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प्रसिद्ध नागपुरी संतरे की खेती में अपनाएं ये वैज्ञानिक तरीका, मिलेगी बंपर पैदावार

प्रसिद्ध नागपुरी संतरे की खेती में अपनाएं ये वैज्ञानिक तरीका, मिलेगी बंपर पैदावार
पोस्ट -30 नवम्बर 2022 शेयर पोस्ट

नागपुरी संतरे : महाराष्ट्र के विदर्भ में बड़े पैमाने पर होती है इसकी खेती, जानें पूरी खबर 

नागपुरी संतरा स्वास्थ्य की दृष्टि से एक महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्यवर्धक फल है। इसमें प्रचुर मात्रा में विटामिन सी होता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें विद्यमान फ्रुक्टोज, डेक्स्ट्रोज, खनिज एवं विटामिन शरीर में पहुंचते ही ऊर्जा देना प्रारंभ कर देते हैं। संतरे के सेवन से शरीर स्वस्थ रहता है, चुस्ती-फुर्ती बढ़ती है, त्वचा में निखार आता है तथा सौंदर्य में वृद्धि होती है। इसके नियम नियमित सेवन से स्वास्थ्य हृष्ट-पुष्ट बना रहता हैं। वर्तमान समय में नागपुरी संतरा पंजाब के ’कीनू’ संतरा को टक्कर दे रहा है। स्थानीय बाजारों से लेकर विदेशी बाजारों में भी नागपुरी संतरे की मांग बढ़ती जा रही है। विदर्भ में पैदा होने वाला यह संतरा ज्यादा टेस्टी होता है। और यह स्वास्थवर्धक गुणों के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन अपेक्षाकृत कम आकर्षक होने के कारण लोग ज्यादा नहीं खरीदते हैं। ऐसे में नागपुरी संतरे को आकर्षक बनाने के लिए कृषि महाविद्यालय नागपुर की ओर से संशोधन किया जा रहा है, ताकि वह ‘कीनू’ की तरह आकर्षित करे। लेकिन अब कृषि वैज्ञानिकों ने नागपुर संतरे की कई ऐसी उन्नत किस्में विकसित कर दी हैं, जिनकी खेती देश के दूसरे राज्यों में भी हो सकती है। तो चलिए ट्रैक्टर गुरू की इस पोस्ट में नागपुरी संतरे की खेती कैसे करे तथा उसकी उन्नत किस्म और पैदावार के जानते हैं। 

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प्रसद्धि नागपुरी संतरे का सबसे बड़ा उत्पादक राज्य

भारत में नागपुरी संतरे की खेती फल के रूप में मुख्य तौर पर महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में काफी बड़े पैमाने पर होती है। देश में संतरे का कुल क्षेत्रफल 4.28 लाख हेक्टेयर है, जिससे 51.01 लाख टन उत्पादन होता। महाराष्ट्र इस उत्पादन में 80 प्रतिशत की हिस्सेदारी देता है। महाराष्ट के सौसर और पांढुर्ना के इलाके में भी संतरे की खेती होती है। नागपुर, जिसे ऑरेंज सिटी के रूप में जाना जाता है, जिले के इन दो क्षेत्रों से संतरे की आपूर्ति की जाती है। महाराष्ट्र में विदर्भ के अलावा पश्चिमी महाराष्ट्र और मराठवाड़ा के किसानों के पास भी संतरे की खेती करने की संभावना है। संतरे को वानस्पतिक रूप से सिट्रस रिटीकुलेटा के नाम से जाना जाता है। भारत में नींबू प्रजाति के फलों में संतरे का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है इसे मेंडेरीन भी कहते हैं। 

नगापुरी संतरें की फलों की तुडाई, पैदावार और लाभ 

संतरे की फलों की तुड़ाई उचित अवस्था पर करना अत्यंत आवश्यक होता है। इसके पौधे रोपण के बाद पूर्ण रूप से विकसित होने में 3 से 5 साल का समय लेते है। यानि इसके पौधे 3 से 5 साल के पश्चात फल देना आरंभ कर देते है। पूर्ण विकसित पौधे में प्रायः पुष्पन के 8 से 9 माह बाद फल पक कर तैयार हो जाते है। इसके फलों की तुड़ाई जनवरी से मार्च के महीने तक की जाती है। संतरे के फलों का रंग हल्का पीला और आकर्षक हो जाये तब इन्हें तोड़ लेें। फलों की तुड़ाई कैंची की सहायता से की जाती है। तुड़ाई करते समय फल को डंठल के साथ तोड़ा जाना चाहिए। एक पूर्ण विकसित एवं स्वस्थ संतरे के पेड़ से 125-150 कि.ग्रा. तक उपज प्राप्त हो जाती है। वहीं एक एकड़ खेत में इसके करीब 100 से ज्यादा पौधे लगा सकते हैं। जिनकी एक बार में कुल उपज करीब 12500 से 15000 किलो तक होती है। संतरे का बाजार में थोक भाव करीब 10 से 30 रूपये प्रति किलो तक होता है। जिससे किसान भाई इसकी एक बार की फसल से अच्छी आमदनी कर सकते है। 

