ज्वार की खेती : अधिक पैदावार के लिए ऐसे करें ज्वार की खेती

पोस्ट -23 मई 2022 शेयर पोस्ट

ज्वार की खेती के बारे में सामान्य जानकारी, जानें उन्नत किस्मों के बारे में

ज्वार की खेती भारत में प्राचीन काल से होती आई है। भारत में ज्वार की खेती मोटे दाने वाली अनाज फसल और हरे चारे के रूप में की जाती है, अन्न के लिये नहीं। पशुओं के चारे के रूप में ज्वार के सभी भागों का इस्तेमाल किया जाता है। यह एक प्रकार की जगली घास है, जिसकी बाली के दाने मोटे अनाजों में गिने जाते हैं। ज्वार (संस्कृत रू यवनाल, यवाकार या जूर्ण) एक प्रमुख फसल है। ज्वार कम वर्षा वाले क्षेत्र में अनाज तथा चारा दोनों के लिए बोई जाती हैं। ज्वार जानवरों का महत्वपूर्ण एवं पौष्टिक चारा हैं। भारत में यह फसल लगभग सवा चार करोड़ एकड़ भूमि में बोई जाती है। ज्वार कई प्रकार की होती है जिनके पौधों में कोई विशेष भेद नहीं दिखाई पड़ता। ज्वार की फसल दो प्रकार की होती है, एक रबी, दूसरी खरीफ। मक्का भी इसी का एक भेद है। इसी से कहीं कहीं मक्का भी ज्वार ही कहलता है। ज्वार को जोन्हरी, जुंडी आदि भी कहते हैं। ज्वार की खेती सिंचित और असिंचित दोनों जगहों पर की जा सकती है। भारत में ज्वार की खेती खरीफ की फसलों के साथ में की जाती है। इसके पौधे 10 से 12 फिट की लम्बाई के हो सकते हैं। जिनको हरे रूप में कई बार काटा जा सकता है। इसके पौधे को किसी विशेष तापमान की जरूरत नही होती। ज्यादातर किसान भाई इसकी खेती हरे चारे के रूप में ही करते हैं। लेकिन कुछ किसान भाई इसे व्यापारिक तौर से भी उगाते हैं। अगर आप भी ज्वार की व्यापारिक तौर पर खेती करने का मान बान रहे है तो आज की ट्रैक्टरगुरु की यह पोस्ट आपकों इसकी खेती से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध करवायेगी।

ज्वार के पौधे से संबंधित जानकारी

ज्वार एक मोटे अनाज वाली महत्वपूर्ण फसल है। वर्षा आधारित कृषि के लिये ज्वार सबसे उपयुक्त फसल है। ज्वार की फसल से किसानों को दोहरा लाभ होता है। इसकी फसल से मानव आहार के लिये अनाज के साथ ही साथ पशु आहार के लिये कडबी (चारा) भी मिलती है। ज्वार की फसल कम वर्षा (450-500) में भी अच्छी उपज दे सकती है। इसका पौधा नरकट की तरह एक डंठल के रूप में सीधा 5 से 6 हाथ ऊँचा जाता है। डंठल में सात से आठ अंगुल पर गाँठें होती हैं जिनसे हाथ डेढ़ हाथ लंबे तलवार के आकार के पत्ते दोनों ओर निकलते हैं। इसके सिरे पर फूल के जीरे और सफेद दानों के गुच्छे लगते हैं। ये दाने छोटे छोटे होते हैं और गेहूँ की तरह खाने के काम में आते हैं। भारत, चीन, अरब, अफ्रीका, अमेरिका आदि में इसकी खेती होती है। भारत में राजस्थान, पंजाब आदि में इसकी बुवाई अधिक होती है। बंगाल, मद्रास, बरमा आदि में ज्वार बहुत कम बोई जाती है। यदि बोई भी जाती है तो दाने अच्छे नहीं पडते। वर्तमान में मध्य प्रदेश में ज्वार की खेती लगभग 4लाख हेक्टेयर भूमि में की जा रही है। इसके अलावा ज्वार के दाने का उपयोग उच्च गुणवत्ता वाले अल्कोहल एवं ईथेनॉल बनाने में किया जा रहा है।

ज्वार की बुवाई कब की जाती है?

