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चौलाई की खेती : कम लागत में अधिक मुनाफे के लिए करें चौलाई की खेती

चौलाई की खेती : कम लागत में अधिक मुनाफे के लिए करें चौलाई की खेती
पोस्ट - June 13, 2022 शेयर पोस्ट

इस तरीके से करें चौलाई की खेती और करें अच्छी खासी कमाई

भारत में चौलाई की खेती लगभग सभी जगह पर की जा सकती हैं। यह फसल पत्तियों वाली सब्जियों की मुख्य फसल है। इसकी खेती हरे साग के लिए की जाती है। इसलिए इस फसल की खेती मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों के आसपास सबसे ज्यादा की जाती है। किसान भाई इस फसल की खेती नगदी फसल के रूप में करता है। भारत के अलावा चौलाई की खेती दक्षिणी पूर्वी एशिया, पूर्वी अफ्रीका, मध्य एवं दक्षिणी अमेरिका और पश्चिम अफ्रीका देशो में अधिक मात्रा में की जाती हैं। चौलाई को भारत में विभिन्न जगहों पर राजगिरी और रामदाना के नाम से भी जाना जाता है। चौलाई की खेती के लिए अर्ध शुष्क वातावरण को उपयोगी माना जाता हैं। इसके पौधों को विकास करने के लिए सामान्य तापमान की जरूरत होती हैं। चौलाई को गर्मी और बरसात दोनों मौसम में उगाया जा सकता हैं। लेकिन अधिक उपज लेने के लिए इसे शुष्क मौसम में उगाना अच्छा होता है। वर्तमान समय में कई किसान भाई शहरी क्षेत्रों के आस पास इस पत्तियो वाली सब्जी की खेती कर अच्छी खासी कमाई कर रहें है। अगर आप भी चौलाई की खेती कर इस मौसम में भी अपने खेतों से अधिक मुनाफा कमाना चाहले है, तो आज ट्रैक्टर गुरु की इस पोस्ट में आपको चौलाई की खेती करने की उन्नत तरीके की जानकारी दी जा रही है। आशा करते है की आज की इस जानकारी से आपकों चौलाई की खेती करने में लाभ मिलेगा।     

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चौलाई के पौधे के बारें में 

चौलाई का वानस्पतिक नाम अमेरेन्थस स्पिनोसस हैं। यह खरपतवार पौधों की एक जाति है, जो पूरे विश्व में पायी जाती है। अब तक इसकी लगभग 60 प्रजातियां पाई व पहचानी गई हैं। यह सीधा और लगभग 80 सेमी तक ऊँचा शाकीय पौधा है। इसके पत्ते एकान्तर, भालाकार या आयताकार 3 से 9 सेमी लम्बे तथा 2.5 से 6 सेमी तक चौड़े होते हैं। इसके फूल पीले-हरे रंग के या लाल-बैंगनी रंग के तथा गुच्छों में लगे हुए होते हैं। इसका प्रयोग सब्जी के रूप में किया जाता है। गर्मी और बरसात के मौसम के लिए चौलाई बहुत ही उपयोगी पत्तेदार सब्जी होती है। अधिकांश साग और पत्तेदार सब्जियां शित ऋतु में उगाई जाती हैं, किन्तु चौलाई को गर्मी और वर्षा दोनों ऋतुओं में उगाया जा सकता है। इसे अर्ध-शुष्क वातावरण में भी उगाया जा सकता है पर गर्म वातावरण में अधिक उपज मिलती है। 

