भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, देश के अधिकांश हिस्सों में आने वाले दिनों में मानसूनी बारिश संबंधी गतिविधियां शुरू होने की संभावना है, जिसको देखते हुए किसान भाइयों ने धान, मक्का सहित अन्य खरीफ सीजन फसलों की बवाई के लिए जरूरी तैयारी शुरू कर दी है। इस कड़ी में खरीफ सीजन में बोई जाने वाली मक्का फसल की बुवाई का उत्तम समय शुरू होने वाला है। किसान खरीफ मक्का की बुवाई के लिए खेत तैयार कर रहे हैं, तो कुछ किसानों के मन में सवाल है कि मक्का की खेती से बेहतर गुणवत्तायुक्त अधिक फसल उत्पादन कैसे लिया जा सकता है। मालूम हो कि मक्का फसल उत्पादन, गुणवत्ता मिट्टी के स्वास्थ्य, बुवाई का सबसे सही समय और बुवाई की तकनीकों पर निर्भर करती है। अगर सही और सटीक समय पर मक्का की बुवाई नहीं होती है, तो उत्पादन घट सकता है। ऐसे में खरीफ मक्का की बुवाई का सही समय, सबसे अच्छे बुवाई यंत्र और बीज मात्रा को लेकर आईसीएआर संस्थान के एक्सपर्ट ने कुछ जानकारी दी है। आइए, इनके बारे में विस्तार से जानते हैं।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के मुताबिक, सामान्य परिस्थितियों में, वर्षा आधारित मक्का फसल की बुआई का उत्तम समय 15 जून से 15 जुलाई के बीच होता है। खरीफ सीजन में, वर्षा आधारित परिस्थितियों में, मक्का की बुवाई पर्याप्त वर्षा (50 मिमी से अधिक) के बाद ही करनी चाहिए। आज के मक्का किसान अपनी फसल उगाने और भूमि की देखभाल करने के लिए कई तरह के विशेष आधुनिक कृषि यंत्रों और उपकरणों का उपयोग करते हैं। जीपीएस (GPS) तकनीक से लैस ट्रैक्टर सटीक रोपण और फ़ील्ड मैपिंग को सक्षम करते हैं। इससे संसाधनों का कुशल उपयोग सुनिश्चित होता है। इसके अलावा, प्लांटर्स और कंबाइन हार्वेस्टर जैसे यंत्रों को मिट्टी की गड़बड़ी को कम करते हुए पैदावार को बढ़ाने के लिए डिजाइन किया गया है। कुछ किसान उत्पादन, गुणवत्ता और मिट्टी के स्वास्थ्य को अनुकूलित करने के लिए खेती को बड़े उच्च तकनीक वाले उपकरणों से जोड़ते हैं।
खरीफ मौसम मक्का की खेती करने वाले किसानों के लिए एक फायदे का सौदा है। विशेषकर तब जब इथेनॉल और पोल्ट्री फार्म क्षेत्र में इसकी मांग अधिक देखी जा रही है। हालांकि, मक्के की खेती से कमाई तभी बढ़ पाएगी जब इसका उत्पादन भी अधिक होगा। इस उत्पादन को बढ़ाने के लिए किसानों को नीचे बताए जा रहे सुझावों को अपनाते हुए फसल की बुवाई करनी चाहिए। इसके अलावा, वर्तमान में यूपी सरकार द्वारा मक्के की खेती को भी बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रति क्विंटल बीज पर 15 हजार रूपए सब्सिडी दी जा रही है, जिसके लिए त्वरित मक्का विकास कार्यक्रम चलाया जा रहा है। सरकार किसानों को त्वरित मक्का विकास कार्यक्रम के तहत संकर, देसी पॉप कॉर्न, बेबी कॉर्न तथा स्वीट कॉर्न के बीज सब्सिडी पर उपलब्ध करा रही है। बता दें कि पर्यटकों की अधिकता वाले क्षेत्र में देशी पॉप कॉर्न, बेबी कॉर्न और स्वीट कॉर्न की अधिक मांग है, इसलिए इस कार्यक्रम के तहत सरकार इनको भी बढ़ावा दे रही है।
नो-टिल फार्मिंग विधि (शून्य जुताई) एक खेती की ऐसी तकनीक है, जिसमें मिट्टी की बिना जुताई किए, सीधे फसल के बीजों की मिट्टी में बुवाई की जाती है। यह विधि मिट्टी के स्वास्थ्य को बढ़ावा देती है, जल अवशोषण और कार्बन पृथक्करण को बढ़ाता है और यह मिट्टी के कटाव को कम करने में भी मदद करता है। नो-टिल फार्मिंग में मक्का की खेती के लिए डिस्क सीडर या सीड ड्रिल जैसे विशेष कृषि यंत्रों का उपयोग किया जाता है। नो-टिल फार्मिंग में, बीजों को पिछली फसलों के अवशेषों के तहत लगाया जाता है। इस विधि के साथ मक्का की खेती करने के लिए विशेष उपकरणों और प्रबंधन तकनीकों का उपयोग करने की आवश्यकता होती है, लेकिन इससे भूमि के स्वास्थ्य में सुधार और उत्पादन में वृद्धि हो सकती है।
