Ranikhet Disease: देश के अधिकतर हिस्सों में गर्मी ने अपना तेवर दिखाना शुरू कर दिया है। मौसम विभाग के अनुसार, आगामी 4-5 दिनों के दौरान कई राज्य में मौसम मुख्यतः शुष्क बना रहेगा और अधिकतम तापमान में 2-4 डिग्री सेल्सियस तक की बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे गर्मी का प्रकोप बढ़ सकता है। इस बीच गर्मी के बढ़ने के साथ ही मुर्गियों (Hens) में बीमारियों और संक्रामक रोगों के फैलने का खतरा बढ़ जाता है। इन्हीं रोगों में से एक रोग है रानीखेत (Newcastle Disease), जो मुर्गियों (कुक्कुट-पालन की) की सबसे गंभीर विषाणु बीमारियों में से एक है। रानीखेत एक अत्यधिक घातक और संक्रामक रोग है, जो प्लेग के समान है। यह रोग बहुत से पक्षियों जैसे- मुर्गी, टर्की, बत्तख आदि में देखने को मिलता है लेकिन यह रोग प्रमुख रूप से मुर्गियों को प्रभावित करता है। आइए, मुर्गियों में घातक और संक्रामक रोग रानीखेत के लक्षण और इसके रोकथाम एवं बचाव के उपाय के बारे में जानते हैं।
रानीखेत (Newcastle Disease) मुर्गियों और पक्षियों में फैलने वाला एक विषाणु जनित वायरल रोग हैं। यह बहुत घातक और संक्रामक रोग होता है। वैसे तो यह रोग हर उम्र की मुर्गियों/पक्षियों में देखने को मिलता है, लेकिन इस रोग के लक्षण मुर्गियों में प्रथम सप्ताह से 3 सप्ताह के उम्र के बीच सबसे अधिक दिखाई देता है, रानीखेत होने के कारण पक्षी 2 से 3 दिनों में बहुत कमजोर हो जाता है और इस रोग से होने वाली मृत्यु दर भी अधिक है, इसमें मृत्यु दर 50 से 100 प्रतिशत तक होती है। रानीखेत रोग न्यूकैसल रोग विषाणु (NDV) के कारण होता है, जो पैरामायोक्सोवाइरस परिवार का वायरस है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में रानीखेत रोग के केस मुख्य रूप से देखने को मिलते हैं। यह एक वैश्विक रोग है, जो दुनिया के लगभग हर देश में देखा जा सकता है।
मुर्गियों का पालन करने वाले किसान और पोल्ट्री फार्म संचालकों के लिए यह एक गंभीर विषय है। इस रोग के फैलने से 40-50 प्रतिशत तक मुर्गियां मर जाती हैं। यदि यह रोग अपने पीक पर पहुंच जाए तो इससे 100 प्रतिशत तक मुर्गियां मर जाती हैं। इस रोग से संक्रमित पक्षियों में निम्नलिखत लक्षण दिखाई देते हैं : जैसे- खांसी और छींक आना, गर्दन लुड़कने लगती हैं, सांस नली (Tráquea) इंफेकटेड होने से सांस लेने में कठिनाई होती हैं। मुर्गियां मुंह खोलकर सांस लेने लगती हैं, संतुलन खोना, गर्दन मुड़ जाना (टॉर्टिकॉलिस), पैर और पंखों में लकवा, दस्त (Diarrea) की समस्या होना, मुर्गियां पतला और हरे रंग का मल करने लगती है, भूख न लगना, मुर्गियां दाना खाना कम कर देती है और उन्हे प्यास अधिक लगती है, अंडों में विकृति, अंडा उत्पादन में कमी इस रोग के मुख्य लक्षण है।
रानीखेत (Newcastle Disease) रोग मुर्गियों और अन्य पक्षियों में तेजी से फैलता है। यह संक्रमित पक्षियों के संपर्क में आने, दूषित भोजन, पानी और पोल्ट्री फार्म के उपकरणों से, हवा के माध्यम से (एरोसोल ट्रांसमिशन) और संक्रमित पक्षियों के मल या स्राव से फैलता है। भारत में बहुत सारे किसान परिवार मुर्गी पालन व्यवसाय करते हैं। इसलिए किसान और पोल्ट्री फार्म संचालकों को सही समय पर रानीखेत रोग का उपचार और रोकथाम के उपाय करने चाहिए। रानीखेत रोग के निदान के लिए मुर्गियों के रहन-सहन, खाने-पीने का अवलोकन करें। पोल्ट्री फार्म और उसके आसपास अच्छी तरह से साफ सफाई करें। लक्षण दिखाई देने पर पक्षियों को लैब ले जाकर एलिशा (Elisa) और पी सी आर (PCR) विधि से रक्त की जांच करें। रोग से ग्रसित मुर्गियों को अलग रखें।
टीकाकरण (वैक्सीनेशन) - इस घातक रोग से मुर्गियों के बचाव के लिए किसानों/मुर्गीपालकों के पास सिर्फ टीकाकरण (वैक्सीनेशन) ही एक मात्र उपाय है। यह टीकाकरण स्वस्थ मुर्गियों में सुबह के समय करना चाहिए और उन्हें रोग से प्रभावित पक्षियों से दूर और अलग रखना चाहिए। सबसे पहले इन्हें एफ-वन लाइव (F-1 Live) या लासोता लाइव स्ट्रेन (Lasota) वैक्सीन की खुराक 5-7 दिन पर देना चाहिए और दूसरा वैक्सीनेशन आर बी स्ट्रेन की बूस्टर डोज 8 से 9 हफ्ते और 16 से 20 हफ्ते की आयु पर करना चाहिए। रोग उभरने के बाद अगर तुरन्त रानीखेत एफ वन नामक वैक्सीन कर दी जाए, तो 24 से 48 घंटे में मुर्गियों की हालत सुधरने लगती है। वैक्सीन की खुराक पक्षियों की आंख और नाक से देनी चाहिए। यदि मुर्गीफार्म बड़े भाग में किया गया है, तो वैक्सीन को पानी के साथ मिलाकर भी दे सकते हैं।
रोग नियंत्रण उपाय : इस रोग को जड़ से खत्म करने के लिए अभी कोई भी दवा विकसित नही हो सकी है। हालांकि टेरामाईसीन, औक्सीस्टेक्लिन, उलीसाइक्लिन, आलसाइक्लिन, टेट्रासाइक्लिन आदि दवाइयों के प्रयोग से इस रोग को बड़े क्षेत्र में फैलने से रोका जा सकता है। कुक्कुट पालन शुरु करने से पहले क्षेत्र की जलवायु का अच्छे से अध्ययन कर लेना चाहिए। मुर्गी फार्म या उनके घर के दरवाजे के सामने पैर धोने के लिए उचित व्यवस्था करें। मुर्गी पालक मुर्गी घर की सफाई, इन्क्यूबेटर की सफाई, बर्तनों की सफाई संबंधी कार्य करने से इस रोग को फैलने से काफी हद तक रोक सकते हैं। दो पोल्ट्री फार्मो के बीच की दूरी कम से कम 100 से 150 मीटर रखनी चाहिये। रोग से मरे हुए पक्षियों को गड्ढ़े में दबा या जला देना चाहिए।
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