूं और मटर की फसल के बाद अधिकांश किसानों ने अपने खेत में सोयाबीन की खेती करना शुरू कर दिया है। कई जगहों पर तो सोयाबीन के पौधे भी आना शुरू हो गए हैं। इस मौसम में यह फसल 15 दिनों में ही पककर तैयार होकर बाजार में बिकने के लिए तैयार हो जाती है। आपको बता दें कि फूल गावड़ी के आसपास के क्षेत्रों में सोयाबीन की बुवाई करना शुरू भी कर चुके है और पौधे भी उगने शुरू हो गए हैं। इस विषय में किसान भाइयों का कहना है कि वर्षा ऋतु में बोई जाने वाली सोयाबीन की फसल में कई तरह की बीमारियां लगना का डर बना रहता हैं। जिसका सीधा असर फसल के उत्पादन पर होता है। वहीं अगर इस फसल को हम गर्मी के महीनों में बोएं, तो इसमें बीमारियां लगने की मात्रा कम होती है। इसी कारण से किसानों नें अपने खेत को खाली छोड़ने की बचाएं उसमें सोयाबीन की खेती करना शुरू कर दिया। इस समय इस खेती में लागत भी बहुत कम लगती है और बाजार में भी इसके दाम अच्छे मिलते हैं। 

सोयाबीन की उन्नत किस्में 

उत्तर मैदानी क्षेत्र - पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार क्षेत्र के लिए सोयाबीन की उन्नत किस्में।

प्रमुख किस्में - पी के- 416, पूसा- 16, पी एस- 564, एस एल- 295, एस एल- 525, पंजाब- 1, पी एस- 1024, पी एस- 1042, डी एस- 9712, पी एस- 1024, डी एस- 9814, पी एस- 1241और पी एस 1347 आदि है।

मध्य भारत - मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तरी महाराष्ट्र और गुजरात क्षेत्र के लिए सोयाबीन की उन्नत किस्में।

प्रमुख किस्में - जे एस- 93-05, जे एस- 95-60, जे एस- 335, एन आर सी- 7, एन आर सी- 37, जे एस- 80-21, समृद्धि और एम ए यू एस 81 आदि हैद्य

दक्षिणी क्षेत्र - दक्षिणी महाराष्ट्र, कर्नाटक, तामिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश क्षेत्र के लिए सोयाबीन की उन्नत किस्में।

प्रमुख किस्में - को- 1, को- 2, एम ए सी एस- 24, पूजा, पी एस- 1029, के एच एस बी- 2, एल एस बी- 1, प्रतिकार, फूले कल्याणी और प्रसाद आदि है।

उत्तर पूर्वी क्षेत्र - बंगाल, छत्तीसगढ़, उतराखंड, उड़ीसा, आसाम और मेघालय क्षेत्र के लिए सोयाबीन की उन्नत किस्में।

प्रमुख किस्में - बिरसा सोयाबीन- 1, इंदिरा सोया- 9, प्रताप सोया- 9, एम ए यू एस- 71 और जे एस- 80-21 आदि है।

सोयाबीन की सबसे बेस्ट वैरायटी - आरकेएस 24 (RKS 24) Soybean Variety है। 

सोयाबीन की उन्नत किस्म उत्तरी पहाड़ी - हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड क्षेत्र के लिए

प्रमुख किस्में - शिलाजीत, पूसा- 16, वी एल सोया- 2, वी एल सोया- 47, हरा सोया, पालम सोया, पंजाब- 1, पी एस- 1241, पी एस- 1092, पी एस- 1347, वी एल एस- 59 और वी एल एस 63 आदि हैं।

सोयाबीन खेती के लिए सोयाबीन के बीजों की मात्रा एवं बीजोपचार

सोयाबीन की बुवाई हेतु सोयाबीन के दानों के आकार पर बीज की मात्रा का प्रयोग करें। खेत में सोयाबीन पौध संख्या 4 से 4.5 लाख प्रति हेक्टेयर रखे। सोयाबीन के छोटे दाने वाली प्रजातियों के लिये बीज की मात्रा 65 से 70 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करें। सोयाबीन के  बड़े दाने वाली प्रजातियों के लिये बीज की मात्रा 75 से 80 कि.ग्रा. प्रति हेक्टयर की दर से निर्धारित करें। गहरी काली भूमि तथा अधिक वर्षा क्षेत्रों में रिजर सीडर प्लांटर द्वारा कूड (नाली) मेड़ पद्धति या रेज्ड बेड प्लांटर या ब्राड बेड फरो पद्धति से बुआई करें। बीज के साथ किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरको का प्रयोग न करें। बीज रोपाई से पूर्व उन्हें केप्‍टान, थीरम, कार्बेन्‍डाजिम या थायोफेनेट मिथीईल की उचित मात्रा का मिश्रण बनाकर उपचारित कर लिया जाता है। इससे बीज अंकुरण के समय उन्हें रोग लगने का खतरा कम हो जाता है। 

