भेड़-बकरियों को फड़किया रोग से बचाव के लिए पशुपालक अपनाएं ये उपाय

पोस्ट -10 अगस्त 2025 शेयर पोस्ट

भेड़ और बकरी में फड़किया रोग का कहर, समय पर इलाज न मिलने पर पशुओं की मौत भी संभव

Sheep and Goat Disease : दिल्ली-यूपी समेत पूरे उत्तर भारत में इस समय मानसून पूरी तरह सक्रिय है। मैदानी इलाकों से लेकर पहाड़ी क्षेत्रों तक झमाझम बारिश का दौर जारी है। जहां एक तरफ यह बारिश खेती-किसानी के लिए वरदान साबित हो रही है, वहीं दूसरी ओर पशुपालकों के लिए यह मौसम चुनौतियां लेकर आया है। क्योंकि लगातार हो रही बारिश और नमी से भेड़-बकरियों में फड़किया रोग का खतरा बढ़ गया है, जिससे पालकों में चिंता का माहौल है। यह बीमारी खासतौर पर नमी वाले मौसम में ज्यादा फैलती है और समय पर इलाज न मिलने पर पशुओं की जान भी ले सकती है। ऐसे हालात में पशुपालक, पशु चिकित्सा विशेषज्ञों की सलाह मानकर और सुझाए गए बचाव उपायों को अपनाकर अपने पशुओं को इस बीमारी से सुरक्षित रख सकते हैं। आइए जानते हैं बचाव उपाय। 

फड़किया रोग : भेड़ व बकरियों में होने वाली एक प्रमुख बीमारी (Fadakiya disease: A major disease in sheep and goats)

पशु चिकित्सा विशेषज्ञों के मुताबिक, फड़किया (एंटरोटॉक्सिमिया) रोग भेड़ व बकरियों में होने वाली एक प्रमुख बीमारी है, जो क्लोस्ट्रीडियम पर्फ्रिन्जेस (clostridium perfringens) नाम जीवाणु के कारण होता है। क्लोस्ट्रीडियम पर्फ्रिन्जेस टाइप डी द्वारा आंतों में उत्पन्न किए गए जहर (टॉक्सिन) के आंतों द्वारा अवशोषण से होता है। सामान्य तौर पर यह जीवाणु पशु की आंत में मौजूद रहता है। लेकिन अनुकूल परिस्थितियों में सक्रिय होकर हर उम्र, नस्ल और लिंग की भेड़ व बकरियों को प्रभावित कर सकता है। रोग से प्रभावित पशुओं की मांसपेशियों में सूजन, तेज बुखार, भूख न लगना और अचानक मौत जैसी स्थिति देखी जाती है।

बरसात में फड़किया रोग का अधिक खतरा (There is a greater risk of Phadkiya disease in the rainy season)

विशेषज्ञों के मुताबिक, हरे चारे का अधिक मात्रा का सेवन भेड़-बकरियों में फड़किया रोग (एन्टेरोटोक्सिमिया) का प्रमुख कारण है, क्योंकि बरसात के मौसम में हरा चारा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है, इसी वजह से यह बीमारी स्वस्थ पशुओं में भी इस समय अधिक देखने को मिलती है। लेकिन यह बीमारी किसी भी मौसम में हो सकती है, अत्यधिक चारा खाने से इस रोग का खतरा बना रहता है।

मार्च-अप्रैल महीने में रबी फसल कटाई के दौरान खेतों में बड़ी मात्रा में चारा, अन्न और दलहन के दाने गिर जाते हैं। ऐसे खेतों में चरते समय भेड़-बकरियां अचानक बहुत ज्यादा चारा खा लेती हैं, जिससे वे इस जानलेवा बीमारी की चपेट में आ जाती हैं। इसके अलावा, आहार में अचानक बदलाव या ज्यादा प्रोटीन वाले हरे चारे का सेवन भी फड़किया रोग को अधिकता से बढ़ा सकता है।

पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान (Huge financial loss to livestock farmers)

खान-पान में अचानक बदलाव से क्लोस्ट्रीडियम पर्फ्रिन्जेस जीवाणु की वृद्धि दर बढ़ जाती है, जिसके परिणामस्वरूप आंतों में जहर (टॉक्सिन) का अत्यधिक उत्पादन होता है। इस रोग से पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है और कई बार तो पूरे रेवड़ की मौत भी हो जाती है।