संतरे की सबसे अच्छी और उन्नत किस्में

संतरे की सबसे अच्छी किस्म नागपुरी संतरा है। संतरों की अन्य किस्मो की बजाए नागपुरी संतरें टिकाऊ, स्वादिष्ट व निर्यात योग्य होते हैं। नागपुरी संतरें की किस्म मूलतः महाराष्ट्र इलाके की है। इसके अलावा संतरें की कई अन्य उन्नत किस्में जैसे इसके वाला खासी संतरा, कुर्ग संतरा, पंजाब देसी, दार्जिलिंग संतरा व लाहौर लोकल इत्यादि उन्नत किस्में पाई जाती हैं, जिन्हें आप अपने क्षेत्र के अनुसार इसका खेती के लिए चयन कर सकते है। 

संतरें की खेती के लिए जलवायु 

संतरा शुष्क जलवायु का पौधा है। यह शुष्क जलवायु में अच्छी तरह उगाया जा सकता है। इसके पौधों को ज्यादा बारिश की जरूरत नही पड़ती है। इसके फलों को पकने के लिए गर्म एवं शुष्क जलवायु की आवश्यकता होती है। लम्बे समय तक उच्च तापमान रहने से फलों में मिठास बढ़ती है। इसकी खेती के लिए शुरुआत में पौधों की रोपाई के दौरान करीब 20 से 25 डिग्री के बीच तापमान रहना चाहिए। पौधों को विकास करने के लिए करीब 30 डिग्री के आसपास तापमान की जरुरत होती है।

संतरें की  खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी

संतरें की खेती किसी भी प्रकार की मिट्टी में कर सकते हैं। लेकिन अधिक जलभराव वाली मिट्टी इसकी खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती है। संतरे की खेती के लिए उचति जल निकासी वाली काली मिट्टी को उपयुक्त माना जाता है। खेत में मिट्टी की गहराई 2 मीटर तक की होनी चाहिए। मिट्टी का पीएच मान 4.5 से 7.5 तक का होना चाहिए।

संतरें की खेती के लिए पौध तैयार कैसे करें? 

संतरें के पौधों की रोपाई पौध के रूप में की जाती है, इसके लिए संतरे के बीजो से नर्सरी में पौधों को तैयार किया जाता है। इसके पौधों को कलम विधि से भी तैयार करके खेत की रोपाई की जा सकती है। कलम द्वारा तैयार पौधा तीन वर्ष में पैदावार देना आरम्भ कर देता है। 

कलम विधि द्वारा- संतरें की व्यावसायिक खेती के लिए पौधा कलमविधि से तैयार किया जाता है। इस विधि में पुरानें संतरें के पौधों से पेन्सिल समान मोटाई वाली स्वस्थ, ओजस्वी, परिपक्व, 45 से 60 से.मी. लम्बाई की शाखा का चयन करें। शाखा से कलिका के नीचे 3 से.मी. चौड़ी गोलाई में छाल पूर्णरूप से अलग कर दें। छाल निकाली गई शाखा के ऊपरी भाग में आई. बी.ए. 10,000 पी.पी.एम. का लेप लगाकर नमी युक्त स्फेगनम मास चारों और लगाकर पॉलीथीन से ढ़ँककर रस्सी से बाँध दें। जब पालीथीन से जड़े दिखाई देने लगें उस समय शाखा को स्केटियर से काटकर क्यारी या गमलो में लगा दें। 

बीजों द्वारा- इसके बीजों से पौधे तैयार करने के लिए इसके बीजों को राख में मिलकर सूखाएं इसके बाद इन बीजों को मिट्टी भरकर तैयार किये गए पॉलीथिन बैंग में दो से तीन बीज उगाने चाहिए। इसके बीजों को अंकुरित होने में दो से तीन सप्ताह का समय लग जाता हैं।

संतरे की खेती में पौधा रोपाई का सही समय 

संतरे के पौधों की रोपाई पौध के रूप में की जाती हैं। इसके पौधों की रोपाई के लिए बारिश का मौसम सबसे अच्छा माना जाता है। संतरे के पौधों की रोपाई जून से जुलाई या फरवरी से मार्च के बीच में कि जाती है। इसके पौधा रोपण से लगभग 1 महीना पहले मई-जून के महीने में 6 बाई 6 मीटर की दूरी पर गड्ढे खोद लें। ये गड्ढे लगभग 60 सेमी लंबे, 60 सेमी चौड़े और 60 सेमी गहरे होने चाहिए। सामान्यतः दूरी 4 से 5 मीटर की होनी चाहिए। अब इन गड्ढों लगभग 20 किग्रा सड़ी हुई गोबर की खाद, 1 किग्रा सिंगल सुपर फॉस्फेट, 0.50 ग्राम क्लोरो पायरीफास का चूर्ण तैयार कर इन सभी को गड्‌ढों की सतह से 15 सेमी. ऊंचाई तक भर दें। साथ ही दीमक के नियंत्रण के लिए मिथाइल पैराथियान 50 से 100 ग्राम प्रति गड्ढे भरे। अब इन गड्ढ़ों मे पौधों की रोपाई से पहले संतरें के पौधों को क्लोरपाइरीफोस पाउडर से उपचारित करलें। इसके बाद उपचारित पौधों को पहले तैयार गड्डो में लगाकर उन्हें चारो तरफ मिट्टी से अच्छे से ढकनें के लिए उँगलियों से अच्छी तरह दबा दें। पौध लगाते समय खेत की मिट्टी गीली होनी चाहिए। हलकी बारिश के समय रोपण अत्यंत लाभकारी होता है।

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