सोयाबीन की खेती के लिए जलवायु, मिट्टी और उपयुक्त तापमान

सोयाबीन की खेती अधिक हल्‍की रेतीली व हल्‍की भूमि को छोडक़र सभी प्रकार की भूमि में सफलतापूर्वक की जा सकती है परन्‍तु पानी के निकास वाली चिकनी दोमट भूमि सोयाबीन के लिए अधिक उपयुक्‍त होती है। जहां भी खेत में पानी रूकता हो वहां सोयाबीन ना लें। ग्रीष्‍म कालीन जुताई 3 वर्ष में कम से कम एक बार अवश्‍य करनी चाहिए। भूमि का पीएच मान 7 से 7.5 के मध्य होना चाहिए। उष्ण जलवायु को सोयाबीन की खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है। सोयाबीन के पौधे गर्म और नम जलवायु में अधिक पैदावार देते हैं। इसकी खेती के लिए अधिक वर्षा की आवश्यकता नहीं होती है। सोयाबीन के पौधे सामान्य तापमान में अधिक उत्पादन देते हैं। इसके बीजो को अंकुरित होने के लिए 20 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है, अधिक तापमान होने पर इसके बीज सही से अंकुरित नही हो पाते हैं।

सोयाबीन की खेती के लिए खेत की तैयारी एवं उर्वरक

सोयाबीन की खेती करने से पहले खेत की मिट्टी संतुलित उर्वरक प्रबंधन एवं मृदा स्वास्थ्य हेतु मिट्टी का मुख्य तत्व जैसे नत्रजन, फासफोरस, पोटाश, द्वितियक पोषक तत्व जैसे सल्फर, केल्शियम, मेगनेशियम एवं सूक्ष्म पोषक तत्व जैसे जस्ता, तांबा, लोहा, मेगनीज, मोलिब्डिनम, बोरॉन साथ ही पी.एच., ई.सी. एवं कार्बनिक द्रव्य का परीक्षण करायें। सोयाबीन की खेती के लिए खेत को तैयार करने के लिए सबसे पहले खाली खेतों की ग्रीष्म कालीन गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से 8 से 10 इंच गहराई तक जुताई करें। इससे हानि पहॅचाने वाले कीटों की सभी अवस्‍थाएं नष्‍ट होगीं। खेत की पहली जुताई के बाद खेत में 20 से 25 गाड़ी पुरानी गोबर की खाद को प्रति हेक्टेयर के हिसाब से दें। खेत में पानी भरने से सोयाबीन की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है अत: अधिक उत्‍पादन के लिए खेत में जल निकास की व्‍यवस्‍था करना आवश्‍यक होता है। जहां तक संभव हो आखरी बखरनी एवं पाटा समय से करें जिससे अंकुरित खरपतवार नष्‍ट हो सके। सोयाबीन की खेती में यदि आप रासायनिक खाद का इस्तेमाल करना चाहते है, तो उसके लिए प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 40 किलोग्राम पोटाश, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 20 किलोग्राम गंधक और 20 किलोग्राम नाइट्रोजन की मात्रा का छिड़काव कर सकते है।