आईसीएआर ने सुझाया है कि मक्का की सामान्य संकर किस्म के लिए बीज दर 17.5 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर, स्वीटकॉर्न खेती के लिए 7.5 से 10 किलोग्राम / हेक्टेयर, पॉपकॉर्न के लिए 12.5 किलोग्राम / हेक्टेयर और बेबी कॉर्न मक्का फसल के लिए 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करें। बीजों की बुआई के 2 -3 दिन के भीतर, हल्की मिट्टी में 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर और भारी मिट्टी में 3 किलोग्राम/हेक्टेयर एट्राजीन हर्बिसाइड को 500 लीटर पानी में मिलाकर पर्याप्त नमी होने पर करीब 30 दिनों तक छिड़काव करें। इससे चौड़ी पत्ती वाले और कुछ घास वाले खरपतवारों पर नियंत्रण करने में मदद मिलती है। फसल बोने के लिए प्लांटर जैसे यंत्रों का इस्तेमाल करें। यह ट्रैक्टर के पीछे खेत में खींचे जाने के दौरान जमीन में बीज डालता है। प्लांटर बीज को मिट्टी में डालता और मिट्टी ढ़क देता है, बिना आस-पास की मिट्टी को नुकसान पहुंचाए।
सामान्य और जीरा टिलेज मक्का खेती में चौड़ी पत्ती वाले और अन्य घास वाले खरपतवारों के नियंत्रण के लिए किसान 15 से 18 दिन या चार पत्ती वाले खरपतवार अवस्था में टेम्बोट्रिऑन 34.4 प्रतिशत SC @ 287.5 मिली प्रति हेक्टेयर + एट्राजीन 50 प्रतिशत WP @ 1000 ग्राम / हेक्टेयर या टोप्रामेजोन 33.6 फीसदी SC 75 मिली + एट्राजीन 50 प्रतिशत WP @ 1000 ग्राम / हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें। अगर साइपरस प्रजाति की समस्या अधिक है, तो हैलोसल्फ्यूरॉन मिथाइल @ 100 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।
फसल की सिंचाई के लिए सेंटर-पिवट सिंचाई का उपयोग करें। इसमें एक लंबा, ऊंचा पाइप होता है, जिसके नीचे स्प्रिंकलर हेड लटके हुए होते हैं। पाइप पहियों पर लगा होता है, जिससे यह केंद्र बिंदु के चारों ओर घूमकर खेत के विभिन्न हिस्सों में पानी देता है। यह फसल को सटीक मात्रा में पानी देता है। इस सिंचाई में फसल को पोषण देने के लिए पानी में जरूरी पोषक तत्व भी मिलाया जा सकता हैं।
आईसीएआर के अनुसार, फॉल आर्मी वर्म एक प्रकार का पतंगा कीड़ा है, जो मक्का और अन्य फसलों को नुकसान पहुंचाता है। फॉल आर्मी वर्म स्पोडोप्टेरा फ्रुगिपेर्डा नामक पतंगे के लार्वा चरण का एक रूप है। मक्का की फसल को फॉल आर्मी वर्म (Fall Armyworm) से बचाना जरूरी होता है। इसके लिए गर्मियों में जुताई, अंडों को इकट्ठा करना और नष्ट करना, फ़ेरोमोन ट्रैप (एस. फ्रूजीपरडा) @4 प्रति एकड़ की दर से अनाज सोरघम के साथ सीमा फसल की बुवाई और लोबिया (कुछ पंक्तियों) के साथ अंतर फसल, एजाडिरेक्टिन 10000 पीपीएम @2 मिली प्रति लीटर का छिड़काव 10 से 15 दिन पर करें, ईपीएन या बीटी स्प्रे @2 मिली / 1 (15 से 21 दिन) को अपनाना चाहिए। मक्का किसान इन जरूरी सुझाव से फ़ॉल आर्मी वर्म को नियंत्रित कर सकते।
मक्का किसान फसल उत्पादन और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए फसल में इमामेक्टिन बेंजोएट 5SG @0.4 ग्राम प्रति ली (या) स्पिनोसैड 480SC @0.5 मिली / 1 (21 से 28 दिन) पर इस्तेमाल कर सकते हैं। मेटारिज़ियम एनीसोप्लाई स्प्रे (1x107) @2 मिली / 1 (30 से 35 दिन), फ्लूबेंडियामाइड 480SC @ 0.3 मिली/ली (या) क्लोरोट्रिलिनिप्रोएल 18.5SC @ 0.3 मिली/ली या स्पिनेटोरम 11.7 SC @ 0.3 मिली/1 (36 से 42 दिन) के साथ दूसरा कीटनाशक छिड़काव करें। फॉल आर्मी के लिए अन्य दवा जैसे थायोडिकार्ब 75WP (250 ग्राम थायोडिकार्ब और 25 किग्रा चावल की भूसी और 5 किग्रा गुड़ प्रति हेक्टेयर) का इस्तेमाल कर सकते हैं।
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