वर्तमान समय में केला अच्छी आमदनी वाली फसल के रूप में उभरा। किसान भाई इससे लाखों की कमाई कर रहे हैं। केले पर प्रति एकड़ एक लाख रूपए तक की लागत आती है और ढाई लाख रूपए तक शुद्ध मुनाफा होता है। आप को बता दें कि हमारे देश में कृषि को लेकर एक ऐसी विचार धारा है कि जहां इस पेशे को कठोर परिश्रम के बाद भी अच्छी आमदनी का पेशा नहीं माना जाता है। वहीं कुछ लोग इस पेशे से लाखों रुपए की कमाई कर रहे हैं। देश के कई क्षेत्रों के किसानों ने आज केले की खेती से खासा धन कमाकर इस मिथक को तोड़ा हैं। आप को बता दें कि केला एक लोकप्रिय फल के रूप में जाना जाता है। यह पूरे वर्ष किसी भी मौसम में पाया जाने वाला फल है, केले में कई तरह के पौषक तत्व मौजूद होते हैं, जो मानव शरीर के लिए काफी लाभदायक होते हैं। जिस वजह से केले का सेवन करना बहुत ही लाभकारी होता है। केले का इस्तेमाल खाने के अलावा आटा, सब्जी और चिप्स को बनाने में भी किया जाता है। महाराष्ट्र में केले का उत्पादन अधिक मात्रा में किया जाता है तथा कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में भी केले की खेती उच्च स्तर पर की जाती है। केले की मांग पूरे वर्ष रहती है, जिससे इसको बेचना भी काफी आसान होता है और किसान भाई केले की खेतीकर अच्छा लाभ भी कमा सकते हैं। यदि आप भी केले की खेती करने का मन बना रहे हैं, तो ट्रैक्टर गुरू की इस पोस्ट में आपको केले की खेती कैसे करें तथा केला के प्रकार के बारे में जानकारी दी जा रही है।
उत्पादन व क्षेत्रफल की दृष्टि से आम के बाद केले का नंबर आता है। केला एक नकदी फसल मानी जाती है। दुनिया के कुल उत्पादन में 25 फीसदी हिस्सेदारी के साथ भारत, विश्व का सबसे बड़ा केला उत्पादक है। भारत में करीब दो लाख बीस हजार हेक्टयर क्षेत्रफल पर केले लगाए जाते हैं। केले उत्पादन में क्षेत्रफल की दृष्टि से महाराष्ट्र तीसरा सबसे बड़ा केला उत्पादक राज्य है। कुल उत्पादन का लगभग 50 प्रतिशत उत्पादन महाराष्ट्र में होता है। भारत में अधिकांश केले दक्षिणी राज्यों में उत्पादित किए जाते हैं और देश के अन्य राज्यों में निर्यात किए जाते हैं। भारत में केले का सबसे अधिक उत्पादन तमिलनाडु में होता है। गुजरात दूसरे व महाराष्ट्र तीसरे स्थान पर है। तमिलनाडु में केले का वार्षिक उत्पादन 5136200 टन है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल, यूपी और एमपी का देश के केला उत्पादन में 70 फीसदी से अधिक योगदान है।
केले के 86 प्रतिशत से अधिक उपयोग खाने के लिए होता है। पके केले उत्तम पौष्टिक फल के रूप में खाया जाता है जबकि केले के फूल, कच्चे फल व तने का भीतरी भाग सब्जी के लिए उपयोग में लाया जाता है। फल से पाउडर, मुरब्बा, टॉफी, जेली आदि पदार्थ बनाते हैं। सूखे पत्तों का उपयोग आच्छन के लिए करते हैं। केले के तने और कंद के टुकडे़ करके वह जानवरो के लिए चारा के रुप में उपयोग में लाते हैं। केले के झाड धार्मिक कार्य में मंगलचिन्ह के रुप में उपयोग में लाए जाते हैं।
केले के पौधे मुसा जाति के घासदार परिवार से संबंधित है। केले की खेती मुख्य रूप से इसके फल के लिए की जाती है। यह मूल रूप से दक्षिण पूर्व एशिया के उष्णदेशीय क्षेत्र का है और संभवतः पपुआ न्यू गिनी में इन्हें सबसे पहले उपजाया गया था। आज, उनकी खेती संपूर्ण उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में की जाती है। केले के पौधे काफी लंबे और सामान्य रूप से काफी मजबूत होते हैं और अक्सर गलती से वृक्ष समझ लिए जाते हैं, पर उनका मुख्य या सीधा तना वास्तव में एक छद्म तना होता है। कुछ प्रजातियों में इस छद्मतने की ऊंचाई 2-8 मीटर तक और उसकी पत्तियाँ 3.5 मीटर तक लम्बी हो सकती हैं।
