खीरे की खेती से कमाई कैसे करें : फरवरी-मार्च खीरा की खेती का सही समय
खीरे की खेती के बारे में जानकारी
ट्रैक्टरगुरु पर किसान भाइयों का एक बार फिर स्वागत है। आज हम बात करते हैं खीरे की उन्नत खेती की। किसान भाई जानते हैं कि फरवरी महीने से नकदी/जायद की फसलों की बुवाई का समय शुरू हो चुका है। इन फसलों की बुवाई मार्च तक चलेगी। खीरे की खेती पूरे भारत में की जाती है। यह एक अल्पकालीन समय में परिणाम देने वाली फसल है। आइये जानते है हाइब्रिड खीरा की खेती, खीरे की खेती से कमाई, खीरे की खेती का समय, हाइब्रिड खीरा का बीज, खीरा लगाने का सही समय, खीरे की आधुनिक खेती, खीरा की खेती कैसे करें और खीरे की खेती के बारे में जानकारी।
फरवरी-मार्च में खीरे की पैदावार शुरू कर कमाएं लाखों रुपए
इस फसल का समय चक्र 60 से 80 दिनों में पूरा होता है। वैसे तो खीरा गर्मी के मौसम में होता है। परंतु वर्षा ऋतु में खीरे की फसल अधिक होती है। फरवरी माह का दूसरा सप्ताह खीरे की बुवाई के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
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खीरे की उन्नत खेती के लिए जलवायु और समय
- खीरा गर्म मौसम की फसल है। खुले वातावरण में इसकी खेती फरवरी-मार्च से लेकर सितंबर तक की जा सकती है। खीरे की फसल के लिए शीतोषण और समशीतोषण दोनों ही जलवायु अच्छी मानी गई है। खीरे में फूल आने का समय 13 से 18 दिनों का होता है। इसके लिए 13 से 18 डिग्री सेल्सियस तापमान अच्छा होता है। वहीं पौधों के विकास और अच्छी पैदावार के लिए 18 से 24 डिग्री सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है। खीरे की फसल पर कोहरे का बुरा असर पड़ता है। इसके अलावा अधिक नमी में इसके फल पर धब्बे पड़ जाते हैं।
- ग्रीन/पॉली हाउस में खीरे की खेती सालभर की जा सकती है। इसके अंकुरण के लिए20 डिग्री सेल्सियस तापमान उपयुक्त रहता है। तथा पौधों की वृद्धि एवं विकास के लिए 22 डिग्री से 30 सेल्सियस तापमान अनुकूल रहता है। अपेक्षित आर्द्रता 70-80 प्रतिशत उपयुक्त रहती है।
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खीरे की भूमि तैयार करना/उत्तम मिट्टी
खीरे की खेती सभी प्रकार की मिट्टी में की जा सकमती है। लेकिन अच्छी पैदावार के लिए अच्छे जल निकास वाली दोमट एवं बलुई दोमट भूमि उत्तम मानी जाती है। खीरा की खेती के लिए भूमि का पी.एच. 5.5 से 6.8 तक अच्छा माना गया है। खीरे की फसल के लिए मैरा या कम रेतीली भूमि भी ठीक है। खीरे की खेती नदियों-तालाब के किनारे भी की जा सकती है। और इसमें पानी निकालने के लिए नाली बनाना चाहिए जिससे पानी इकट्ठा नहीं हो और फसल को नुकसान नहीं पहुंचे।
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खीरे की उन्नत खेती के लिए खेत की तैयारी
खीरे की फसल के लिए खेत में कोई खास तैयारी की आवश्यकता नहीं होती है। क्योंकि इसकी फसल के लिए खेत की तैयारी भूमि की किस्म के ऊपर निर्भर होती है। बलुई भूमि के लिए अधिक जुताई की आवश्यकता नहीं होती है। 2-3 जुताई से ही खेत तैयार हो जाता है। आखिरी जुताई में 200 से 250 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद मिलाकर नालियां बनानी चाहिए। जुताई के बाद खेत में पाटा लगाकर क्यारियां बना लेनी चाहिए। भारी-भूमि की तैयारी के लिए अधिक जुताई की आवश्यकता होती है। बगीचों के लिए भी यह फसल उपयोगी है जोकि आसानी से बुआई की जा सकती है।
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खीरे की उन्नत खेती में खेत की बिजाई