चौलाई का औषधीय उपयोगिता

चौलाई एक ऐसा साग है जो की लाल और हरे दोनों ही रंग में आता है। यह न सिर्फ एक स्वादिष्ट सब्जी है बल्कि चौलाई के फायदे इतने होते हैं जो बहुत से रोगों को ठीक कर सकते हैं। चौलाई का सेवन भाजी व साग के रूप में किया जाता है जो विटामिन सी से भरपूर होता है। इसमें अनेकों औषधीय गुण होते हैं, इसलिए आयुर्वेद में चौलाई को अनेक रोगों में उपयोगी बताया गया है। सबसे बड़ा गुण सभी प्रकार के विषों का निवारण करना है, इसलिए इसे विषदन भी कहा जाता है। इसमें सोना धातु पाया जाता है जो किसी और साग-सब्जियों में नहीं पाया जाता। औषधि के रूप में चौलाई के पंचाग यानि पांचों अंग- जड, डंठल, पत्ते, फल, फूल काम में लाए जाते हैं। इसकी डंडियों, पत्तियों में प्रोटीन, खनिज, विटामिन ए, सी प्रचुर मात्रा में मिलते है। चौलाई पेट के रोगों के लिए भी गुणकारी होती है क्योंकि इसमें रेशे, क्षार द्रव्य होते हैं जो आंतों में चिपके हुए मल को निकालकर उसे बाहर धकेलने में मदद करते हैं जिससे पेट साफ होता है, कब्ज दूर होता है, पाचन संस्थान को शक्ति मिलती है। छोटे बच्चों के कब्ज में चौलाई का औषधि रूप में दो से तीन चम्मच रस लाभदायक होता है। चौलाई का नित्य सेवन करने से अनेक विकार दूर होते हैं।

चौलाई कितने प्रकार की होती है

चौलाई की अब तक 60 प्रजातियां पहचानी गई है। जिनमें से कई प्रजातियां भारम में मिलती और प्रयोग की जाती है। 

  • छोटी चौलाई : चौलाई की इस किस्म को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा विकसित किया गया है। इसके पौधे सीधे बढ़वार वाले तथा छोटे आकार के होते है, पत्तियाँ छोटी तथा हरे रंग की होती है। यह किस्म वसंत तथा बरसात में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है।

  • बङी चौलाई : इस किस्म को भी भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित किया गया है। इसकी पत्तियाँ बङी तथा हरे रंग की होती है और तने मोटे, मुलायम एवं हरे रंग के होते हैं। यह ग्रीष्म ऋतु में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है।

  • पूसा कीर्ति : इसकी पत्तियाँ हरे रंग की काफी बड़ी, 6 से 8 सेमी. लम्बी और 4 से 6 सेमी चौङई होती है तथा डंठल 3 से 4 सेमी. लम्बा होता है। इसका तना हरा और मुलायम होता है। यह ग्रीष्म ऋतु में उगाने के लिए बहुत उपयुक्त किस्म है।

  • पूसा लाल चौलाई : इस किस्म को भी भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा ही विकसित किया गया है। इसकी पत्तियाँ लाल रंग की काफी बङी लगभग 7.5 सेमी. लम्बी और 6.5 सेमी. चौङी होती हैं। इसकी पत्तियों के डंठल की लम्बाई 4 सेमी. होती है। इसका तना भी गहरे लाल रंग का होता है तथा तना और पत्ती का अनुपात 1: 5 का होता है।

  • पूसा किरण : यह बरसात के मौसम में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है। इसकी पत्तियाँ मुलायम हरे रंग की तथा चौङी होती है और पत्ती के डंठल की लम्बाई 5 से 6.5 सेमी. होती है।

  • कपिलासा : चौलाई की इस किस्म को जल्द पैदावार देने के लिए तैयार किया गया है। इस किंस्म का उत्पादन 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के आसपास पाया जाता है। इस किस्म के पौधों की लम्बाई लगभग दो मीटर के आसपास पाई जाती है। इस किस्म के पौधे हरी सब्जी के रूप में रोपाई के 30 से 40 दिन बाद ही पहली कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं।

  • आर एम ए 4 : चौलाई की इस किस्म को कृषि अनुसंधान केंद्र, मंडोर के द्वारा तैयार किया गया है। इस किस्म के पौधे सामान्य रूप से एक से डेढ़ मीटर तक की ऊंचाई के पाए जाते हैं। इस किंस्म का उत्पादन 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के आसपास पाया जाता है। हरी पतियों की पैदावार के रूप में इस किस्म के पौधों की पहली कटाई किसान भाई बीज रोपाई के लगभग 30 से 40 दिन बाद कर सकते हैं।

