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नैनो यूरिया : इस नई तकनीक से करेंगे यूरिया का छिड़काव तो होगी भारी बचत

नैनो यूरिया : इस नई तकनीक से करेंगे यूरिया का छिड़काव तो होगी भारी बचत
पोस्ट -18 जुलाई 2022 शेयर पोस्ट

ड्रोन तकनीक से करें यूरिया का छिड़काव, यहां जानें तकनीक की पूरी जानकारी

देश के अधिकांश परिवारों की आय का मुख्य एवं प्राथमिक स्त्रोत कृषि है। देखा जाए तो कृषि उत्पाद भारत के निर्यात में एक बड़ा हिस्सा रखता है, जो देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। कृषि क्षेत्र के चहुंमुखी विकास के लिए केन्द्र और राज्य सरकार अपने-अपने स्तर पर विभिन्न प्रकार की कल्याणकारी योजनाओं का संचालन कर रही है। इसी क्रम में इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑरेटिव लिमिटेड (इफको) ने नैनो यूरिया तरल तैयार किया है। नैनो यूरिया को दानेदार यूरिया रासायनिक खाद के विकल्प के तौर पर तैयार किया गया है। जानकारी के लिए बता दें कि दानेदार यूरिया खाद अधिक महंगे आते है और किसानों को यूरिया कम कीमत पर मिले इसके लिए सरकार हर साल फर्टिलाइजर कम्पनियों को करोड़ रूपये सब्सिडी पर खर्च करती है। 45 किलोग्राम भर्ती वाली दानेदार यूरिया की कीमत 266.50 रुपये प्रति बोरी है, जिससे 28 से 30 प्रतिशत तक पौधे उपभोग कर पाते हैं। शेष बची यूरिया नाइट्रोजन गैस या नाइट्रेट के रूप में जमीन में लीच (निक्षालन) करके, उड़कर व पानी के साथ बह जाता है, जो कि मिट्टी, वायु व जल को प्रदूषित करता है। वहीं नैनो यूरिया 500 मिलीलीटर बोतल की कीमत 240 रुपये है और तरल रूप में होने के कारण इसके छिड़काव से पौधे 70 से 80 प्रतिशत तक यूरिया का उपभोग कर लेते हैं। इससे नैनो यूरिया का प्रयोग कम लागत में अधिक लाभ देने में सक्षम है।

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केन्द्र सरकार ने नैनो यूरिया का प्रयोग करने के लिए किसानों को प्रेरित करने का अभियान तेज कर दिया है। इसी आशय से सरकार अब कृषि क्षेत्र नैनो यूरिया के प्रयोग के लिए ड्रोन तकनीक को बढ़ावा दे रही है। खेत में खड़ी फसलों पर यूरिया और अन्य कीटनाशकों का छिड़काव किसान ड्रोन तकनीक की मदद से कर सके इसके लिए सरकार ड्रोन पर सब्सिडी भी दे रही हैं। नैनो यूरिया लिक्विड का ड्रोन तकनीक से छिड़काव करने के लिए आईजी ड्रोन ने इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑरेटिव लिमिटेड (इफको) के साथ मिलकर फील्ड परीक्षण शुरू किया है। किसानों को नैनो यूरिया का प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। साथ ही उन्हें ड्रोन तकनीक से छिड़काव के लिए प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। ट्रैक्टरगुरू के इस लेख के माध्यम से ड्रोन तकनीक से नैनो यूरिया लक्विड का छिड़काव एवं नैनो यूरिया के बारे में विस्तार से जानकारी देने जा रहे हैं। इस जानकारी से आप कृषि में यूरिया के उपयोग में आने वाली लागत में आधी से भी अधिक की बचत कर सकते हैं। 

नैनो यूरिया तरल (Nano Urea Liquid)

इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड (इफको) ने नैनो यूरिया काे बहुत छोटे आकार में ज्यादा क्षमता के साथ तैयार किया है। इफको नैनो यूरिया तरल की 500 मिली. की एक बोतल सामान्य यूरिय के कम से कम एक बैग यानी बोरी के बराबर होगी। इसके प्रयोग से किसानों की लागत कम होगी. नैनो यूरिया तरल का आकार छोटा होने के कारण इसे पॉकेट में भी रखा जा सकता है जिससे परिवहन और भंडारण लागत में भी काफी कमी आएगी। अब एक बोरी यूरिया खाद की जगह आधे लीटर की नैनो यूरिया की बोतल किसानों के लिए काफी होगी। नैनो यूरिया लिक्विड का इस्तेमाल किसानों के लिए बहुत फायदेमंद है और यदि वह ड्रोन से इसका छिड़काव करने लगें तो लागत सामान्य तौर पर आधी से भी कम आएगी।