भारत में ज्वार की खेती खरीफ की फसलों के साथ की जाती है। चूंकि ज्वार की फसल खरीफ की फसल के साथ ही की जाती है, इसलिए बीज रोपाई अप्रैल से मई माह के अंत तक की जानी चाहिए। भारत में ज्वार को सिंचाई करके वर्षा से पहले एवं वर्षा आरंभ होते ही इसकी बोवाई की जाती है। यदि बरसात से पहले सिंचाई करके यह बो दी जाए, तो फसल और जल्दी तैयार हो जाती है। ज्वार के बीजों को अंकुरण के वक्त सामान्य तापमान की जरूरत होती हैं। उसके बाद पौधों को विकास करने के लिए 25 से 30 डिग्री तापमान उपयुक्त होता है. लेकिन इसके पूर्ण विकसित पौधे 45 डिग्री तापमान पर भी आसानी से विकास कर लेते हैं।

ज्वार की खेती के उपयुक्त मिट्टी कौनसी है?

ज्वार एक खरीफ की मोटे आनाज वाली गर्मी की फसल है। यह फसल 45 डिग्री के तापमान को सहन कर आसानी से विकास कर सकती है। वैसे तो ज्वार की फसल को किसी भी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है। किन्तु अधिक मात्रा में उत्पादन प्राप्त करने के लिए इसकी खेती उचित जल निकासी वाली चिकनी मिट्टी में करे। इसकी खेती के लिए भूमि का पीएच मान 5 से 7 के मध्य होना चाहिए। इसकी खेती खरीफ की फसल के साथ की जाती है। उस दौरान गर्मी का मौसम होता है, गर्मियों के मौसम में उचित मात्रा में सिंचाई कर अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

खेती के लिए ज्वार की उन्नत किस्में 

वर्तमान समय में ज्वार के महत्व और खाद्यान्न की बढती हुई मांग को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने ज्वार की अधिक उपज और बार-बार कटाई के लिए नवीनतम संकर और संकुल प्रजातियों को विकसित किया है। ज्वार की नई किस्में अपेक्षाकृत बौनी हैं एवं उनमें अधिक उपज देने की क्षमता है। अनुमोदित दाने के लिए ज्वार की उन्नतशील किस्में इस प्रकार है, जैसे- सी एस एच 5, एस पी वी 96 (आर जे 96), एस एस जी 59 -3, एम पी चरी राजस्थान चरी 1, राजस्थान चरी 2, पूसा चरी 23, सी.एस.एच 16, सी.एस.बी. 13, पी.सी.एच. 106 आदि ज्वार उन्नत किस्में है। इन किस्मों की खेती हरे चारे और दाने के लिए की जाती है। ज्वार की यह किस्में 100 से 120 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इन किस्में से किसानों हो 500 से 800 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के हिसाब से पशुओं के लिए हरा चारा हो जाता है। 90 से 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के हिसाब से सूखा चारा मिल जाता है। एवं 15 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से दाने प्राप्त हो सकते हैं।

बुवाई के लिए खेत की तैयारी 

ज्वार की खेती के लिए शुरुआत में खेत की दो से तीन गहरी जुताई कर उसमें 10 से 12 टन उचित मात्रा में गोबर की खाद डाल दें। उसके बाद फिर से खेत की जुताई कर खाद को मिट्टी में मिला दें। खाद को मिट्टी में मिलाने के बाद खेत में पानी चलाकर खेत का पलेव कर दे। पलेव के तीन से चार दिन बाद जब खेत सूखने लगे तब रोटावेटर चलाकर खेत की मिट्टी को भुरभुरा बना लें। उसके बाद खेत में पाटा चलाकर उसे समतल बना लें। ज्वार के खेत में जैविक खाद के अलावा रासायनिक खाद के तौर पर एक बोरा डी.ए.पी. की उचित मात्रा प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में दें। ज्वार की खेती हरे चारे के रूप में करने पर ज्वार के पौधों की हर कटाई के बाद 20 से 25 किलो यूरिया प्रति हेक्टेयर के हिसाब से समय समय पर खेत में देते रहें। 

