ग्वार, मक्का और बाजरा चारे की फसलों की बुवाई करने की एडवाइजरी जारी

ग्वार, मक्का और बाजरा चारे की फसलों की बुवाई करने की एडवाइजरी जारी
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जानें ग्रीष्मकालीन ग्वार, मक्का, बाजरा चारा फसल की बुवाई का सही समय और जरूरी टिप्स।

Technical advice for farmers : ग्रीष्मकालीन फसलों की खेती को लेकर कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विशेष एडवाइजरी जारी की जा रही है। इससे फसल की बेहतर पैदावार बढ़ाने में मदद मिलती है। विशेषकर चारे की फसलों में। क्योंकि ग्वार, मक्का और बाजरा जैसी चारे की फसलें पशुपालन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। इन फसलों से पशुओं को हाई क्वालिटी पोषक आहार मिलता है। ऐसे में इनके उत्पादन को बेहतर बनाने के लिए सही समय पर बुवाई करना सबसे अहम होता है। इस कड़ी में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई) की तकनीकी सलाह में ग्रीष्मकालीन चारे की फसल की खेती करने वाले कृषकों को इस सप्ताह ग्वार, मक्का और बाजरा जैसी चारे की फसलों की बुवाई करने की एडवाइजारी जारी की गई है। आइए, जानते हैं किसानों के लिए इन फसलों की बुवाई के लिए उपयुक्त तकनीकी सलाह क्या जारी की गई है। 

चारे की मात्रा और गुणवत्ता दोनों में वृद्धि (Increase in both quantity and quality of fodder)

आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की यह परामर्श (Advice) चारे की खेती करने वाले किसानों के लिए अत्यंत लाभकारी है। समय पर और सही तकनीक से की गई बुवाई चारे की मात्रा और गुणवत्ता दोनों में वृद्धि करती है, जिससे न केवल पशुपालन को समर्थन मिलता है बल्कि किसानों की आमदनी में भी वृद्धि होती है। किसानों को सलाह है कि बुवाई के दौरान बीजों की गहराई 3 से 4 सेमी और कतार से कतार की दूरी 25 से 30 सेमी रखनी चाहिए। बुवाई के वक्त खेतों में पर्याप्त नमी होना जरूरी है, जिससे बीज अंकुरण बेहतर हो। 

ग्वार फसल की तकनीकी बुवाई (Sowing technology of Guar crop)

तकनीकी सलाह में किसानों को ग्रीष्म कालीन ग्वार की बुवाई करने के लिए कहा गया है। यह समय इसकी बुवाई के लिए सबसे उपयुक्त है। सिंचित और बारानी क्षेत्रों के किसान ग्वार की बुवाई शुरू कर सकते हैं। ग्वार की सामान्य किस्म के बीज की बुवाई पंक्ति से पंक्ति  45 से 50 सेमी (सामान्य), 30 सेंटीमीटर (एकल तना किस्म के लिए), पौध से पौध 10-15 सेमी की दूरी रखते हुए करें।  दाने व गोंद के लिए किसान ग्वार की एच जी- 365, एच जी- 563, आर जी सी- 1066 और आर जी सी- 1003 किस्मों की बुवाई करें। दुर्गा बहार, पूसा नवबहार और पूसा सदाबहार  ग्वार किस्म की बुवाई सब्जी हेतु और पशु चारे के लिए ग्वार की एच एफ जी- 119, एच एफ जी- 156 आदि की बुवाई करनी चाहिए। इससे किसान ज्यादा पैदावार और मुनाफा हासिल कर सकते हैं। 

ग्रीष्म कालीन ग्वार (Sowing technology of Guar crop)

ग्वार एक फलीदार (लेग्युमिनस) फसल है, जिसके उत्पादन का उपयोग पशुओं के लिए पोष्टिक चारे एवं हरी / सूखी सब्जी और हरी खाद के रूप में किया जाता है। इसके अलावा ग्वार से निकलने वाले गोंद का प्रयोग उद्योगों में किया जाता है। जमीन में ग्वार की जड़ें गहरी जाने के कारण यह सूखा सहिष्णु पौधा कहलाता है, और कम सिंचाई में होने के कारण बारानी क्षेत्रों में इससे अन्य फसलों की अपेक्षा ज्यादा लाभ कमाया जा सकता है। यह फलीदार दलहनी फसल होने से मोठ नत्रजन के स्थिरीकरण द्वारा मृदा की उर्वराशक्ति को बढ़ाता है। उत्पादन की  दृष्टि से राजस्थान अग्रणी राज्य है। यहां इसकी खेती पशुओं के लिए पोष्टिक  आहार के उद्देश्य से की जाती है। 