सरकार नैनो-यूरिया के प्रयोग से 40,000 करोड़ रूपये की बचत की उम्मीद 

दरअसल, भारत यूरिया का शीर्ष उपभोक्ता है और दुनिया में डाय-अमोनियम फॉस्फेट 2025 तक आत्मनिर्भरता हासिल करने का लक्ष्य हैं। सरकार इफको द्वारा तैयार नैनो-यूरिया पर स्विच करके 40,000 करोड़ रूपये की बचत की उम्मीद जाता रही है। क्योंकि यूरिया खाद में सरकार को एक बैग में एक हजार से 1500 रूपये तक का उपदान देना पड़ रहा है। जब जाकर किसानों को 45 किलो खाद का बैग 266.50 रूपये में मिलता है। जबकि आधा लीटर की नैनो यूरिया 240 रूपये में बेची जा रही है। इस पर सरकार को कोई उपदान भी नहीं देना पड़ रहा है। देश में सालाना लगभग 310 लाख टन उर्वरक की जरूरत होती है। करीब 55 लाख टन उर्वरक आयात करना पड़ता है। उपरोक्त नैनो यूरिया के प्रयोग से भारत आत्मनिर्भर होने के साथ ही निर्यातक देश की सूची में शुमार हो जाएगा। 

उत्पादकता को बढ़ाने वाला उच्च क्षमता वाला खाद है नैनो यूरिया लिक्विड

नैनो यूरिया उच्च क्षमता वाला खाद है, इफको नैनो यूरिया पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल है। लीचिंग और गैसीय उत्सर्जन के जरिये खेतों से हो रहे पोषक तत्वों के नुकसान से पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन पर असर हो रहा है। इसे नैनो यूरिया के प्रयोग से कम किया जा सकता है क्योंकि इसका कोई अवशिष्ट प्रभाव नहीं है। भारत दुनियाभर में कृषि में एक प्रमुख खिलाड़ी हैं। ऐसे में मिट्टी, पानी और पोषक तत्व प्रबंधन में सुधार के माध्यम से फसल उत्पादकता में वृद्धि हासिल की जा सकती है, जिससे कृषि क्षेत्र की तेजी को बनाए रखने में मदद मिलेगी। ऐसे में ज्यादातर अधिकारी नैनो यूरिया तरल पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि यह कम कीमतों पर उर्वरकों के निर्बाध प्रावधान में सुधार करने के लिए भूमिगत जल की गुणवत्ता में सुधार, फसल के आहार और उत्पादकता को बढ़ाने में बेहद उच्च गुणवत्ता वाला पाया गया है।

बनाए जाएंगे आठ माइक्रो यूरिया संयंत्र देशभर में 

गुजरात के कलोल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आधिकारिक तौर पर इतिहास में पहले नैनो यूरिया तरल संयंत्र को हरी झंडी दिखाई है। भारत सरकार द्वारा अनुमोदित और उर्वरक नियंत्रण आदेश द्वारा कवर किया गया एकमात्र नैनो उर्वरक इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड (ईफको) द्वारा निर्मित नैनो यूरिया है। इफको ने दुनिया में पहली बार नैनो तकनीक की शुरुआत की, ताकि उर्वरकों के प्रसार में किसानों की मदद की जा सके। इसी के चलते पोषक तत्वों के समान वितरण में ड्रोन की मदद से एक फील्ड परीक्षण किया गया। नैनो यूरिया परंपररागत नाइट्रोजन यूरिया का बेहतर विकल्प है, 45 किलो यूरिया की जगह 500 एमएल नैनो यूरिय पर्याप्त है। यह सब्सिडी वाले यूरिया से भी सस्ता है, इससे सरकार के उर्वरक सब्सिडी में भी बचत होगी एवं उर्वरक आयात पर होने वाले विदेशी मुद्रा के खर्च में कमी आएगी।  जानकारी के लिए बता दें कि इनमें से आठ माइक्रो यूरिया संयंत्र देश भर में बनाए जाएंगे। 2025 तक, तरल उर्वरकों के लिए वैश्विक बाजार का आकार 4.4 प्रतिशत  के सीएजीआर के साथ 3 बिलियन अमरीकी डॉलर होने का अनुमान है।

खेती की लागत में आएगी कमी 

भारत में कूल नाइट्रोजन उर्वरकों में से 82 प्रतिशत हिस्सा यूरिया का है और पिछले कुछ वर्षों में इसकी खपत में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई। परम्परागत यूरिया का लगभग 30 से 50 प्रतिशत नाइट्रोजन ही पौधों के काम आता है। बाकी वाष्पीकरण और पानी व मिट्टी के बहाव व कटाव आदि के बीच बेकार चला जाता है। तरल  नैनो यूरिया से पोषक तत्वों का सदुपायोग बढ़ता है और यह लंबे समय में प्रदूषण और वायुमंडल गर्म होने की समस्या को कम करने में सहायक हो सकता है। खेत में खडी फसलों पर नैनो यूरिया का ड्रोन तकनीक के उपयोग से कम समय में छिड़काव किया जाएगा। साथ ही ड्रोन से किसान फसलों की समस्याओं पर नजर रख उन्हें ठीक करने के उपाय भी कर सकते है। इससे किसानों के पास अधिक समय बचेगा और खर्च भी कम आएगा यानी छिड़काव में कम पैसे खर्च होंगे। ड्रोन तकनीक पोषक तत्वों एवं कीटनाशकों को तेजी से फैलाने का एकमात्र साधन है। इसकी सबसे बड़ी बात है कि यह सबसे किसानों के लिए वित्तीय बचत में तब्दील होगा। साथ ही स्प्रिंकलर की सुरक्षा की भी गारंटी दी जाएगी। 

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