देश में किसानों की आमदनी बढ़ाने और खेती के साथ बिजली उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार एग्रीवोल्टाइक तकनीक पर जोर दे रही है। इस तकनीक के जरिए किसान एक ही खेत में फसल उगाने के साथ सौर ऊर्जा का उत्पादन भी कर सकेंगे। इससे खेती की जमीन का बेहतर इस्तेमाल होगा और किसानों को अतिरिक्त कमाई का अवसर मिल सकता है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने हाल ही में नई दिल्ली के भारत मंडपम में सातवें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस का उद्घाटन करते हुए इसे किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण विकल्प बताया।
एग्रीवोल्टाइक खेती की ऐसी व्यवस्था है, जिसमें एक ही जमीन पर कृषि और सौर ऊर्जा उत्पादन साथ-साथ किया जाता है। इसके तहत खेत में जमीन से पर्याप्त ऊंचाई पर सोलर पैनल लगाए जाते हैं और उनके नीचे फसल उगाई जाती है। इस तरह किसान अनाज, सब्जियों या अन्य उपयुक्त फसलों की खेती जारी रखते हुए बिजली उत्पादन से भी आय हासिल कर सकते हैं। हालांकि, इस तकनीक का लाभ फसल, मिट्टी, मौसम और सोलर पैनलों की बनावट पर निर्भर करता है। इसलिए पैनलों की ऊंचाई, खंभों के बीच दूरी और कृषि मशीनों की आवाजाही को ध्यान में रखकर परियोजना तैयार करना जरूरी है। केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि किसान केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि ऊर्जादाता भी बन सकते हैं। यानी वे खाद्यान्न उत्पादन के साथ देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में भी योगदान दे सकते हैं।
भारत में 85 प्रतिशत से अधिक किसान छोटे और सीमांत श्रेणी में आते हैं। ऐसे किसानों के पास खेती के लिए सीमित जमीन होती है। इसे ध्यान में रखते हुए एग्रीवोल्टाइक तकनीक से जुड़ी नीति में छोटे किसानों की जरूरतों को प्राथमिकता देने पर जोर दिया गया है। शिवराज सिंह चौहान के अनुसार, ऐसा मॉडल विकसित करना जरूरी है, जिसे छोटे किसान भी आसानी से अपना सकें। सोलर पैनल लगाने के कारण खेती प्रभावित नहीं होनी चाहिए। खेत में ट्रैक्टर और दूसरे कृषि उपकरणों की आवाजाही बनी रहे, ताकि किसान अपनी जरूरत के मुताबिक फसल और फसल चक्र में बदलाव कर सकें।
एग्रीवोल्टाइक परियोजनाओं में सोलर पैनल लगाने के साथ पानी की निकासी और बारिश के पानी के उचित इस्तेमाल की व्यवस्था भी जरूरी है। पैनलों से गिरने वाला पानी मिट्टी का कटाव न बढ़ाए और खेत की उर्वरता प्रभावित न हो, इसके लिए सही प्रबंधन करना होगा। इसके अलावा, किसानों को उत्पादित बिजली बेचने और उसका भुगतान पाने में परेशानी नहीं होनी चाहिए। बिजली खरीदने वाली कंपनियों और ग्रिड से जुड़ी व्यवस्था पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि किसानों को उनकी बिजली का भुगतान समय पर मिल सके।
एग्रीवोल्टाइक तकनीक से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होने की संभावना है। सोलर पैनलों के संचालन, मरम्मत और रखरखाव के लिए प्रशिक्षित लोगों की जरूरत होगी। ऐसे में किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को इस काम से जोड़ने और ग्रामीण युवाओं तथा महिलाओं को प्रशिक्षण देने का सुझाव दिया गया है। परियोजनाओं से जुड़ी कंपनियों की जिम्मेदारी भी पहले से तय करना जरूरी है। यदि कोई कंपनी बीच में काम छोड़ती है या अनुबंध खत्म होने पर पैनल हटाने पड़ते हैं, तो इसका आर्थिक बोझ किसान पर नहीं पड़ना चाहिए।
केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने सम्मेलन में बताया कि वर्ष 2014 से पहले देश की कुल बिजली उत्पादन क्षमता करीब 249 गीगावाट थी, जो अब 560 गीगावाट से अधिक हो गई है। गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों की स्थापित क्षमता भी 308 गीगावाट से ज्यादा हो चुकी है। उन्होंने टेरी के एक अध्ययन का हवाला देते हुए कहा कि देश की 11.6 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि में से करीब 4.75 करोड़ हेक्टेयर जमीन एग्रीवोल्टाइक तकनीक के लिए तकनीकी रूप से उपयुक्त है। इसमें महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश की बड़ी हिस्सेदारी है। यदि इस उपयुक्त जमीन के केवल 10 प्रतिशत हिस्से पर भी एग्रीवोल्टाइक परियोजनाएं स्थापित की जाती हैं, तो वर्ष 2050 तक देश की अनुमानित बिजली मांग पूरी करने में महत्वपूर्ण मदद मिल सकती है। कुछ अध्ययनों में इस व्यवस्था के तहत फसलों की पैदावार में 10 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी भी दर्ज की गई है, हालांकि वास्तविक परिणाम परिस्थितियों पर निर्भर करेंगे।
प्रह्लाद जोशी ने बताया कि पीएम कुसुम योजना के तहत अब तक 30 लाख कृषि पंपों को सौर ऊर्जा से जोड़ने की जानकारी दी गई है। सरकार योजना के अगले चरण में बड़े स्तर पर एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी कर रही है। इससे करीब 3.32 लाख पूर्णकालिक स्थानीय रोजगार पैदा होने की संभावना जताई गई है। कृषि और ऊर्जा मंत्रालय मिलकर इस तकनीक को आगे बढ़ाने के लिए काम करेंगे। इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि खेती प्रभावित हुए बिना बिजली उत्पादन कितना संभव होता है, किसानों को बिजली का उचित मूल्य मिलता है या नहीं और छोटे किसानों के लिए यह व्यवस्था कितनी किफायती बनती है।
उत्तर: एग्रीवोल्टाइक तकनीक में एक ही खेत में सोलर पैनल लगाकर बिजली बनाई जाती है और उनके नीचे फसलों की खेती भी की जाती है।
किसान फसल बेचकर कमाई करने के साथ सौर ऊर्जा उत्पादन और बिजली की बिक्री से भी अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकते हैं।
उत्तर: हां, छोटे और सीमांत किसानों के लिए भी उपयुक्त मॉडल विकसित किए जा सकते हैं। हालांकि, इसकी लागत, जमीन की उपलब्धता और परियोजना की शर्तों पर ध्यान देना जरूरी है।
उत्तर: सोलर पैनलों की ऊंचाई, दूरी, फसल और मौसम के अनुसार इसका असर अलग-अलग हो सकता है। सही योजना से खेती जारी रखी जा सकती है, लेकिन फसल का चयन और खेत में मशीनों की आवाजाही महत्वपूर्ण है।
उत्तर: केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रह्लाद जोशी ने पीएम कुसुम योजना के अगले चरण में बड़े स्तर पर एग्रीवोल्टाइक कार्यक्रम शुरू करने की तैयारी की जानकारी दी है। योजना के लाभ और पात्रता संबंधी अंतिम दिशा-निर्देशों के लिए सरकारी घोषणा का इंतजार करना चाहिए।
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