खीरे की फसल के लिए खेतों में बिजाई का सही समय फरवरी-मार्च है। प्रति हेक्टेयर में बुवाई के लिए 2 से 2.5 किग्रा बीज की आवश्यकता होती है। खीरे के पौधे फैलने वाले होते हैं। इसलिए अच्छी फसल के लिए बुवाई करते समय इनके बीजों की आपसी दूसरी कम से कम 50 से 100 सेमी होनी चाहिए। साथ ही बहुत सी क्यारियां होनी चाहिए। खीरे की खेती करते वक्त खेतों में पंक्ति बनाते समय एक से दूसरी पंक्ति की दूरी कम से कम 150 सेमी होनी चाहिए। खीरे के बीजों को बोते समय उन्हें एक सेमी की गहराई में बोना चाहिए। बिजाई करते समय कम से कम दो बीज अवश्य लगाने चाहिए।
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खीरे की उन्नत खेती में खरपतवार
खीरे के बीज की बुवाई के ठीक 20 से 25 दिन बाद जब पौधे बढ़े लगे तब निराई-गुडाई करने से पौधों की अच्छी बढ़वार होती है। सथ ही फल भी अच्छे और अधिक होते हैं। खेतों में इस समय जो अतिरिक्त पौधे खीरे के पौधों की बढ़वार को रोकते हैं उन्हें खेतों से उखाड़ फेंकना चाहिए।
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खीरे की उन्नत खेती की नर्सरी तैयार करना
सामान्यत: खीरे की सीधी बुवाई की जाती है परंतु पॉली हाउस में फसल सघनता बढ़ाने के लिए प्रो-ट्रे में पौधे तैयार किए जाते हैं। खीरे की पौध मौसम के अनुसार 12 से 15 दिन में तैयार हो जाती है। जब पौधों में बीजपत्रों के अलावा दो पत्तियां आ जाती है तब पौधा स्नानांतरण योग्य माना जाता है। क्यारियों की ऊंचाई 30 सेमी, चौड़ाई 1 मीटर एवं बाई पॉली हाउस के आकार के अनुसार रखी जाती है। 2 बेड के बीच में 60 सेमी पाथ रखा जाना चाहिए।
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बीज तैयार करने का वैज्ञानिक तरीका
खीरे की खेती के लिए नवंबर के महीने में प्लास्टिक के गिलास में मिट्टी भरकर बीज अंकुरित करने के लिए डालते हैं। दो माह बाद खेतों में रोपाई की जाती है। बीज तैयार करने का यह वैज्ञानिक तरीका भरपूर उत्पादन देता है। खीरे की खेती से अच्छी आमदनी के लिए किसान हाइब्रिड प्रजाति को प्रमुखता देते हैं। यूपी में धान की फसल कटने के बाद जनवरी के अंतिम सप्ताह में खीरे की खेती शुरू की जाती है। प्रति बीघा करीब दो लाख रुपए की कमाई एक सीजन में होती है। दो से ढाई महीने में खेत खाली हो जाता है। खीरे की पूरी फसल समाप्त होने के बाद खाली खेतों में किसान इस विधि से बोड़ा या करेला की खेती करते हैं। इससे भी किसानों को फायदा होता है।
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खीरे की खेती में खाद, उर्वरक एवं सिंचाई की आवश्यक बातें
किसान भाइयो खीरे की खेती में 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 12 किलोग्राम फास्फोरस व 10 किलोग्राम पोटाश की मात्रा खीरे के लिए पर्याप्त रहती है। खेत में बिजाई के समय 1/3 नाइट्रोजन, फास्फोरस की पूरी मात्रा तथा पोटाश की पूरी मात्रा डाल दें। बची हुई नाइट्रोजन को दो बार में बिजाई के एक महीने बाद व फूल आने पर खेत की नालियों में डालकर मिट्टी चढ़ा दें।
खीरे की उन्नत खेती में सिंचाई गर्मी की फसल में सिंचाई की जरुरत समय-समय पर पड़ती रहती है। इसके लिए 7-8 दिन के अंतराल में सिंचाई करते रहना चाहिए। बेलों पर फल लगते समय नमी का रहना बहुत जरूरी है। अगर खेत में नमी की कमी हो तो फल कड़वे भी हो सकते हैं। बरसात में ली जाने वाली फसल के लिए प्राय: सिंचाई की आवश्यकता कम ही पड़ती है। यदि वर्षा लंबे समय तक नहीं होती है तो अवश्य ही सिंचाई कर देनी चाहिए।
