डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों के कारण अब किसान ऐसे ट्रैक्टरों को ज्यादा पसंद कर रहे हैं, जो कम ईंधन खर्च में ज्यादा काम कर सकें और लंबे समय तक भरोसेमंद प्रदर्शन दें। किसानों की इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए महिंद्रा XP प्लस (Mahindra XP Plus) सीरीज और पॉवरट्रैक डीजल सेवर (Powertrac Diesel Saver) सीरीज बाजार में काफी लोकप्रिय हो रही हैं।
महिंद्रा की XP Plus सीरीज के ट्रैक्टर जहां अपनी अतिरिक्त ताकत (Extra Long Stroke - ELS इंजन) के लिए जाना जाते हैं, वहीं पॉवरट्रैक की Diesel Saver सीरीज अपनी AVL तकनीक और कम खपत के लिए मशहूर है। हालांकि, जब बात खेत के आकार, इंप्लीमेंट्स की क्षमता, ट्रॉली कार्य, रखरखाव खर्च और लंबे समय तक उपयोग की आती है, तो किसानों के लिए सही ट्रैक्टर रेंज चुनना थोड़ा मुश्किल हो जाता है।
अगर आप भी नया ट्रैक्टर खरीदने की सोच रहे हैं और महिंद्रा XP प्लस तथा पॉवरट्रैक Diesel सेवर के बीच कंफ्यूज हैं, तो यह तुलना आपके लिए काफी मददगार साबित हो सकती है। आइए जानते हैं दोनों ट्रैक्टर सीरीज के मुख्य अंतर और समझते हैं कि आपके खेत और कृषि कार्यों के लिए कौन-सा ट्रैक्टर ज्यादा किफायती और बेहतर विकल्प हो सकता है।
महिंद्रा की XP प्लस सीरीज में एक्स्ट्रा लॉन्ग स्ट्रोक (ELS) इंजन मिलता है, जिससे बहुत भारी टॉर्क और हाई बैकअप टॉर्क पैदा होता है। इसकी वजह से ट्रैक्टर बिना दबे और बिना बंद हुए खेत में कल्टीवेटर या रोटावेटर जैसे कृषि उपकरणों को आसानी से खींचता है। वहीं, पॉवरट्रैक की डीजल सेवर सीरीज मुख्य रूप से बेहतर इंजन एफिशिएंसी और डीजल की बचत के लिए डिजाइन की गई है। इसमें भी टॉर्क अच्छा मिलता है, लेकिन इसका मुख्य फोकस कम आरपीएम (RPM) पर इंजन को स्मूथली चलाकर डीजल बचाना है। जब बात अचानक आने वाले भारी लोड की होती है, तो इसका बैकअप टॉर्क महिंद्रा के मुकाबले थोड़ा कम रिस्पॉन्स करता है।
अगर मिट्टी सामान्य या मध्यम सख्त है, तो पॉवरट्रैक कम डीजल में काम निपटाने में बाजी मार लेता है, जबकि बहुत ज्यादा कड़क, पथरीली या गहरी काली मिट्टी वाले इलाकों में महिंद्रा एक्सपी प्लस का इंजन ज्यादा टिकाऊ प्रदर्शन करता है।
पॉवरट्रैक के डीजल सेवर ट्रैक्टरों के इंजनों में खास AVL तकनीक का मिश्रण देखने को मिलता है। इनके पिस्टन और कंबशन चैंबर (जहां डीजल जलता है) को इस तरह डिजाइन किया गया है कि हवा और डीजल का मिश्रण पूरी तरह से जलता है। इससे बिना डीजल बर्बाद हुए इंजन को अधिकतम शक्ति मिलती है। साधारण ट्रैक्टरों की तुलना में पॉवरट्रैक के अधिकतर मॉडल 1800 से 1850 रेटेड आरपीएम पर ही अपनी पूरी हॉर्सपावर (HP) और बेहतरीन टॉर्क जनरेट कर लेते हैं। इसका मतलब है कि इंजन के आरपीएम जितने कम होंगे, प्रति घंटे डीजल की खपत उतनी ही कम होगी। वहीं महिंद्रा के ट्रैक्टर भारी लोड़ पर ज्यादा कुशलता से कार्य करते हैं।
रोटावेटर पर सबसे बेहतरीन परफॉरमेंस और डीजल की बचत के मामले में महिंद्रा एक्सपी प्लस और पॉवरट्रैक डीजल सेवर सीरीज एक-दूसरे को कड़ी टक्कर देती हैं। दोनों की पीटीओ पावर और रोटावेटर परफॉर्मेंस की पूरी तुलना नीचे दी गई हैं:
ट्रैक्टर की असली उपयोगिता उसके हाइड्रोलिक्स की क्षमता और रखरखाव (Maintenance/Repairing) खर्च पर भी निर्भर करती है। यदि ट्रैक्टर के हाइड्रोलिक्स मजबूत और सटीक हों, तो खेती का काम तेज और आसान हो जाता है। साथ ही, ट्रैक्टर का मेंटेनेंस और रिपेयरिंग खर्च भी बहुत मायने रखता है। अगर ट्रैक्टर के स्पेयर पार्ट्स महंगे हों या बार-बार खराबी आए, तो भविष्य में किसानों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
महिंद्रा एक्सपी प्लस (Mahindra XP PLUS) और पॉवरट्रैक डीजल सेवर (Powertrac Diesel Saver) सीरीज के हाइड्रोलिक्स प्रदर्शन, मेंटेनेंस और लंबे समय तक उपयोग से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी नीचे विस्तार से दी गई है:
दोनों ही भारतीय ब्रांड्स हैं, इसलिए इनके स्पेयर पार्ट्स (जैसे फिल्टर, बेल्ट, क्लच प्लेट) देश के किसी भी छोटे कस्बे या गांव की दुकान पर आसानी से मिल जाते हैं। महिंद्रा के पार्ट्स बेहद मजबूत होते हैं, लेकिन पॉवरट्रैक (एस्कॉर्ट्स ग्रुप) के मुकाबले इनके कुछ गियरबॉक्स या इंजन पार्ट्स थोड़े महंगे हो सकते हैं। पॉवरट्रैक के पार्ट्स की कीमत अपनी श्रेणी में सबसे किफायती मानी जाती है।
लंबे समय के लिए भरोसेमेंद निवेश में वारंटी सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। महिंद्रा एक्सपी प्लस सीरीज के ट्रैक्टर मॉडलों पर कंपनी 6 साल की बेजोड़ वारंटी प्रदान करती है। इसमें इंजन, गियरबॉक्स और हाइड्रोलिक्स जैसे मुख्य हिस्से कवर होते हैं। इसका फायदा यह है कि शुरुआती 6 सालों तक किसान को किसी भी बड़े मैकेनिकल फेलियर (बड़ी खराबी) के लिए अपनी जेब से मोटी रकम खर्च नहीं करनी पड़ती। पॉवरट्रैक डीजल सेवर सीरीज पर आमतौर पर 5 साल या 5000 घंटे की वारंटी मिलती है। यह भी एक बेहतरीन सपोर्ट है, हांलाकि महिंद्रा से यह 1 साल कम है।
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