बुवाई के लिए बीजों की मात्रा एवं बीजोपचार

ज्वार की अच्छी फसल उत्पादन के लिए उचित बीज मात्रा के साथ उचित दूरी पर बुआई करना आवश्यक होता है। बीज की मात्रा उसके आकार, अंकुरण प्रतिशत, बुवाई का तरीका और समय, बुआई के समय भूमि में उपस्थित नमी की मात्रा पर निर्भर करती है।  एक हेक्टेयर क्षेत्रफल वाले खेत में ज्वार की बुआई के लिए 12 से 15 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन हरे चारे के रूप में बुवाई के लिए  20 से 30 किलोग्राम बीजों की आवश्यकता होती है। ज्वार के बीजों की बुआई से पहले बीजों को उपचारित करके बोना चाहिए। बीजोपचार के लिए कार्बण्डाजिम (बॉविस्टीन) 2 ग्राम अथवा एप्रोन 35 एस डी 6 ग्राम कवकनाशक दवाई प्रति किलो ग्राम बीज की दर से बीजोपचार करने से फसल पर लगने वाले रोगों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त बीज को जैविक खाद एजोस्पाइरीलम व पी एस बी से भी उपचारित करने से 15 से 20 प्रतिशत अधिक उत्पादन लिया जा सकता है।

ज्वार के बीजों की बुवाई का तरीका

ज्वार के बीजों की बुवाई ड्रिल और छिड़काव दोनों विधियों से की जाती है। बुआई के लिए कतार के कतार की दूरी 45 सेंटीमीटर रखें और बीज को 4 से 5 सेंटीमीटर गहरा बोयें। यदि बीज अधिक गहराई पर बोया गया हो, तो बीज का जमाव अच्छा नहीं होता, क्योंकि भूमि की उपरी परत सूखने पर काफी कड़ी हो जाती है। कतार में बुआई देशी हल के पीछे कुडो में या सीडड्रिल द्वारा की जा सकती है। सीडड्रिल द्वारा बुवाई करना सर्वोत्तम रहता है क्योंकि इससे बीज समान दूरी पर एवं समान गहराई पर पड़ता है। ज्वार का बीज बुआई के 5 से 6 दिन बाद अंकुरित हो जाता है एवं छिड़काव विधि से रोपाई के दौरान किसान भाई पहले से तैयार खेत समतल खेत में इसके बीजों को छिड़क कर रोटावेटर की सहायता से खेत की हल्की जुताई कर लें। जुताई हलों के पीछे हल्का पाटा लगाकर करें। इससे ज्वार के बीज मिट्टी में अन्दर दब जाते है। जिससे बीजों का अंकुरण अच्छे से होता है।  

ज्वार की खेती के लिए सिंचाई प्रबंधन

ज्वार की फसल गर्मी के दिनों में बोई जाती हैं। यह उच्च गर्मी सहन करने वाली फसल है। इसकी फसल के लिए सामान्य सिंचाई उपयुक्त होती है। ज्वार की फसल को तीन से चार सिंचाई की जरूरत होती है। जबकि इसकी खेती हरे चारे के लिए की गयी खेती है, तो इसके पौधों को अधिक पानी की जरूरत होती है। इस दौरान पौधों को 4 से 5 दिन के अंतराल में पानी देना होता है। ताकि पौधा ठीक तरह से विकास कर सके, और फसल कम समय में कटाई के लिए तैयार हो जाए। 

