सरसों की अच्छी पैदावार के लिए सिर्फ सही समय पर बुवाई काफी नहीं है। खेत की तैयारी, मिट्टी के अनुसार खाद-उर्वरक, सही बीज दर, क्षेत्र के अनुकूल उन्नत किस्म और बुवाई की उचित विधि भी जरूरी है। सल्फर जैसे पोषक तत्व का संतुलित इस्तेमाल बीज और तेल उत्पादन के लिए उपयोगी माना जाता है।
अगर आप भी खरीफ फसलों के बाद खेत में सरसों बोने की सोच रहे हैं, तो यह जानकारी आपके काम आ सकती है। इसमें हम बुवाई का सही समय, खेत की तैयारी, बीज उपचार, खाद-उर्वरक और सल्फर से जुड़ी जरूरी बातें बता रहे हैं, जो अच्छी पैदावार और तेल की मात्रा बढ़ाने में मदद कर सकती हैं।
सरसों रबी सीजन की प्रमुख तिलहन फसलों में से एक है और इसकी अच्छी पैदावार के लिए मिट्टी में जरूरी पोषक तत्वों का होना जरूरी है। इसलिए किसान बुवाई से पहले अपने खेत की मिट्टी की जांच करा सकते हैं। इससे मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों और उनकी कमी की जानकारी मिलती है। इसके आधार पर खाद और उर्वरक की मात्रा तय करना आसान होता है और अनावश्यक उर्वरक खर्च से बचने में भी मदद मिल सकती है। ICAR भी सरसों में उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी जांच के आधार पर करने की सलाह देता है।
सही समय पर बुवाई करने से खेत की पर्याप्त नमी फसल की अच्छी शुरुआत में मदद कर सकती है। सरसों की बुवाई का समय क्षेत्र, किस्म और खेती की परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। आमतौर पर राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पश्चिम बंगाल और गुजरात समेत कई राज्यों में सितंबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर तक इसकी बुवाई की जाती है। ICAR की सामान्य रबी एडवाइजरी में अक्टूबर के पहले सप्ताह से बुवाई शुरू करके नवंबर के दूसरे सप्ताह तक पूरी करने का उल्लेख है। समय पर बुवाई से फसल को अनुकूल मौसम का फायदा मिलता है। देर से बुवाई की स्थिति में किसान अपने क्षेत्र के लिए सुझाई गई देर से बोई जाने वाली किस्म चुनें। बुवाई की मुख्य समय-सारिणी इस प्रकार है:
सरसों की अच्छी फसल के लिए खेत में उचित नमी और भुरभुरी मिट्टी जरूरी है। इसके लिए ये काम करें:
बुवाई के समय अच्छे अंकुरण के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी जरूरी है। ICAR की रबी फसल एडवाइजरी के अनुसार, नमी कम होने पर बुवाई से पहले सिंचाई की जा सकती है। इसके बाद खेत बुवाई लायक होने पर सरसों की बुवाई करें।
सिर्फ ज्यादा उपज के दावे देखकर बीज नहीं खरीदना चाहिए। किस्म का चुनाव अपने क्षेत्र, सिंचाई की उपलब्धता और बुवाई के समय के अनुसार करें। सही किस्म ज्यादा पैदावार का बुनियादी आधार होती है।
ICAR-DRMR अलग-अलग सरसों उत्पादक क्षेत्रों के लिए अलग किस्मों की सिफारिश करता है। समय पर बुवाई, देर से बुवाई, सिंचित और वर्षा आधारित परिस्थितियों के लिए अलग-अलग किस्में उपलब्ध हैं। ICAR-भारतीय रेपसीड-सरसों अनुसंधान संस्थान की ओर से विकसित और सुझाई गई किस्मों में DRMRIJ-31 (गिरिराज), NRCDR-601, NRCDR-2, DRMR 1165-40 और DRMR 150-35 शामिल हैं।
पायनियर 45S46, एडवांटा 414, पूसा बोल्ड, पूसा सरसों 28, आरएच 725 और श्रीराम 1666 जैसी किस्में भारत और खासतौर पर राजस्थान क्षेत्र में ज्यादा पैदावार देने वाली और लोकप्रिय हैं। ये किस्में अच्छी पैदावार और तेल की मात्रा के लिए जानी जाती हैं। इनकी पकने की अवधि लगभग 105 से 140 दिन है।
हालांकि, सभी किस्में हर राज्य और हर परिस्थिति के लिए उपयुक्त नहीं होतीं। इसलिए किसान अपने क्षेत्र के लिए सुझाई गई और प्रमाणित किस्म के बीज को ही प्राथमिकता दें।
सरसों में सही पौध संख्या बनाए रखने के लिए बीज दर और पौधों के बीच उचित दूरी जरूरी है। अलग-अलग कृषि सिफारिशों में सामान्य परिस्थितियों के लिए करीब 5 से 6 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज दर बताई गई है। इसके अनुसार:
वास्तविक बीज दर किस्म, बुवाई के समय, क्षेत्र और विधि के अनुसार बदल सकती है।
बीज उपचार फसल को शुरुआती अवस्था में कुछ बीज और मिट्टी जनित रोगों से बचाने में मदद कर सकता है। आईसीएआर की रबी एडवाइजरी में सरसों के बीज को बुवाई से पहले ट्राइकोडर्मा @ 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से उपचारित करने का उल्लेख है। उपचार के लिए इस्तेमाल होने वाला उत्पाद और उसकी मात्रा क्षेत्र और रोग की समस्या के अनुसार अलग हो सकती है। इसलिए संबंधित उत्पाद के लेबल और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह का पालन करें।
