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मौसम परिवर्तन के चलते कीट एवं रोगों की संभावना, चना उत्पादक किसान जल्दी करें ये काम

मौसम परिवर्तन के चलते कीट एवं रोगों की संभावना, चना उत्पादक किसान जल्दी करें ये काम
पोस्ट -15 जनवरी 2024 शेयर पोस्ट

चने की खेती से भरपूर पैदावार के लिए इस महीने में करें यह काम, 15 से 20 प्रतिशत होगी वृद्धि


Scientific Advice : पश्चिमी विक्षोभ के प्रभाव से पहाड़ों पर बारिश/ बर्फबारी होने के कारण मैदानी इलाकों में सर्दी बढ़ गई है। एक तरफ जहां न्यूनतम पारा लगातार गिरता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ फसलों पर सबसे अधिक खतरा पाला लगने का बना हुआ है। देश में पड़ रही तेज ठंड जहां गेहूं की पैदावार के लिए अच्छी है, तो अन्य फसलों के लिए नुकसान दायक साबित हो सकती है। जिसको देखते  हुए कृषि विभाग द्वारा किसानों के लिए कुछ जरूरी सलाह जारी की गई है। इन सलाहों को अपनाकर किसान पाले एवं कीट के प्रकोप से अपनी फसलों को बचा सकते हैं।

दरअसल, इस समय जनवरी का महीना चल रहा है, जो रबी फसलों की  पैदावार वृद्धि के लिए बहुत महत्वपूर्ण महीना माना जाता है। लेकिन जनवरी में लगातार गिर रहे तापमान से कोहरे के साथ रात में  पाला गिरने की संभावना बनी हुए है, तो दूसरी ओर बारिश व ओलावृद्धि होने की आशंका बनी रहती है। साथ ही मौसम परिवर्तन के चलते इस दौरान फसलों में कई कीट एवं रोग लगने की संभावना बनी रहती है, जिससे देखते हुए फसलों में उचित देखभाल करने की आवश्यकता है। आईए इस पोस्ट की मदद से किसानों को दी गई सलाह के बारे में जानते हैं।   

फसलों का लगातार करें निरीक्षण

इस समय देश के कई राज्यों के तापमान में तेजी गिरावट होने से पाला, कोहरे और ओलावृष्टि होने की आशंका को ध्यान में रखते हुए कृषि विभाग के वैज्ञानिकों ने किसानों को खेत में लगी फसलों का लगातार निरीक्षण करने के साथ ही समय पर खाद एवं सिंचाई करने की सलाह दी है। कृषि विभाग द्वारा खासकर चने की खेती करने वाले किसानों के लिए कहा है कि इस समय फसलों में पाला लगने के साथ-साथ कीट-रोगों का प्रकोप होने की संभावना भी बनी हुई है। ऐसे में चना उत्पादक किसान फसलों में  होने वाले नुकसान से बचना चाहते है, तो वे फसल में कीटनाशक-खाद छिड़काव एवं सिंचाई जैसे महत्वपूर्ण कार्य को समय पर आवश्य पूरा करना चाहिए। बता दें कि रबी सीजन में चना दलहन की एक मुख्य फसल है, देश के कई राज्यों में किसान चना की खेती प्रमुखता से करते हैं। किसानों की आमदनी चने की पैदावार पर भी निर्भर करती है। ऐसे में किसानों को चने की अधिक पैदावार के लिए इस समस फसल पर अधिक ध्यान देना आवश्यक है। 

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फसलों में समय से करें सिंचाई


कृषि विभाग द्वारा चने की फसल में पहली सिंचाई, जरूरत के अनुसार बुआई के 40 से 50 दिनों के बाद (फसल में फूल आने से पहले) करनी चाहिए। वहीं दूसरी सिंचाई फलियों में दाना भरते समय कर लेनी चाहिए। अगर इस बीच सर्दी की बारिश हो जाये, तो फसलों में दूसरी सिंचाई की आवश्यकता नहीं होगी। फसलों में सिंचाई के लगभग एक सप्ताह के पश्चात ओट आने पर हल्की गुड़ाई करना फायदेमंद होता है।  चने में दूसरी सिंचाई फलियों में दाना बनते समय लगभग 60 से 75 दिनों बाद करनी चाहिए। अगर दूसरी सिंचाई के समय ठंड की वर्षा हो जाये तो दूसरी सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन वर्षा न हो, तो आवश्यकता अनुसार हल्की सिंचाई कर लेनी चाहिए इससे पैदावार में वृद्धि हो जाती है। चने की फसल की भरपूर पैदावार हेतु जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए अन्यथा फसल में नुकसान होने  का अंदेशा रहता है। वहीं, गेहूं की फसल में पहली सिंचाई बुआई के लगभग 20 से 25 दिनों बाद, दूसरी सिंचाई 40 से 45 दिनों के बाद कल्लों के विकास के समय, तीसरी सिंचाई बुआई के लगभग 65 से 70 दिनों बाद, चौथी सिंचाई 90 से 95 दिनों बाद फूल आते समय और पाँचवी सिंचाई बुआई के 105 से 110 दिनों बाद दानों में दूध पड़ते समय करनी चाहिए।

यूरिया के घोल का छिड़काव रहता है लाभदायक

कृषि विभाग के उप निदेशक ने बताया कि सरसों, गेंहू, चना, आलू, मटर जैसी फसलों में इस समय यूरिया खाद का घोल या दानेदार यूरिया का छिड़काव  करना लाभदायक रहता है। असिंचित या देरी से बुआई की दशा में किसानों को 2 प्रतिशत यूरिया के घोल का छिड़काव फसल में फूल आने के समय दो बार शाम के वक्त करना चाहिए। चने की फसल में यूरिया के घोल का छिड़काव किसान 10 दिनों के अंतराल पर करें। इससे उपज में 15 से 20 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है। वहीं, जिस दिन पाला पड़ने की संभावना हो उस दिन फसलों पर गन्धक के तेजाब के 0.1 प्रतिशत घोल का छिड़काव करना चाहिए। घोल का छिड़काव स्प्रेयर की मदद से पौधे पर फुआर के रूप में करें। सरसों, गेंहू, चना, आलू, मटर जैसी फसलों पर गन्धक के तेजाब के घोल का छिड़काव करने से फसलों का पाले से बचाव होता है। साथ ही पौधों में लौह तत्व की जैविक एवं रासायनिक सक्रियता बढ़ती है, जो पौधों में रोग प्रतिरोधिकता बढ़ाने में और फसल को जल्दी पकाने में मददगार होती है।

कीट की रोकथाम के लिए मोनोक्रोटोफॉस या फेनवेलरेट का छिड़काव

कृषि विभाग ने बताया है कि मौसम परिवर्तन के समय चने समेत अन्य रबी फसलों में कीट का प्रकोप देखा जा सकता है। खास कर चने की फसल में फली बनते समय कीटों का प्रकोप अधिक देखा जाता है। अगर इस समय चने के खेत में चिड़िया बैठ रही हो, तो समझ लेना चाहिए की चने में फली छेदक कीट लगने की संभावना है। ऐसें में किसान फली छेदक कीट की रोकथाम के लिए फली बनने के प्रारंभ में ही  मोनोक्रोटोफॉस 36 EC की 750 एमएल (ml) या फेनवेलरेट 20 EC की 500 एमएल (ml) मात्रा 550-600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए। पहला छिड़काव फसल में 50 प्रतिशत फूल आने के बाद करना चाहिए। चने में 5 % एन.एस.के.ई. या 3 % नीम के तेल या आवश्यकतानुसार कीटनाशी का उपयोग किया जा सकता है।

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