केले के पौधों की रोपाई के बाद करीब 12 से 13 महीने में फूल आते हैं। इसके प्रत्येक छद्मत ना हरे केलों के एक गुच्छे को उत्पन्न कर सकता है, जो अक्सर पकने के बाद पीले या कभी-कभी लाल रंग में परिवर्तित हो जाते हैं। फल लगने के बाद, छद्म तना मर जाता है और इसकी जगह दूसरा छद्म तना ले लेता है। केले के फल लटकते गुच्छों में ही बड़े होते है, जिनमें 20 फलों तक की एक पंक्ति होती है और एक गुच्छे में 3 से 20 केलों की पंक्ति होती है। केलों के लटकते हुए सम्पूर्ण समूह को गुच्छा कहा जाता हैं। और इसका वजन 30 से 50 किलोग्राम तक होता हैं। एक फल औसतन 125 ग्राम का होता है, जिसमें लगभग 75 प्रतिश पानी और 25 प्रतिशत सूखी सामग्री होती है। प्रत्येक फल उंगली के रूप में दिखाई देता हैं। केले में एक सुरक्षात्मक बाहरी परत होती है जिसे छिलका या त्वचा कहां जाता है। इसके भीतर एक मांसल खाद्य भाग होता है।
केले को लगाने का मौसम जलवायु के अनुसार बदलता रहता है, कारण जलवायु का परिणाम केले के बढ़ने पर, फल लगने पर और तैयार होने के लिए लगने वाली कालावधी पर निर्भर करता है। केले को लगाने का समय मध्य फरवरी से मार्च का पहला सप्ताह उपयुक्त होता हैं। केले की खेती में जलवायु का भी बहुत अधिक महत्व होता है। इसके पौधों को अच्छे से विकास करने के लिए उष्णकटिबंधीय जलवायु की आवश्यकता होती है। बारिश का मौसम पौधों की वृद्धि के लिए अच्छा माना जाता है,लेकिन बारिश से खेत में जलभराव न होने दें। इसके पौधे अधिकतम 40 डिग्री तथा न्यूनतम 14 डिग्री तापमान को ही सहन कर सकते हैं। इसके पौधे ठंड को सहन नहीं कर सकते हैं। जाड़े में पड़ने वाला पाला इसके पौधों को अधिक नुकसान पहुंचाता है। अधिक ठंड में इसके पौधे उचित वृद्धि नहीं कर सकते हैं।
केले की 300 से भी अधिक किस्में पहचान में आ चुकी है। हालांकि भारत में 15 से 20 किस्मों को ही प्रमुखता से खेती के लिए उपयोग में लाया जाता है। खेती के अनुसार केलों को हम दो प्रजातियों में बांट सकते हैं। पहली वो प्रजाति जिसे फल के रूप में खाया जाता है, जबकि दूसरी वो जो शाकभाजी के रूप में खाया जाता है। केले पहले वर्ग में खेती के प्रयोग की जाने वाली किस्मे जैसे पूवन, चम्पा, अमृत सागर, बसराई ड्वार्फ, सफेद बेलची, लाल बेलची, हरी छाल, मालभोग, मोहनभोग और रोबस्टा आदि प्रमुख है। इसी प्रकार शाकभाजी के लिए उगाई जाने वाली उन्नतशील प्रजातियों में मंथन, हजारा, अमृतमान, चम्पा, काबुली, कैम्पियरगंज तथा रामकेला प्रमुख हैं। केले की जी9 किस्म बहुत प्रसिद्ध किस्म है। इस किस्म को 2008 में जारी किया गया है। और इस किस्म को पूरे एशिया में उगाने के लिए उपयुक्त किस्म है। इस किस्म में औसतन 25 से 30 किलोग्राम के गुच्छे निकालते है।
केले के खेत में इसके बीजों की रोपाई पौध के रूप में की जाती है। इसलिए इसके पौधों को किसी रजिस्टर्ड नर्सरी से खरीद लेना चाहिए। खरीदे गए पौधे बिल्कुल स्वस्थ और अच्छी किस्म के होने चाहिए। इन पौधों की रोपाई के लिए मध्य मई से जुलाई का पहला सप्ताह उपयुक्त माना जाता है, तथा जून का महीना भी पौध रोपाई के लिए उचित होता है, क्योंकि बारिश के मौसम में केले के पौधे अच्छे से वृद्धि करते हैं।
उत्तरी भारत के तटीय क्षेत्रों में, जहां उच्च नमी और तापमान जैसे 5 से 7 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान हो, वहां पर रोपाई के लिए 1.8x1.8 मीटर से कम फासला नहीं होना चाहिए। केले के पौधों को 45x45x45 से.मी. या 60x60x60 से.मी. आकार के गड्ढों में रोपित करें। गड्ढों को धूप में खुला छोड़ें, इससे हानिकारक कीट मर जायेंगे। गड्ढों को 10 किलो रूड़ी की खाद या गला हुआ गोबर, नीम केक 250 ग्राम और कार्बोफ्युरॉन 20 ग्राम से भरें। पौधों को गड्ढें के मध्य में रोपित करें और मिट्टी के आसपास अच्छी तरह से दबायें। ध्यान रहे कि इसके पौधों की गहरी रोपाई ना करें।