सरसों का बीज बहुत गहरा बोने से अंकुरण प्रभावित हो सकता है। ICAR की रबी एडवाइजरी में बुवाई 4 से 5 सेंटीमीटर की गहराई और करीब 30 सेंटीमीटर कतार दूरी पर करने का उल्लेख है। सही दूरी रखने से पौधों को बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिलती है और खेत में पौधों की उचित संख्या बनी रहती है। बहुत गहरी बुवाई या जरूरत से ज्यादा बीज डालने से पौधों की संख्या और शुरुआती बढ़वार प्रभावित हो सकती है।
लाइन में बुवाई करने से बेहतर पौध संख्या बनाए रखने में मदद मिलती है और बाद में निराई-गुड़ाई जैसे काम आसान होते हैं। इसके लिए सीड ड्रिल जैसे उपकरण का इस्तेमाल किया जा सकता है। ICAR की जानकारी के अनुसार, सीड ड्रिल से कतार में बुवाई करने पर बीज छिड़ककर (प्रसारण विधि से) बुवाई की तुलना में प्रति इकाई क्षेत्र बेहतर उत्पादन में मदद मिल सकती है।
अच्छी पैदावार के लिए ज्यादा खाद डालना ही समाधान नहीं है। पोषक तत्वों का संतुलित इस्तेमाल जरूरी है। ICAR की सिफारिशों में उर्वरक की मात्रा मिट्टी जांच और खेती की परिस्थितियों के आधार पर तय करने पर जोर दिया गया है। इसलिए किसान अपने खेत की मिट्टी जांच के आधार पर NPK, सल्फर, जिंक और बोरॉन जैसे पोषक तत्वों की जरूरत तय करें।
सरसों में सिर्फ NPK पर ध्यान देना काफी नहीं है। कुछ खेतों में सल्फर के साथ जिंक और बोरॉन की भी कमी हो सकती है। ICAR-DRMR के अनुसार, बोरॉन सरसों में फली और बीज बनने में अहम भूमिका निभाता है, जबकि जिंक का सही इस्तेमाल उपज बढ़ाने में मदद कर सकता है। लेकिन इन सूक्ष्म पोषक तत्वों को बिना जरूरत खेत में डालना सही नहीं है।
ICAR के अनुसार, सिंचित और समय पर बोई गई फसल में नाइट्रोजन की आधी मात्रा बेसल डोज के रूप में बुवाई के समय और बाकी आधी मात्रा बुवाई के करीब 30 से 45 दिन बाद, पहली सिंचाई के समय दी जा सकती है। वर्षा आधारित खेती में पोषक तत्वों की सिफारिश अलग हो सकती है। यह मात्रा और समय क्षेत्र और खेती की परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है। इसलिए अपने क्षेत्र की सुझाई गई उर्वरक मात्रा का पालन करें।
सरसों में तेल की मात्रा सिर्फ सल्फर डालने से तय नहीं होती। किस्म, मिट्टी की उर्वरता, बुवाई का समय, सिंचाई, पोषक तत्व प्रबंधन और मौसम जैसे कई कारक उपज और तेल की मात्रा को प्रभावित करते हैं। ICAR-DRMR की अलग-अलग किस्मों में भी तेल की मात्रा अलग-अलग दर्ज की गई है। इसलिए अच्छी तेल उपज के लिए क्षेत्र के अनुकूल किस्म और सही फसल प्रबंधन, दोनों जरूरी हैं।
ICAR-Indian Institute of Rapeseed-Mustard Research के शोध में बताया गया है कि कमी वाली मिट्टी में सल्फर और बोरॉन के उचित इस्तेमाल से बीज और तेल की उपज बढ़ सकती है। ICAR की एक कृषि सलाह में 20 किलोग्राम सल्फर और 1 किलोग्राम बोरॉन प्रति हेक्टेयर के इस्तेमाल को बीज की गुणवत्ता और तेल उत्पादन में सुधार से जोड़ा गया है। अन्य परिस्थितियों में 40 किलोग्राम सल्फर प्रति हेक्टेयर तक की सिफारिश भी दी गई है। इसलिए एक ही मात्रा को सभी खेतों पर लागू न करें। सल्फर और बोरॉन का इस्तेमाल मिट्टी जांच और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सिफारिश के अनुसार ही करें।
सही समय पर बुवाई, क्षेत्र के अनुकूल किस्म, संतुलित पोषण और कीट-रोग प्रबंधन पर भी ध्यान देना जरूरी है। माहू जैसे कीट का ज्यादा प्रकोप सरसों की पैदावार के साथ तेल की मात्रा को भी प्रभावित कर सकता है।
सरसों की बेहतर पैदावार के लिए किसान शुरुआत से ही इन बातों पर ध्यान दें:
सल्फर की कमी वाली मिट्टी में इसकी सही मात्रा सरसों की बीज उपज और तेल की मात्रा बेहतर करने में मदद कर सकती है। लेकिन खाद और सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा सभी खेतों के लिए एक जैसी नहीं होती। सरसों की किस्म, बीज दर और उर्वरक की मात्रा भी हर राज्य और कृषि-जलवायु क्षेत्र में अलग हो सकती है। इसलिए अंतिम फैसला अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विभाग या कृषि विश्वविद्यालय की स्थानीय सिफारिशों के अनुसार करें।
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