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पनियाला की खेती: लाखों किसानों की ज्यादा कमाई के लिए जानें, सरकार का प्लान

पनियाला की खेती: लाखों किसानों की ज्यादा कमाई के लिए जानें, सरकार का प्लान
पोस्ट -27 अगस्त 2023 शेयर पोस्ट

“पनियाला” बनेगा लाखों किसानों की इनकम का जरिया, जीआई टैग दिलाने के लिए सरकार ने बनाया विशेष प्लान

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने औषधीय गुणों से संपन्न फल “पनियाला” को जीआई टैग दिलाने के लिए एक विशेष प्लान तैयार किया है। लुप्त प्राय: हो चले इस औषधीय फल के लिए जीआई टैगिंग संजीवनी साबित हो सकती है। पनियाला को जीआई टैग मिलने वाला है। यह गोरखपुर का ब्रांड होगा, इससे पहले गोरखपुर के टेरोकोटा की ब्रांडिग सरकार द्वारा की जा चुकी है।

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पूर्वांचल के लाखों किसानों की बढ़ेगी आय, इस फल की ब्रांडिग के लिए सरकार ने बनाई विशेष योजना

उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा खाद्यान उत्पादक राज्य है। प्रदेश की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है। यूपी की जलवायु गेहूं, धान, गन्ना और मक्का जैसे पारंपरिक अनाज फसलों के अलावा फल, मसालें और औषधीय फसलों के लिए भी उपयुक्त है। प्रदेश की योगी सरकार (yogi government) शासन में आने बाद से ही कृषि क्षेत्र विकास के लिए पूर्ण रूप से प्रयासरत है। प्रदेश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए योगी सरकार (Chief Minister Yogi Sarkar) द्वारा राज्य में एक जिला एक उत्पाद (ओडीओपी) योजना को चलाया गया। जिससे प्रदेश ने पूरे विश्व में खूब शोहरत पाई, साथ ही यूपी की अर्थव्यवसथा ने लंबी छलांग भी लगाई है। अब सरकार प्रदेश की अर्थव्यवस्था को एक ट्रिलियन डॉलर का आकार देने की सकारात्मक कोशिश कर रही है। इसके लिए राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार (Yogi Adityanath government) जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) के दम पर प्रदेश के कई कृषि उत्पादों को संजीवनी दिलाने का विशेष प्लान तैयार कर रही है। जियोग्राफिकल इंडिकेशन यानी जीआई टैगिंग दिलाने की योगी सरकार की पहल लुप्त प्राय हो चले औषधीय गुणों से भरपूर फल “पनियाला” के लिए संजीवनी साबित होगी। जीआई टैग मिलने से गोरखपुर के इस फल की पूछ बढ़ जाएगी। योगी सरकार द्वारा इसकी ब्रांडिंग करा देने से भविष्य में यह भी टेरोकोटा की तरह गोरखपुर का ब्रांड बन सकता है। आईये इस पूरी खबर के बारे में विस्तार से जानें।

जल्द ही जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैगिंग मिलने की उम्मीद

हार्टिकल्चर विशेषज्ञ पद्मश्री डॉक्टर रजनीकांत ने बताया कि उत्तर प्रदेश के जिन खास 10 उत्पादों की जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) पंजीकरण प्रक्रिया शुरू हुई है। इसमें गोरखपुर का पनियाला भी शामिल है। नाबार्ड के वित्तीय सहयोग से गोरखपुर के एक एफपीओ और ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन के तकनीकी मार्गदर्शन में इन सभी उत्पादों का आवेदन जीआई पंजीकरण के लिए चेन्नई भेजा जा रहा है। जीआई मिलने पर पनियाला गोरखपुर का दूसरा उत्पाद होगा। इससे पहले साल 2019 में गोरखपुर टेराकोटा को जीआई टैगिंग मिल चुकी है। 

पनियाला की विशेषता 

पनियाला का रंग जामुनी होता है। यह साइज में जामुन से कुछ बड़ा और आकार में लगभग गोल होता है। स्वाद, कुछ खट्टा मीठा और थोड़ा सा कसैला होता। आज से चार पांच दशक पूर्व यह गोरखपुर का खास फल हुआ करता था। नाम के अनुरूप इसके स्वाद को याद कर इसे देखते ही मुंह में पानी आ जाता था। पर अब यह लुप्त होने के कगार पर है। ऐसे में, योगी सरकार ने लुप्तप्राय हो रहे पनियाला के संरक्षण और उसे और खास बनाने की गंभीर पहल की है। इस पहल के कारण शीघ्र ही इसे जीआई टैगिंग मिलने की उम्मीद है। 

लाखों किसानों को मिलेगा लाभ

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार की यह पहल सफल रही तो इसका लाभ न केवल गोरखपुर के किसानों को बल्कि देवरिया, कुशीनगर, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर, बस्ती, संत कबीर नगर, बहराइच, गोंडा और श्रावस्ती के बागवानों को भी मिलेगा। क्योंकि ये सभी जिले समान एग्रोक्लाईमेटिक जोन (कृषि जलवायु क्षेत्र) में आते हैं। इन जिलों के कृषि उत्पादों (agricultural products) की खूबियां भी एक जैसी होंगी। औषधीय गुणों से भरपूर पनियाला के लिए जीआई टैगिंग संजीवनी साबित होगी। इससे लुप्तप्राय हो चले इस फल की पूछ बढ़ जाएगी। सरकार द्वारा इसकी ब्रांडिंग से भविष्य में यह भी टेरोकोटा की तरह गोरखपुर का ब्रांड होगा। 

