भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में धान, गेहूं, गन्ने जैसी पारंपरिक फसलों की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से किसान पारंपरिक फसलों की खेती के अलावा मुनाफेदार पौधों की खेती की ओर अपना रूख कर रहे हैं। वर्तमान समय में कई तरह की खेती से किसान जमकर पैसा भी कमा रहे हैं। ऐसी ही मुनाफेदार पौधों की खेती में पपीता की खेती भी शामिल है, जिसे किसानों के लिए चमत्कारी, चौतरफा फायदों वाला सौदा बताया गया है। पिछले कुछ सालों में किसानों के बीच इसके खेती का ट्रेंड तेजी से बढ़ा है। इसी बीच बिहार सरकार ने राज्य में बागवानी में फलों की खेती को बढ़ावा देने के लिए एक अहम कदम उठाया है। बिहार सरकार राज्य में बागवानी सेक्टर में पपीता की खेती में अपार संभावना को देखते हुए अपने सूबे के किसानों को इसके लिए प्रोत्साहित कर रही है। जिसमें बिहार सरकार राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत एकीकृत बागवानी विकास मिशन चला रही है जिसके तहत किसानों को पपीते के बाग लगाने के लिए सब्सिडी दी जा रही है। कम से कम प्रति हेक्टेयर खेत में पपीता की फसल लगाने पर 60,000 रुपये की लागत के आधार पर 75 प्रतिशत सब्सिडी का लाभ किसानों को दिया जाएगा। तो अइए ट्रैक्टरगुरू की इस लेख में पपीते की खेती पर मिलने वाली सब्सिडी और उससे होने वाली कमाई के बारे में विस्तार से जानते हैं।
पपीता एक आयुर्वेदिक औषधी के साथ चौतरफा फायदा देने वाला चमत्कारी फल है। यानि सौ मर्जों के एक सिंगल इलाज वाला यह आयुर्वेदिक फल कई तरह की बीमारियों के खिलाफ बेहद फायदेमंद है। यही वजह है कि कई बीमारियों में चिकित्सकों द्वारा इसके सेवन की सलाह दी जाती है। है। भारत में पपीता की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। इसकी खेती तमिलनाडु, बिहार, असम, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू एवं कश्मीर, उत्तरांचल और मिजोरम आदि राज्यों में की जा रही है।
पपीता की खेती को बढ़ावा देने के लिए बिहार सरकार एकीकृत बागवानी विकास मिशन के तहत पपीते की खेती पर सब्सिडी दे रही है। कम से कम प्रति हेक्टेयर खेत में पपीता की फसल लगाने पर 60,000 रुपये की लागत के आधार पर 75 प्रतिश0त सब्सिडी का लाभ किसानों को दिया जायेगा। बता दें कि कम से कम प्रति हेक्टेयर खेत में पपीता के 2777 पौधे लगा सकते हैं, जिस पर फसल लगाने पर 60,000 रुपये की इकाई लागत आएगी। जिसे आपको प्लान्टिंग मैटेरियल, उर्वरक व प्लांट प्रोटक्शन रसायनों पर खर्च करना होगा। लागत इकाई का 75 प्रतिशत सब्सिडी के रूप में मिल जाएगा।
बिहार कृषि विभाग, बागवानी निदेशालय द्वारा जारी एकीकृत बागवानी विकास मिशन के तहत राज्य के किसानों को पपीता की खेती के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसके लिये बिहार राज्य की सरकार की तरफ से किसानों को पपीता की खेती पर सब्सिडी का लाभ दिया जा रहा है। बागवानी विकास मिशन योजना के तहत पपीपा की खेती पर सब्सिडी का लाभ लेने के लिये ऑफिशियल वेबसाइट http://horticulture.bihar.gov.in/HORTMIS/Home.aspx पर जाकर ऑनलाइन आवेदन करना होगा। पपीता की खेती, किस्में और सही तकनीक के साथ-साथ सब्सिडी की अधिक जानकारी के लिये नजदीकी जिले स्थित उद्यान विभाग के कार्यालय या सहायक निदेशक, उद्यान से संपर्क कर सकते हैं।
