पंजाब विश्वविद्यालय ने पेश किया AI-चालित सेल्फ-ड्राइविंग ट्रैक्टर

पंजाब विश्वविद्यालय ने पेश किया AI-चालित सेल्फ-ड्राइविंग ट्रैक्टर
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खेती का भविष्य: AI तकनीक सेल्फ-ड्राइविंग ट्रैक्टर से किसान पाएँ उच्च उत्पादन

भारतीय कृषि में तकनीक की एक बड़ी छलांग देखने को मिली है, जहां एक तरफ एलन मस्क की कंपनी टेस्ला ने अपनी स्वचालित इलेक्ट्रिक कार मॉडल Y की बुकिंग भारत में शुरू कर दी है, वहीं पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) ने पारंपरिक ट्रैक्टर को पीछे छोड़ते हुए एक AI- संचालित सेल्फ-ड्राइविंग ट्रैक्टर पेश किया है। एआई तकनीक से लैस इस ट्रैक्टर ने बिना किसी ड्राइवर के पूरे खेत की जुताई की है, जो यह दर्शाती है कि अब भारतीय कृषि भी पूरी तरह से डिजिटल परिवर्तन की दिशा में कदम बढ़ा चुकी है। 

रिसर्च फील्ड एरिया में बिना ड्राइवर के ट्रैक्टर चलाया (Drove a tractor without a driver in the research field area)

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के शोधकर्ताओं ने रिसर्च फील्ड एरिया में बिना ड्राइवर के ट्रैक्टर चलाकर सबको चौंका दिया। पीएयू के कुलपति सतबीर सिंह गोसल का कहना है कि यह ट्रैक्टर GPS, सेंसर और आईपैड कंप्यूटर-आधारित टचस्क्रीन कंट्रोल पैनल जैसी उन्नत तकनीकों से लैस है, जो इसे खेतों में नेविगेट करने, जुताई, बीज बोने और खेत में मौजूद बाधाओं को खुद पहचान कर उनसे बचाव करने में सक्षम बनाती है। पैनल में खेत का आकार, जुताई की दिशा और कार्य प्रणाली से जुड़ी पूरी जानकारी पहले से फीड कर दी गई थी। ट्रैक्टर स्टार्ट करने के बाद ऑपरेटर उसमें से उतर गया और इसके बाद ट्रैक्टर ने बिना किसी मानव हस्तक्षेप के खेत की पूरी जुताई बेहतर तरीके से कर दी।

जीएनएसएस आधारित ऑटो-स्टीयरिंग सिस्टम से संचालित (Operated with GNSS based auto-steering system)

पीएयू के वीसी डॉ. गोसल ने बताया कि यह स्वचालित ट्रैक्टर ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (जीएनएसएस) आधारित ऑटो-स्टीयरिंग सिस्टम से संचालित होता है, जिससे मानव चालक की आवश्यकता लगभग समाप्त हो जाती है। यह तकनीक भारतीय कृषि मशीनरी में अभी भी दुर्लभ है। इसके माध्यम से ट्रैक्टर को डिस्क हैरो, कल्टीवेटर और पीएयू के स्मार्ट सीडर जैसे कृषि उपकरणों के साथ न्यूनतम या बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के प्रभावी रूप से संचालित किया जा सकता है।

कर लेता है कम दृश्यता वाली स्थिति में भी सटीक संचालन (Operates precisely even in low visibility conditions)

कुलपति डॉ. गोसल ने कहा कि AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) तकनीक से लैस इस ट्रैक्टर में किसान को केवल एक बार इनपुट दर्ज करना होता है, इसके बाद ट्रैक्टर सैटेलाइट सिग्नल, सेंसर और टचस्क्रीन कंसोल की मदद से कम दृश्यता वाली स्थिति में भी सटीक संचालन कर लेता है। इससे मानव त्रुटियों, शारीरिक थकान और संसाधनों की बर्बादी में काफी कमी आती है। कृषि अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी महाविद्यालय के डीन प्रो. मनजीत सिंह का कहना है कि इस तकनीक ने प्रयोगों में शानदार परिणाम दिए हैं, जिनमें फील्ड क्षमता में 12 प्रतिशत तक की वृद्धि, थकान में 85 प्रतिशत की कमी और श्रम की जरूरत में 40 प्रतिशत की कटौती दर्ज की गई है।