अगर केले के खेती में पौधों की रोपाई के लिए फासला 1.8 x 1.5 मीटर लिया जाये तो प्रति एकड़ में 1452 पौधे लगाएं और यदि फासला 2 x 2.5 मीटर लिया जाये, तो एक एकड़ में 1100 पौधे लगाए। रोपाई के लिए, सेहतमंद और संक्रमण रहित पौधों का प्रयोग करें। रोपाई से पहले, इसके पौधों को धोयें और क्लोरपाइरीफॉस 20 ई सी 2.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में डुबोयें। फसल को राइजोम की भुंडी से बचाने के लिए रोपाई से पहले कार्बोफ्युरॉन 3 प्रतिशत सी जी 33 ग्राम में प्रति जड़ों को डुबोयें और उसके बाद 72 घंटों के लिए छांव में सुखाएं। गांठों को निमाटोड के हमले से बचाने के लिए कार्बोफ्युरॉन 3 प्रतिशत सी जी 50 ग्राम से प्रति जड़ का उपचार करें। फुजारियम सूखे की रोकथाम के लिए, जड़ों को कार्बेनडाजिम 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में 15-20 मिनट के लिए डुबोयें।
गोबर या कम्पोस्ट की सड़ी खाद 20 से 25 कि.ग्रा. तथा 100 ग्राम बी. एच. सी. की मात्रा प्रति गड्ढा, उपरोक्त पदार्थो को अच्छे से मिलाकर गड्ढे में भरकर सिंचाई कर देनी चाहिए। जिससे मिट्टी मिश्रण गड्ढे में अच्छी तरह बैठ जाए। इसके बाद 300 ग्राम नाइट्रोजन, 100 ग्राम फास्फोरस तथा 300 ग्राम पोटाश प्रति पौधा प्रति वर्ष नाइट्रोजन को पाँच, फास्फोरस को दो तथा पोटाश को तीन भागों में बांटकर देना चाहिए। पौध रोपण के समय फास्फोरस 50 ग्राम, पौध रोपण के एक माह बाद नाइट्रोजन 60 ग्राम, पौध रोपण के दो माह बाद नाइट्रोजन 60 ग्राम, फास्फोरस 50 ग्राम और पोटाश 100 ग्राम के हिसाब से प्रति पौधा दें। इसके बाद जब पौध की रोपाई को तीन महीने हो जाये तो नाइट्रोजन की 60 ग्राम एवं पोटाश की 100 ग्राम प्रति पौधें की दर से दें। केले के पौधों में फूल आने के दो माह पहले नाइट्रोजन 60 ग्राम और पोटाश 100 ग्राम प्रति पौधों की दर से प्रयोग करें। खाद एवं उर्वरक को पौधे के मुख्य तने से 10-15 सें.मी. की दूरी पर चारों तरफ गुड़ाई करके मिट्टी में मिला देना चाहिए और पौधे की तुरन्त सिंचाई कर देनी चाहिए।
केला एक ऐसी फसल है जिसकी जड़ें ज्यादा गहराई तक नहीं जाती। जिस वहज से इसके पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती हैं। अच्छी उपज के लिए इसे 60-70 सिंचाइयों की आवश्यकता होती है। सर्दियों में 7-8 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें और गर्मियों में 4-5 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें। बारिश के मौसम में आवश्यकतानुसार सिंचाई करें। अतिरिक्त पानी को खेत में से निकाल दें क्योंकि यह पौधों की नींव और वृद्धि को प्रभावित करेगा।
केले की फसल रोपाई के बाद 12-15 महीनों में तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है। मार्केट की आवश्यकताओं के अनुसार केले के पूरी तरह पक जाने पर तुड़ाई करें। स्थानीय मार्केट के लिए फलों की तुड़ाई पकने की अवस्था पर करें और लंबी दूरी वाले स्थानों पर ले जाने के लिए 75 से 80 प्रतिशत पक जाने पर फलों की तुड़ाई करें। केले के एक घेरे का वजन तकरीबन 20 से 25 किलोग्राम होता है, जिससे एक एकड़ के खेत से किसान भाई लगभग 60 से 70 टन की सालाना पैदावार प्राप्त कर सकते हैं। केले का बाजार भाव 10 रूपये प्रति किलो होता है, जिससे एक एकड़ के खेत में केले की एक बार की फसल से किसान 6 लाख रूपए तक की कमाई कर अच्छा लाभ कमा सकते हैं।
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