Sheep and Goat Disease : दिल्ली-यूपी समेत पूरे उत्तर भारत में इस समय मानसून पूरी तरह सक्रिय है। मैदानी इलाकों से लेकर पहाड़ी क्षेत्रों तक झमाझम बारिश का दौर जारी है। जहां एक तरफ यह बारिश खेती-किसानी के लिए वरदान साबित हो रही है, वहीं दूसरी ओर पशुपालकों के लिए यह मौसम चुनौतियां लेकर आया है। क्योंकि लगातार हो रही बारिश और नमी से भेड़-बकरियों में फड़किया रोग का खतरा बढ़ गया है, जिससे पालकों में चिंता का माहौल है। यह बीमारी खासतौर पर नमी वाले मौसम में ज्यादा फैलती है और समय पर इलाज न मिलने पर पशुओं की जान भी ले सकती है। ऐसे हालात में पशुपालक, पशु चिकित्सा विशेषज्ञों की सलाह मानकर और सुझाए गए बचाव उपायों को अपनाकर अपने पशुओं को इस बीमारी से सुरक्षित रख सकते हैं। आइए जानते हैं बचाव उपाय।
पशु चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक, फड़किया (एंटरोटॉक्सिमिया) रोग भेड़ व बकरियों में होने वाली एक प्रमुख बीमारी है, जो क्लोस्ट्रीडियम पर्फ्रिन्जेस (clostridium perfringens) नाम जीवाणु के कारण होता है। क्लोस्ट्रीडियम पर्फ्रिन्जेस टाइप डी द्वारा आंतों में उत्पन्न किए गए जहर (टॉक्सिन) के आंतों द्वारा अवशोषण से होता है। सामान्य तौर पर यह जीवाणु पशु की आंत में मौजूद रहता है। लेकिन अनुकूल परिस्थितियों में सक्रिय होकर हर उम्र, नस्ल और लिंग की भेड़ व बकरियों को प्रभावित कर सकता है। रोग से प्रभावित पशुओं की मांसपेशियों में सूजन, तेज बुखार, भूख न लगना और अचानक मौत जैसी स्थिति देखी जाती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, हरे चारे का अधिक मात्रा का सेवन भेड़-बकरियों में फड़किया रोग (एन्टेरोटोक्सिमिया) का प्रमुख कारण है, क्योंकि बरसात के मौसम में हरा चारा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है, इसी वजह से यह बीमारी स्वस्थ पशुओं में भी इस समय अधिक देखने को मिलती है। लेकिन यह बीमारी किसी भी मौसम में हो सकती है, अत्यधिक चारा खाने से इस रोग का खतरा बना रहता है।
मार्च-अप्रैल महीने में रबी फसल कटाई के दौरान खेतों में बड़ी मात्रा में चारा, अन्न और दलहन के दाने गिर जाते हैं। ऐसे खेतों में चरते समय भेड़-बकरियां अचानक बहुत ज्यादा चारा खा लेती हैं, जिससे वे इस जानलेवा बीमारी की चपेट में आ जाती हैं। इसके अलावा, आहार में अचानक बदलाव या ज्यादा प्रोटीन वाले हरे चारे का सेवन भी फड़किया रोग को अधिकता से बढ़ा सकता है।
खान-पान में अचानक बदलाव से क्लोस्ट्रीडियम पर्फ्रिन्जेस जीवाणु की वृद्धि दर बढ़ जाती है, जिसके परिणामस्वरूप आंतों में जहर (टॉक्सिन) का अत्यधिक उत्पादन होता है। इस रोग से पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है और कई बार तो पूरे रेवड़ की मौत भी हो जाती है।
बारिश के दौरान भेड़-बकरियों में बहुत सारी बीमारी के जीवाणु (बैक्टीरिया) ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं। इनमें कुछ जीवाणुजनित बीमारी ऐसी हैं जिनका कोई इलाज नहीं है। इन बीमारियों के इलाज के नाम पर सिर्फ वैक्सीनेशन है। फड़किया (एन्टेरोटोक्सिमिया) भी एक ऐसी ही एक बीमारी है। अभी इस बीमारी का इलाज नहीं है, लेकिन समय से वैक्सीनेशन कराने से बीमारी की रोकथाम की जा सकती है।
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