फड़किया रोग के लक्षण और बचाव के उपाय : (Symptoms and prevention measures of Fadakiya disease)

क्या हैं लक्षण : (What are the symptoms)

  • प्रभावित भेड़-बकरियों के पेट में अफारा आ जाता है। 
  • मांसपेशियों में खिंचाव महसूस होने लगता है। 
  • पेट दर्द के कारण पशु पिछले पैरों से मारने लगता है, धीरे-धीरे सुस्त पड़ जाता है और फिर जमीन पर गिरकर टांगे व सिर सीधा खिंच जाते हैं। 
  • कई बार पशु सिर को दीवार या किसी कठोर सतह से टकराता है। ध्यान से देखने पर अंगों में हल्की-हल्की फड़कन (कंपन) भी दिखाई देती है।
  • बीमारी के लक्षण दिखाई देने के 3-4 घंटे के भीतर ही पशु की मौत हो सकती है। 
  • आमतौर पर रेवड़ (भेड़ या बकरियों का झुंड) का सबसे स्वस्थ मेमना सबसे पहले इसकी चपेट में आता है।
  • प्रभावित पशु तेजी से सांस लेने लगता है, आंखें चौकन्नी हो जाती हैं और मुंह से झाग निकलने लगता है। 
  • कई मामलों में यह देखा गया है कि शाम को चरकर लौटे स्वस्थ पशु अगली सुबह मृत पाए जाते हैं।

बचाव के उपाय : (Preventive measures)

  • भेड़-बकरियों को अधिक प्रोटीन वाला चारा कम मात्रा में ही खिलाया जाए।
  • दाने तथा चारे में अचानक बदलाव से बचना चाहिए, जिससे आहार में अचानक परिवर्तन से बीमारी का खतरा न बढ़े। 
  • फसल कटाई के बाद पशुओं को लंबे समय तक खेतों में चरने न दें, ताकि वे अत्यधिक चारा न खा पाएं।
  • यदि किसी पशु का पेट फूला हुआ दिखाई दे, तो उसे 10- 20 ग्राम मीठा सोडा देना फायदेमंद हो सकता है। 
  • फड़किया रोग से बचाव के लिए साल में दो बार पशु का टीकाकरण कराना जरूरी है।
  • बरसात शुरू होने से पहले, तीन महीने से अधिक उम्र के सभी पशुओं को टीका अवश्य लगवाएं। 
  • पहली बार टीका लगवाने वाले पशुओं को 15 दिन के अंतराल पर बूस्टर खुराक देना चाहिए। 
  • टेट्रासाइक्लिन पाउडर का घोल दिन में 2 से 3 बार पिलाना भी रोग से बचाव के लिए मददगार है।
  • इसके अलावा, भेड़ों के झुंड को खुले मैदान में चरने के लिए ले जाने से पहले सूखा चारा जरूर खि‍ला दें। 

ध्यान देने वाली बात : (Something to pay attention to)

बारिश के दौरान भेड़-बकरियों में बहुत सारी बीमारी के जीवाणु (बैक्टीरिया) ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं। इनमें कुछ जीवाणुजनित बीमारी ऐसी हैं जिनका कोई इलाज नहीं है। इन बीमारियों के इलाज के नाम पर सिर्फ वैक्सीनेशन है। फड़किया (एन्टेरोटोक्सिमिया) भी एक ऐसी ही एक बीमारी है। अभी इस बीमारी का इलाज नहीं है, लेकिन समय से वैक्सीनेशन कराने से बीमारी की रोकथाम की जा सकती है। 

Website - TractorGuru.in
Instagram - TractorGuru Instagram Page
Facebook - TractorGuru Facebook Page

Check On Road Price

Name must be 3–50 letters, spaces allowed Name must be 3–50 letters, spaces allowed
Enter valid 10-digit mobile number starting with 6–9 Enter valid 10-digit mobile number starting with 6–9 Enter valid 10-digit mobile number starting with 6–9 Enter valid 10-digit mobile number starting with 6–9
Select a brand
Select a model
Select a state
Select a district
`