सोयाबीन के बीजो की रोपाई का सही समय और तरीका

खेती के लिए सोयाबीन की बीजों की बुवाई छिंटकवां विधि, सीड ड्रिल से या देशी हल के पीछे कूँड़ो में की जाती है। भारत में ज्यादा तर सोयाबीन छिटकवाँ विधि से बोया जाता है। यह वैज्ञानिक विधि नहीं हैं, क्योंकि इस विधि में पौधे काफी असमान दूरी पर स्थापित होते हैं, जिससे सोयाबीन के बीजों की मात्रा अधिक लगता है और खेती से संबंधित कार्यों जैसे फसल की निराई-गुडाई व कटाई में काफी असुविधा होती है। सोयाबीन की बीजों की बुवाई देशी हल के पीछे अथवा सीड ड्रिल से कतार में बोआई करने पर बीज कम लगता है और पौधे भी समान दूरी पर स्थापित होते है। हल के पीछे कूडो में सोयाबीन की बुआई करने पर देशी हल से संस्तुत दूरी पर कूँड बना लिये जाते हैं जिनमें बीज को डालकर हल्की मिट्टी से ढँक दिया जाता है। अधिक क्षेत्र में बोनी हेतु ट्रैक्टर या पशु चलित बुवाई मशीन (सीड ड्रिल) का प्रयोग किया जाता है। फसल बोने के एक सप्ताह बाद यदि कूँड़ में किसी स्थान पर अंकुरण न हुआ हो तथा मृदा में नमी हो तो खुरपी की सहायता से रिक्त स्थानो में बीज की बुवाई कर देने से अच्छी उपज हेतु खेत में बांछित पौध संख्या स्थापित हो जाती है। सोयाबीन की रोपाई के लिए जून और जुलाई का महीना उपयुक्त माना जाता है।

सोयाबीन की खेती के लिए सिंचाई विधि

सोयाबीन साधारणतः वर्षाधारित फसल है परन्तु लम्बे समय तक वर्षा न हो, तो सिंचाई करना आवश्यक हो जाता है। सोयाबीन की अच्छी फसल को 40 से 50 सेमी. पानी की आवश्यकता होती है। सोयाबीन में फूलने, फलने, दाना बनने तथा दानों के विकास के समय सोयाबीन की सिंचाई बहुत ही जरूरी होता है। सोयाबीन की एक सिंचाई फल्लियों में दाना भरते समय अवश्य करनी चाहिए। बलुई मृदा में भारी मिट्टियो की अपेक्षा सिंचाई अधिक बार करनी पड़ती है। इसके बाद जब पौधों पर फलिया आना आरम्भ कर दे, उस समय पौधों पर नमी बनाये रखने के लिए हल्की-हल्की सिंचाई को जरूरत के हिसाब से करते रहना होता है। लगातार या भारी वर्षा होने पर खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था करना आवश्यक रहता है।

सोयाबीन की खेती में खरपतवार नियंत्रण

सोयाबीन की खेती में खरपतवार नियंत्रण के लिए रासायनिक और प्राकृतिक दोनों ही विधियों का इस्तेमाल किया जाता है। प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए निराई- गुड़ाई की जाती है। इसके पौधों की प्रारंभिक गुड़ाई पौधा रोपाई के 20 से 25 दिन बाद की जाती है, तथा बाद की गुड़ाइयो को भी 20 दिन के अंतराल में करना होता है। इसके अलावा यदि आप रासायनिक विधि द्वारा खरपतवार पर नियंत्रण करते है, तो उसके लिए आपको प्रति हेक्टेयर के हिसाब से मेटोलाक्‍लोर, इमेजेथापायर और क्‍यूजेलेफोप इथाइल की उचित मात्रा का छिड़काव फसल रोपाई के पश्चात करना होता है। इसके अतिरिक्त फ्लुक्लोरोलिन या ड्राइफ्लोरालिन की उचित मात्रा का छिड़काव खेत में बीज रोपाई से पहले करे।

सोयाबीन फसल की कटाई, लाभ और पैदावार

सोयाबीन की फसल बीज रोपाई के 90 से 100 दिन पश्चात फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है। जब इसके पौधों पर लगने वाली पत्तियां पीली पड़कर गिरने लगती है, और फलियों का रंग भी भूरा दिखाई देने लगे उस दौरान फलियों को पौधों से काटकर अलग कर लिया जाता है। फलियों की कटाई के पश्चात उन्हें खेत में अच्छी तरह से सूखा लिया जाता है। इसके बाद सूखी हुई फलियों को थ्रेसर के माध्यम से अलग कर लिया जाता है। सोयाबीन के एक हेक्टेयर के खेत से 20 से 25 क्विंटल का उत्पादन प्राप्त हो जाता है। इसका बाजारी भाव 3,500 से 4,500 रूपए प्रति क्विंटल होता है। जिस हिसाब से किसान भाई इसकी एक बार की फसल से एक से 1.5 लाख रूपये तक की कमाई आसानी से कर सकते है।

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