चौलाई की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी

चौलाई को बरसात और गर्मी दोनों मौसम में उगाया जा सकता है। इसकी खेती किसी भी कार्बनिक पदार्थों से भरपूर उपजाऊ उचित जल निकासी वाली मिट्टी में की जा सकती है। आपको बता दें, चौलाई की खेती जलभराव वाली मिट्टी में नहीं की जा सकती है। दरअसल जलभराव वाले खेतों में चौलाई के पौधे अच्छे से विकसित नहीं हो पाते हैं, ऐसे में यह पकने से पहले ही खराब हो जाती है। इसकी अच्छी पैदावार के लिए कार्बनिक पदार्थों से भरपूर और जल निकासी वाली भूमि का ही चयन करें। इसकी खेती के लिए भूमि का पी. एच मान 6 से 8 के बीच होना चाहिए।

चौलाई की खेती के लिए जलवायु और तापमान

चौलाई की खेती अर्ध-शुष्क वातावरण में भी कि जा सकती है, लेकिन गर्म वातावरण में इसकी खेती के लिए उपयुक्त माना गया है। जबकि सर्दी का मौसम चौलाई की खेती के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। चौलाई के पौधों को अंकुरित होने के लिए करीब 20 से 25 डिग्री के बीच तापमान की आवश्यकता होती है। तथा इसके बाद जब पौधे अंकुरित हो जाते हैं तब उनके विकास के लिए करीब 30 डिग्री के आसपास तापमान सही माना गया है। हालांकि गर्मी के मौसम में अधिकतम 40 डिग्री तापमान पर भी चौलाई के पौधे अपने आप विकास कर लेते हैं, लेकिन इस दौरान आपको इसकी सिंचाई पर भी अधिक ध्यान देना होता है। चौलाई के पौधें न्यूनतम 15 डिग्री का तापमान सहन कर सकते हैं।

चौलाई के खेत में उर्वरक की मात्रा कितनी प्रयोग करें

चौलाई खेती साग के लिए की जाती है। इस कारण इसकी खेती में ज्यादा उर्वरक की जरूरत होती है। इसकी खेती से बार बार साग प्राप्त करने के लिए इसे अधिक पोषक तत्व देना पड़ता हैं। इसकी खेती में शुरूआत में खेत तैयार करते समय 15 से 20 टन प्राकृमिक गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में देना होता है। जबकि रासायनिक उर्वरक के रूप में 30 किलों नाइट्रोजन, 40 किलो फास्फोरस और 20 किलो पोटाश की मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से आखिरी जुताई के वक्त मिट्टी में मिला देना होता हैं। इसके अलावा 20 किलोग्राम यूरिया की मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से प्रत्येक हरी फसल की कटाई के बाद पौधों में देनी चाहिए। इससे पौधे जल्दी से विकास करने लगते हैं। चौलाई में तना वीविल, तंबाकू की सुंडी, पर्ण जालक जैसे कीट का प्रकोप देखने को मिलता है। ऐसे में इन कीटों के नियंत्रण के लिए आप जैविक कीटनाशक का प्रयोग करे सकते हैं।

चौलाई की बुवाई का समय 

भारत में चौलाई खेती गर्मी और बरसात दोनों मौसम की जाती है। चौलाई पहली बुवाई फरवरी से मार्च के बीच और दूसरी बुवाई जुलाई में कर दी जाती है। मार्च और फरवरी के बीच बुवाई करने से गर्मी के मौसम में इसकी पत्तियां खाने को मिल जाती है, वहीं जुलाई में बुवाई करने के दौरान वर्षा ऋतु के मौसम में इसकी पत्तियां खाने को मिल जाती है। 

चौलाई खेती के लिए बीज की मात्रा और उपचार

चौलाई की खेती की बुवाई अगर आप छिडकाव विधि से करते है, तो ढाई किलो बीज की जरूरत होगी। जबकि ड्रिल से पंक्तियों में इसकी रोपाई के लिए सवा से डेढ़ किलो बीज काफी होता हैं। चौलाई के बीजों की रोपाई से पहले उन्हें गोमूत्र से उपचारित कर लेना चाहिए। ताकि बीजों के अंकुरण और विकास के वक्त रोग ग्रस्त ना हो। चौलाई के बीज आकार में बहुत छोटे और काले दिखाई देते हैं। इनकी बुवाई रेतीली मिट्टी में मिलाकर करें।