पपीता की खेती अकेले या अमरूद, आम व नींबू के पेड़ों के बीच खाली जगह पर भी कर सकते हैं। पपीता लगाने के डेढ़ वर्ष बाद फल मिलने लगते हैं। कम समय, कम क्षेत्र, कम लागत में अधिक पैदावार व अधिक आय प्राप्त होने के कारण पिछले कुछ सालों में जिले के किसानों का रुझान पपीता की खेती की तरफ बढ़ा है। पपीते की खेती के लिए उचित जल निकास वाली जीवांश से भरपूर दोमट व बलुई दोमट भूमि अच्छी रहती है। पपीते के लिए शुष्क व अर्धशुष्क क्षेत्र उपयोगी है। पपीता में पौधे से पौधे व कतार से कतार का फासला डेढ़ मीटर रखने पर 1742 पौधे प्रति एकड़ लगते हैं।
मधु, बिंदु, कुर्म, हनी, पूसा डिलीशियस, पूसा डवाफे, पूसा नन्हा, सीओ-7 प्रमुख पारंपरिक किस्में हैं। इसके अलावा सूर्या, मयूरी, पिंक प्लैस्ड प्रमुख संकर किस्में हैं।
पपीते की खेती में इसके पौधों की रोपाई के लिए एक महीने पहले जून माह में दो मीटर की दूरी पर 50 x 50 x 50 सेमी. गड्ढे खोदकर उनमें गोबर की खाद व मिट्टी की बराबर मात्रा मिलाकर भरें तथा सिंचाई करें ताकि मिट्टी बैठ जाए। फिर जुलाई माह में एक गड्ढे में दो पौधे लगाएं।
इसके पौधे पॉलीथिन के 25 x 10 सेमी. के लिफाफे में रेत व गोबर की खाद बराबर मात्रा में भरकर इसमें दो-तीन बीज एक लिफाफे में उगाकर भी तैयार कर सकते हैं। उगने के बाद एक लिफाफे में एक स्वस्थ पौधा रखें। पपीते के एक एकड़ खेत में पौध रोपण के लिए 40 वर्ग मीटर की दूरी रखते हुए रोपण के लिए 125 ग्राम बीज पर्याप्त रहता है। पपीते के खेती की बीज बोने के लिए एक मीटर चौड़ी व पांच मीटर लंबी क्यारियां बना लें। प्रत्येक क्यारी में खूब सड़ी गली गोबर की खाद मिलाकर व पानी लगाकर 15-20 दिन पहले छोड़ देते हैं। बीज को 3 ग्राम कैप्टान दवा प्रति किलो बीज की दर से उपचार करके 15 सेमी. दूरी पर दो सेमी. गहरा बोएं। रोग से बचाव के लिए 100 लीटर पानी में 200 ग्राम कैप्टान दवा घोलकर छिड़काव करें।
पपीते के पौधे की गर्मियों में हर सप्ताह तथा सर्दियों में 15-20 दिन बाद सिंचाई करते रहें। पौधों के तने के पास पानी जमा न होने दें। पपीते में फूल आने पर ही नर व मादा पौधों की पहचान होती है तब उनमें से सारे खेत में अलग-अलग 10 प्रतिशत नर पौधे रखकर बाकि नर पौधे निकाल दें। लीफ कर्ल व मौजेक रोग से प्रभावित पौधों को निकालकर नष्ट कर दें तथा सफेद मक्खी व चेंपा की रोकथाम के लिए 250 मिली. मैलाथियान 50 को 250 लीटर पानी में छिड़कें।
पपीता बाजार में करीब 50 रुपये किलो उपभोक्ताओं को मिलता है। इस हिसाब से किसानों को पपीते पर 20 रुपये किलो के हिसाब से दाम आराम से मिल जाएगा। पपीते के एक पौधे से औसतन 40 किलो फल तथा एक एकड़ में 200 से 300 क्विंटल फल मिल जाता है। इस हिसाब से किसानों को पपीते के एक एकड़ खेत से 40-60 हजार रूपये तक की कमाई हो सकती है।
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