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खीरे की उन्नत किस्में
- विदेशी किस्में : जापानी लौंग ग्रीन, चयन, स्ट्रेट- 8 और पोइनसेट आदि प्रमुख है।
- भारतीय किस्में : स्वर्ण अगेती, स्वर्ण पूर्णिमा, पूसा उदय, पूना खीरा, पंजाब सलेक्शन, पूसा संयोग, पूसा बरखा, खीरा 90, कल्यानपुर हरा खीरा, कल्यानपुर मध्यम और खीरा 75 आदि प्रमुख है।
- संकर किस्में : पंत संकर खीरा- 1, प्रिया, हाइब्रिड- 1 और हाइब्रिड- 2 आदि प्रमुख है।
- नवीनतम किस्में : पीसीयूएच- 1, पूसा उदय, स्वर्ण पूर्णा और स्वर्ण शीतल आदि प्रमुख है।
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खीरे की खेती में रोग नियंत्रण
- विषाणु रोग : खीरे में विषाणु रोग एक आम रोग होता है। यह रोग पौधों के पत्तियों से शुरू होती है और इसका प्रभाव फलों पर पड़ता है। इस रोग में पत्तियों पर पीले धब्बों का निशान पड़ जाता है और धीरे-धीरे पत्तियां सिकुडऩे लगती है। इस बीमारी का असर फलों पर भी पड़ता है। फल छोटी और टेड़ी-मेड़ी हो जाती है। रोग को नीम का काढ़ा या गौमूत्र में माइक्रो झाइम को मिलाकर इसे 250 एमएल प्रति पंप फसलों पर छिडक़ाव करने से दूर किया जा सकता है।
- एन्थ्रेक्नोज : यह रोग मौसम में परिवर्तन के कारण होता है। इस रोग में फलों तथा पत्तियों पर धब्बे हो जाते हैं। इस रोग को नीम का काढ़ा या गौमूत्र में माइक्रो झाइम को मिलकाकर इसे 250 एमएल प्रति पंप फसलों पर छिड़वास करने से दूर किया जा सकता है।
- चूर्णिल असिता : यह रोग ऐरीसाइफी सिकोरेसिएरम नाम से एक फफूंदी के कारण होता है। यह रोग मुख्यत: पत्तियों पर होता है और यह धीरे-धीरे तना, फूल और फलों पर हमला करने लगता है। नीम का काढ़ा या गौमूत्र में माइक्रो झाइम को मिलाकर इसे 250 मिमी प्रति पंप फसलों पर छिडक़ाव करने से इस रोग को दूर किया जा सकता है।
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खीरे की खेती में कीट नियंत्रण
- एफिड : ये बहुत छोटे-छोटे कीट होते हैं। ये कीट पौधे के छोटे हिस्सों पर हमला करते हैं तथा उनसे रस चूसते हैं। इन कीटों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ती है और ये वायरस फैलाने का काम करती है। इन कीटों की वजह से पत्तियां पीली पडऩे लगती है। इस कीट से बचने के लिए नीम का काढ़ा या गौमूत्र में माइक्रो झाइम को मिलाकर इसे 250 एमएल प्रति पंप फसलों पर छिडक़ाव करें।
- रेड पम्पकिन बीटिल : ये लाल रंग तथा 5-8 सेमी लंबे आकार के कीट होते हैं। ये कीट पत्तियों के बीच वाले भाग को खा जाते हैं जिसके कारण पौधों का अच्छे से विकास नहीं होता है। इस कीट से बचने के लिए नीम का काढ़ा या गौमूत्र में माइक्रोझाइम को मिलकर इसे २५० एमएम प्रति पंप फसलों पर छिडक़ाव करें।
- एपिलैकना बीटिल : ये कीट इन सभी वाइन प्लांट पर हमला करते हैं। ये कीट पौधों के पत्तियों पर आक्रमण करती है। ये बीटिल पत्तियों को खाकर उन्हें नष्ट कर देती है।
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फलों की तुड़ाई
खीरे के फलों को कच्ची अवस्था में तोड़ लेना चाहिए जिससे बाजार में उनकी अच्छी कीमत मिल सके। फलों को एक दिन छोडक़र तोडऩा अच्छा रहता है। फलों को तेजधार वाले चाकू या थोड़ा घुमाकर तोडऩा चाहिए ताकि बेल को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचे। खीरे को तोड़ते समय ये नरम होने चाहिए, पीले फल नहीं होने देना चाहिए।
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