बुवाई का तरीका

चौलाई की बुवाई छिड़काव और ड्रिल दोनो माध्यम से की जाती है। छिडकाव विधि से रोपाई के दौरान चौलाई के बीजों को समतल की हुई भूमि में छिड़क देते हैं। उसके बाद कल्टीवेटर के पीछे हल्का पाटा बांधकर खेत की एक बार हल्की जुताई कर देते हैं। इससे बीज अच्छे से मिट्टी में मिल जाता हैं। लेकिन चौलाई की अच्छी पैदावार के लिए आप इसकी बुवाई पंक्तियों में करें। इसके लिए खेत की बुवाई आप ड्रिल के माध्यम से कतारों में कर सकते हैं। कतारों में रोपाई के दौरान प्रत्येक कतारों के बीच आधा फिट के आसपास दूरी होनी चाहिए। और कतारों में बीजों के बीच 5 से 10 सेंटीमीटर के बीच दूरी होनी चाहिए। दोनों तरीके से रोपाई के दौरान इसके बीजों को जमीन में लगभग दो से तीन सेंटीमीटर की गहराई में उगाना चाहिए।

पौधों की सिंचाई

चौलाई के बीजों की बुवाई नम भूमि में की जाती है, इस लिए शुरुआत में बीजों की रोपाई के तुरंत बाद पानी नही देना होता। लेकिन बुवाई के 2 से 3 दिन बाद अगर आपकों खेत में पर्याप्त नमी दिखाई नहीं दे तो इसकी पहली हल्की सिंचाई करें। और बीज अंकुरित होने तक खेत में नमी बनाकर रखनी चाहिए। बीजों के अंकुरित होने के बाद इसके पौधों की पहली सिंचाई 20 से 25 दिन बाद करनी चाहिए। लेकिन हरी फसल के रूप में इसकी पत्तियों को बेचने के लिए इसके पौधों को गर्मियों के मौसम में सप्ताह में एक बार पानी जरुर देना चाहिए। इसके अलावा बारिश के मौसम में पौधों को आवश्यकता के अनुसार पानी देना चाहिए. चौलाई के पौधों पर बीज बनने के दौरान खेत में नमी बनाए रखने से पैदावार अधिक मिलती है। 

खरपतवार पर नियंत्रण

चौलाई की अच्छी पैदावार के लिए इसके खेत को खरपतवार मुक्त रखना जरूरी होता है। इसके खेत में खरपतवार नियंत्रण पर सबसे ज्यादा ध्यान देना होता है। क्योंकि खरपतवार में पाए जाने वाले कीड़े इसकी पत्तियों को अधिक नुकसान पहुंचाते हैं जिससे इसकी गुणवत्ता और पैदावार में कमी हो जाती है। इसके लिए आप सबसे पहले बीज बोने के करीब 10 से 12 दिन बाद ही खेत में हल्की गुड़ाई कर दें। इसके बाद दूसरी गुड़ाई 40 दिन बाद कर देनी चाहिए। गुड़ाई करने के दौरान चौलाई के पौधों की जड़ों पर हल्की मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए।

फसल की कटाई, पैदावार और लाभ

चौलाई के पौधे की कटाई अलग-अलग समय पर की जाती है। अगर इसकी पत्तियों का इस्तेमाल सब्जी के रूप में होता है। तो चौलाई की लाल और हरी पत्तियों की कटाई बुवाई के करीब 25 से 30 दिन बाद ही कर ले। यदि आप इसकी पत्तियों की गुणवत्ता अच्छी चाहते हैं तो इसकी तीन से चार बार कटाई कर ले। तीन से चार कटाई के बाद इसका उत्पादन 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के आसपास पाया जाता है। इसके अलावा जब आप दानों की पैदावार के लिए फसल चाहते हैं तो जब इसकी बालियां पीली पड़ने लगे तो आप इसकी कटाई कर ले। चौलाई की फसल करीब 90 से 100 दिनों में आराम से तैयार हो जाती है। चौलाई के पौधों रोपाई कर किसान भाई इच्छा अनुसार लाभ कमा सकते हैं। इसकी फसल हरी पत्तियों की 2 से 3 बार साग के रूप में कटाई कर के उन्हें बेचकर भी लाभ कमा सकते है। एवं  उसके बाद इसके पौधों से उपज भी ले सकता हैं। जिससे किसान भाई को एक फसल से डबल मुनाफा मिल जाता है। लेकिन साधारण रूप से इसकी पैदावार से किसान भाई एक बार में एक हेक्टेयर से अच्छी खासी कमाई कर सकता हैं।

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