4-5 दशक पहले तक गोरखपुर में बहुतायत में मिलते थे पेड़ 

पनियाला के पेड़ 4-5 दशक पहले तक गोरखपुर में बहुतायत में मिलते थे, पर अब यह लगभग लुप्तप्राय हैं। यूपी स्टेट बायोडायवर्सिटी बोर्ड की ई पत्रिका के अनुसार मुकम्मल तौर पर यह ज्ञात नहीं कि यह कहां का पेड़ है, पर बहुत संभावना है कि यह मूल रूप से यूपी का ही है। 2011 में हुए एक शोध के अनुसार इसके पत्ते, छाल, जड़ों एवं फलों में एंटी बैक्टीरियल प्राॅपर्टी होती है। इसके कारण इसके फल के उपयोग से पेट के कई रोगों में फायदा मिलता है। स्थानीय स्तर पर पेट के कई रोगों, दांतों एवं मसूढ़ों में दर्द, इनसे खून आने, कफ, निमोनिया और खरास आदि में भी इसका इस्तेमाल किया जाता रहा है। इसके फल लीवर के रोगों में भी उपयोगी पाए गए हैं। फल को जैम, जेली और जूस के रूप में संरक्षित (reserve) कर लंबे समय तक रखा जा सकता है। इसकी लकड़ी जलावन एवं कृषि कार्यों के लिए उपयोगी है। 

पनियाला का आर्थिक महत्व भी अधिक

ऐसी दुर्लभ चीजों में रुचि लेने वाले गोरखपुर के वरिष्ठ चिकित्सक डॉक्टर आलोक गुप्ता के मुताबिक, पनियाला (paniala) गोरखपुर का विशिष्ट फल है। शारदीय नवरात्री के आस पास यह मार्केट मे आता है। सीधे खाएं तो इसका स्वाद मीठा एवं कसैला होता है। हथेली या उंगलियों के बीच धीरे- धीरे घुमाने के बाद खाएं तो एकदम मीठा लगता है। पनियाला पारंपरिक खेती से ज्यादा लाभ देता है। कुछ साल पहले करमहिया गांव सभा के करमहा गांव में पारस निषाद के घर यूपी स्टेट बायोडायवर्सिटी बोर्ड के आर. दूबे गये थे। पारस के पास पनियाला (paniala) के 9 पेड़ थे। अक्टूबर महीने में आने वाले फल के दाम उस वक्त  60 से 90 रुपए प्रति किग्रा थे। प्रति पेड़ से उस समय उनको करीब 3,300 रुपए इनकम होती थी। इस समय तो ये दाम दोगुने या इससे भी अधिक होंगे। लिहाजा आय (Income) भी इसी अनुरूप। खास बात ये है कि इसके पेड़ों की ऊंचाई करीब 9 मीटर होती है। जिस वजह से इसका रखरखाव भी आसान होता है।

एक ट्रेडमार्क के रूप में देखा जाता है जीआई टैग को 

जियोग्राफिकल इंडिकेशन (जीआई) टैगिंग किसी क्षेत्र में पाए जाने वाले कृषि उत्पाद को कानूनी संरक्षण प्रदान करता है। जीआई टैग द्वारा कृषि उत्पादों के अनाधिकृत प्रयोग पर अंकुश लगाया जा सकता है। जीआई किसी भौगोलिक क्षेत्र में उत्पादित होने वाले कृषि उत्पादों का महत्व बढ़ा देता है। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में जीआई टैग (जियोग्राफिकल इंडिकेशन ) को एक ट्रेडमार्क के रूप में देखा जाता है। इससे निर्यात (export) को बढ़ावा मिलता है, साथ ही स्थानीय आय भी बढ़ती है। विशिष्ट कृषि उत्पादों (specialized agricultural products) को पहचान कर उनका भारत के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय बाजार में निर्यात एवं प्रचार-प्रसार (Export & Promotion) करने में आसानी होती है। 

पनियाला के अलावा योगी सरकार ने जिन उत्पादों को जीआई टैगिंग के आवेदन के लिए चुना है। इनमें फलेहपुर सीकरी की नमक खटाई, मथुरा का पेड़ा, इग्लास अलीबढ़ की चमचम मिठाई, आगरा का पेठा, कानपुर नगर का सत्तू एवं बुकनू, लाल ज्वार, मैगलगंज का रसगुल्ला, प्रतापगढ़ी मुरब्बा, बलरामपुर के तिन्नी चावल, संडीला के लड्डू, हाथरस का गुलाब और गुलाब के उत्पाद, फर्रूखाबाद का हाथी सिंगार (सब्जी), चुनार का जीरा-32 चावल, बिठूर का जामुन, बाराबंकी का यकूटी आम, सानेभद्र का सॉवा कोदों, बलंदशहर का कठिया गेहूं, देशी अरहर जौनपूरी मक्का, अंबेडकरनगर की हरी मिर्च, गोंडा का मक्का, बलिया का साथी चावल (बोरा लाल एवं बोरो काला), सहारनपुर का देशी तिल, जौनपुरी मूली, खुर्जा की खुरचन, लखनऊ की रेवड़ी, सफेदा आम और सीतापुर की मूंगफली जैसे उत्पाद शामिल है। 

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