खरपतवार नियंत्रण

अगर ज्वार की खेती हरे चारे के रूप में की गई है, तो इसके पौधों को खरपतवार नियंत्रण की जरूरत नही पड़ती। लेकिन इसकी पैदावार के रूप में खेती करने पर इसके पौधों में खरपतवार नियंत्रण करना चाहिए। ज्वार की खेती में खरपतवार नियंत्रण प्राकृतिक और रासायनिक दोनों तरीके से किया जाता है। रासायनिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए इसके बीजों की रोपाई के तुरंत बाद एट्राजिन की उचित मात्रा का छिडकाव कर देना चाहिए। जबकि प्राकृतिक तरीके से खरपतवार नियंत्रण के लिए इसके बीजों की रोपाई के 20 से 25 दिन बाद एक बार पौधों की गुड़ाई कर देनी चाहिए। 

ज्वार की पैदावार और लाभ

ज्वार की फसल बुवाई के बाद 90 से 120 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। कटाई के बाद फसल से इसके पके हुए भुट्टे को काटकर दाने के लिए अलग निकाल लिया जाता है। ज्वार की खेती से औसत पैदावार आठ से 10 क्विंटल प्रति एकड़ हो जाती है। ज्वार की उन्नत किस्में और वैज्ञानिक विधि से उन्नत खेती से अच्छी फसल में 15 से 20 क्विंटल प्रति एकड़ दाने की पैदावार हो सकती हैं। दाना निकाल लेने के बाद लगभग 100 से 150 क्विंटल प्रति एकड़ सूखा पौैष्टिक चारा भी पैदा होता है। ज्वार के दानों का बाजार भाव ढाई हजार रूपए प्रति क्विंटल होता है। इससे किसान भाई को ज्वार की फसल से 60 हजार रूपये तक की कमाई प्रति एकड़ खेत से हो सकती है। साथ ही पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था भी हो जाती है। 

ज्वार की फसल के कुछ प्रमुख रोग एवं कीट

ज्वार की फसल में कई तरह के कीट और रोग होने की संभावना रहती है। समय रहते अगर ध्यान नहीं दिया गया तो इनके प्रकोप से फसलों की पैदावार औसत से कम हो सकती है। ज्वार की फसल में होने वाले प्रमुख रोग निम्न है।

तना छेदक मक्खी : इन मक्खियों का आकार घरेलू मक्खियों की तुलना में बड़ा होता है। यह पत्तियों के नीचे अंडा देती हैं। इन अंडों में से निकलने वाली इल्लियां तनों में छेद करके उसे अंदर से खाकर खोखला बना देती हैं। इसे पौधे सूखने लगते हैं। इससे बचने के लिए बुवाई से पहले प्रति एकड़ जमीन में 4 से 6 किलोग्राम फोरेट 10 प्रतिशत कीट नाशक का इस्तेमाल करें।

ज्वार का भूरा फफूंद : इसे ग्रे मोल्ड भी कहते हैं। यह रोग ज्वार की संकर किस्मों और जल्द पकने वाली किस्मों में अधिक पाया जाता है। इस रोग के शुरुआत में बालियों पर सफेद रंग की फफूंद दिखने लगती है। इससे बचाव के लिए प्रति एकड़ जमीन में 800 ग्राम मैन्कोजेब का छिड़काव करें।

सूत्रकृमि : इससे ग्रसित पौधों की पत्तियां पीली होने लगती हैं। इसके साथ ही जड़ में गांठें बनती हैं और पौधों का विकास रुक जाता है। रोग बढ़ने पर पौधे सूखने लगते हैं। इस रोग से बचने के लिए गर्मी के मौसम में गहरी जुताई करें। प्रति किलोग्राम बीज को 120 ग्राम कार्बोसल्फान 25 प्रतिशत से उपचारित करें।

ज्वार का माइट : यह पत्तियों की निचली सतह पर जाल बनाते हैं और पत्तियों का रस चूस कर पौधों की क्षति पहुंचाते हैं। इससे ग्रसित पत्तियां लाल रंग की हो कर सूखने लगती हैं। इससे बचने के लिए प्रति एकड़ जमीन में 400 मिलीग्राम डाइमेथोएट 30 ई.सी. का छिड़काव करें।

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