ग्वार की बुवाई का सही समय और तापक्रम (Right time and temperature for sowing Guar)

ग्वार की खेती के लिए मध्यम से हल्की भूमि जिसका पीएच मान 7.0-8.5 तक हो, उपयुक्त होती है। खेत में जल का ठहराव फसल को अधिक हानि पहुंचाता है। इसलिए खेत में जल निकासी की अच्छी व्यवस्था होनी चाहिए। भारी दोमट भूमियां इसकी खेती के लिए अनुपयुक्त है। अधिक नमी वाले क्षेत्रों में ग्वार की वृद्धि रूक जाती है। ग्वार की बुवाई का उपयुक्त समय जून के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई के तीसरे सप्ताह तक है। बुवाई के समय 30- 35 डिग्री सेन्टीग्रेड तापक्रम अच्छे अंकुरण के लिए और 32-38 डिग्री सेन्टीग्रेड तापक्रम पर वानस्पतिक वृद्धि अच्छी होती है। लेकिन फूल वाली अवस्था में अधिक तापक्रम के कारण फूल गिर जाते है। ग्वार अधिकतम 45 से 46 डिग्री सेन्टीग्रेड तापक्रम को सहन कर सकती है। 

खेती तैयारी के लिए तकनीकी सलाह (Technical advice for farm preparation)

आईसीएआर की तकनीकी सलाह के अनुसार, गेहूं की फसल काटने के पश्चात खेत एक गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले मोल्डबोर्ड हल या डिस्क हैरो से मिट्‌टी को तोड़ते हुए हल्का करें। इसके बाद देशी हल या कल्टीवेटर का उपयोग करते हुए 1 से 2 बार कॉस जुताई कर खेत को खरपतवार रहित करें। इसके उपरान्त रोटावेटर या पाटा चलाकर खेत को समतल करें। चारा तथा हरी खाद के लिए 40 से 45 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीच मात्रा पर्याप्त है। बीज की बुवाई करने से पहले 2 ग्राम थीरम व 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलोग्राम या 3 ग्राम थीरम प्रति किलोग्राम की दर से बीजों को उपचारित करें। फफूंदनाशी दवा से उपचार के पश्चात बीज को राइजोबियम कल्चर की 600 ग्राम प्रति हेक्टेयर बीज दर के हिसाब से उपचारित करके बुवाई करें। इसके लिए 250 ग्राम गुड़ को 1 लीटर पानी में घोलकर उस घोल में राइजोबियम कल्चर मिलाते हैं तथा इस घोल से बीजों को शोधित करते हैं।

मक्का चारे फसल की तकनीकी बुवाई (Sowing technology of maize fodder crop)

  • बुवाई का समय : जून से जुलाई का प्रथम सप्ताह सर्वोत्तम।
  • अनुकूल तापमान : 21°C से 30°C
  • भूमि : मध्यम से भारी दोमट मिट्टी, अच्छे जल निकास वाली। नाइट्रोजन की उचित मात्रा युक्त मैरा और लाल मिट्‌टी सबसे उपयुक्त। 
  • पीएच मान  :  मिट्टी का पी एच 5.5-7.5 
  • चारा उत्पादन के लिए - 50 से 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज मात्रा उचित रहता है।
  • पंक्ति से पंक्ति की दूरी 30 सेमी रखें।
  • बुवाई से पहले खेत की अच्छी तरह जुताई करें और खरपतवार मुक्त कर खेत को समतल बनाएं।
  • बिजाई हाथों से गड्ढा खोदकर या आधुनिक तकनीक से ट्रैक्टर और सीड ड्रिल की मदद से मेड़ बनाकर की जा सकती है।


बाजरा (चारा फसल) के लिए तकनीकी सलाह (Technical advice for millet (fodder crop)

  • बुवाई का उपयुक्त समय : जुलाई का पहला पखवाड़ा सर्वोत्तम।
  • अनुकूल तापमान : 25 से 35 डिग्री सेन्टीग्रेड तापक्रम
  • भूमि : अच्छे जल निकास वाली सूखी और हल्की से मध्यम दोमट मिट्टी उपयुक्त, रेतली से लेकर भारी हर तरह की जमीनों में उगाई जा सकती है। 
  • बीज की मात्रा : लगभग 15 से 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त।
  • फसल अंतराल :  ट्रैक्टर और सीड ड्रिल की मदद से 30x10 सेमी की दूरी पर बीज बोएं।
  • समय पर सिंचाई और निराई-गुड़ाई कर खेत को खरपतवार रहित रखें, जिससे उत्पादन में बढ़ेगा। 

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