मैनुअल और ऑटोमैटिक मोड के बीच स्विच करने की सुविधा (Ability to switch between manual and automatic mode)

गोसल ने कहा कि पंजाब की धरती से शुरू हुआ यह तकनीकी नवाचार भारतीय कृषि मशीनीकरण को नई दिशा देने में अहम भूमिका निभा सकता है। उन्होंने बताया कि विशेष रूप से यह प्रणाली सटीक खेती के लिए डिजाइन की गई है। इसके प्रमुख घटकों में जीएनएसएस रिसीवर, व्हील एंगल सेंसर (जो स्टीयरिंग की गति को ट्रैक करता है) और एक मोटराइज्ड स्टीयरिंग यूनिट शामिल हैं। ट्रैक्टर में लगा आईएसओबीयूएस - अनुरूप कंसोल उन्नत फीचर्स जैसे ऑटो टर्न, स्किप-रो फंक्शन और कस्टम टर्न पैटर्न को सपोर्ट करता है, जिससे ऑपरेटर को केवल एक बटन दबाकर मैनुअल और ऑटोमैटिक मोड के बीच स्विच करने की सुविधा मिलती है। डॉ. गोसल ने आगे बताया कि ISOBUS एक मानकीकृत संचार प्रोटोकॉल है, जिसका इस्तेमाल वैश्विक स्तर पर कृषि और वानिकी मशीनों के संचालन में किया जाता है।

एआई- संचालित सेल्फ-ड्राइविंग ट्रैक्टर से किसानों को क्या लाभ? (How do farmers benefit from AI-powered self-driving tractors?)

डॉ. गोसल ने आगे बताया कि यह तकनीक कम रोशनी की स्थिति में भी ट्रैक्टर की स्टीयरिंग को स्थिर और सटीक बनाए रखती है, जिससे फील्डवर्क (खेत की जुताई) के दौरान थकान, ओवरलैप (एक ही जगह पर दोबारा जुताई) और छूटे हुए क्षेत्रों की समस्या काफी हद तक कम हो जाती है। उन्होंने बताया कि मैन्युअल स्टीयरिंग के साथ जब डिस्क हैरो, कल्टीवेटर, रोटावेटर और स्मार्ट सीडर जैसे उपकरणों का उपयोग किया गया, तो खेतों में 3 प्रतिशत से 12 प्रतिशत तक ओवरलैप देखने को मिला, जबकि ऑटो-स्टीयरिंग सिस्टम के उपयोग से यह ओवरलैप घटकर लगभग 1 प्रतिशत तक सीमित हो गया। केवल ओवरलैप ही नहीं, जुताई के दौरान छूटे हुए क्षेत्र भी पहले जहां 2 प्रतिशत से 7 प्रतिशत तक थे, वहीं अब ये 1% से भी कम रह गए हैं। पीएयू (PAU) के परीक्षण आंकड़ों के अनुसार, इस उन्नत तकनीक ने ±3 सेमी तक की पास-टू-पास सटीकता बनाए रखी है, जिससे संसाधनों का अधिकतम उपयोग और फसल की स्थापना सुनिश्चित हो सकी है।

भारतीय कृषि का भविष्य हो सकती है यह तकनीक (This technology can be the future of Indian agriculture)

डॉ. गोसल ने बताया कि इस AI-आधारित ऑटो-स्टीयरिंग तकनीक को एक अमेरिकी कंपनी की मदद से विकसित किया गया है, जिसने इस सिस्टम के लिए आवश्यक टैबलेट इंटरफेस भी उपलब्ध कराया है। PAU इस तकनीक का समर्थन और अनुशंसा करेगा। किसानों को इसके प्रायोगिक लाभों से अवगत कराने के लिए इस स्वचालित ट्रैक्टर को कृषि मेलों और प्रदर्शनियों में प्रदर्शित किया जाएगा। शोध निदेशक डॉ. अजमेर सिंह धत्त ने कहा, "AI-संचालित ऑटो-स्टीयरिंग सिस्टम जैसे वैज्ञानिक और स्केलेबल समाधान भारतीय कृषि का भविष्य हैं।" डॉ. गोसल के अनुसार, यह तकनीक विदेशों में पहले ही आम हो चुकी है। उम्मीद है कि जैसे-जैसे इस तकनीक की मांग भारत में बढ़ेगी, ट्रैक्टर निर्माता कंपनियां भी इसे अपनाएंगी।

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