अक्टूबर में कम पानी में बोएं ये 5 फसलें, जानें MSP और बुवाई का सही समय
रबी सीजन खेती: कम पानी में अक्टूबर में बोई जाने वाली वैकल्पिक फसल और खेती की पूरी जानकारी
इस साल कमजोर मानसून और कई क्षेत्रों में औसत से कम बारिश ने रबी सीजन की तैयारी कर रहे किसानों की चिंता बढ़ा दी है। खासकर बारानी (वर्षा आधारित) खेती वाले क्षेत्रों में खेत की नमी कम होने से गेहूं जैसी ज्यादा सिंचाई मांगने वाली फसलों की बुवाई में मुश्किल हो सकती है। सिंचाई वाले क्षेत्रों में भी जलस्रोतों में पानी सीमित होने पर किसानों को ऐसी रबी फसलें चाहिए, जो उपलब्ध नमी का बेहतर उपयोग कर सकें। ऐसे में सवाल है कि कम पानी में अक्टूबर में कौन-सी फसल बोई जा सकती है।
इस लेख में हम जानेंगे कि नमी कम होने पर अक्टूबर में कौन-सी 5 फसलें बोई जा सकती हैं, बुवाई का सही समय क्या है, खेत और बीज की तैयारी कैसे करें और सिंचाई में किन बातों का ध्यान रखें।
कम पानी में इन 5 रबी फसलों पर कर सकते हैं विचार
रबी सीजन में किसान अक्सर गेहूं, चना, सरसों, जौ, मसूर और दूसरी फसलों की खेती करते हैं। लेकिन सभी फसलों की पानी की जरूरत एक जैसी नहीं होती। खेत में नमी और सिंचाई का पानी सीमित हो, तो फसल चुनते समय उसकी पानी की जरूरत के साथ मिट्टी, स्थानीय जलवायु और बाजार को भी ध्यान में रखना चाहिए।
2026 के कमजोर मानसून को देखते हुए किसान कम पानी वाली दलहन और तिलहन फसलों पर भी ध्यान दे रहे हैं। ICAR ऐसे क्षेत्रों में चना, मसूर और सरसों जैसी फसलों को उपलब्ध नमी के अनुसार चुनने की सलाह दे रहा है।
| फसल | अक्टूबर में बुवाई | फसल की खासियत |
|---|---|---|
| चना | कई बारानी क्षेत्रों में अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा, सिंचित हालात में नवंबर मध्य तक | बारानी या कम पानी वाली खेती का प्रमुख विकल्प |
| सरसों | क्षेत्र के अनुसार अक्टूबर के पहले सप्ताह से नवंबर के दूसरे सप्ताह तक | प्रमुख रबी तिलहन फसल |
| मसूर | कई क्षेत्रों में अक्टूबर के पहले सप्ताह से मध्य नवंबर तक | सीमित नमी या बिना सिंचाई वाले क्षेत्रों का विकल्प |
| जौ | कुछ क्षेत्रों में अक्टूबर के अंत से नवंबर के अंत तक | प्रतिकूल परिस्थितियों में गेहूं का विकल्प |
| कुसुम | कई उत्पादक क्षेत्रों में अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर के पहले सप्ताह तक | शुष्क और असिंचित क्षेत्रों की तिलहन फसल |
ध्यान दें: बुवाई का समय पूरे देश में एक जैसा नहीं होता। इसलिए राज्य, कृषि-जलवायु क्षेत्र, किस्म और सिंचित/असिंचित स्थिति के अनुसार स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) की सिफारिश को प्राथमिकता दें।
1. चना: बारानी खेती के लिए प्रमुख रबी फसल
खेत में नमी सीमित हो, तो चना किसानों के प्रमुख विकल्पों में शामिल हो सकता है। देश के बड़े हिस्से में इसकी खेती बारानी परिस्थितियों में भी की जाती है। ICAR की कृषि जानकारी के अनुसार, उत्तर-पश्चिमी और उत्तर-पूर्वी मैदानी क्षेत्रों में बारानी परिस्थितियों में चने की बुवाई के लिए अक्टूबर का दूसरा पखवाड़ा उपयुक्त माना गया है। सिंचित परिस्थितियों में बुवाई नवंबर के पहले पखवाड़े तक की जा सकती है।
चने की खेती में इन बातों का ध्यान रखें:
- खेत में जल निकासी अच्छी होनी चाहिए।
- बुवाई के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी जरूरी है।
- बारानी क्षेत्र में उपलब्ध नमी के अनुसार बुवाई का समय तय करें।
- क्षेत्र के लिए सुझाई गई और प्रमाणित किस्म चुनें।
- प्रमुख किस्मों में पूसा मानव 2021, दफ्तरी 21, जेजी 18 और विशाल शामिल हैं।
- बीज उपचार करके बुवाई करना बेहतर रहता है।
- जुताई करके बड़े ढेले तोड़ें और खेत को समतल करें।
- जरूरत से ज्यादा सिंचाई से बचें। फसल की अवस्था और मिट्टी देखकर पानी दें।
चना दलहनी फसल है, इसलिए रबी सीजन में इसे गेहूं के विकल्प के रूप में भी देखा जा सकता है। हालांकि, इसकी उपयुक्तता मिट्टी और स्थानीय मौसम पर निर्भर करेगी।
2. सरसों: सीमित सिंचाई में तिलहन फसल का विकल्प
सरसों रबी सीजन की प्रमुख तिलहन फसल है। कई प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में इसकी बुवाई अक्टूबर में की जाती है। राजस्थान जैसे बड़े उत्पादक राज्य में 5 से 20 अक्टूबर का समय उपयुक्त बताया गया है। वहीं, ICAR के एक अध्ययन में 30 अक्टूबर को बोई गई सरसों में पानी के बेहतर उपयोग से जुड़े सकारात्मक नतीजे मिले।
सरसों की खेती में ये ध्यान रखें:
- खेत की स्थिति के अनुसार जुताई करके मिट्टी को भुरभुरी बनाएं।
- बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी रहनी चाहिए।
- क्षेत्र के अनुसार समय पर पकने वाली उपयुक्त किस्म चुनें।
- बीज ज्यादा गहराई में न बोएं।
- बुवाई से पहले प्रति किलोग्राम बीज में 2 ग्राम कार्बेंडाजिम (बाविस्टिन) से सूखा बीज उपचार करें।
- सल्फर सहित पोषक तत्वों का इस्तेमाल मिट्टी जांच के अनुसार करें।
- पानी सीमित हो, तो फसल की महत्वपूर्ण अवस्थाओं को प्राथमिकता दें।
- बुवाई के तीसरे सप्ताह के बाद नियमित अंतराल पर निराई-गुड़ाई करें।
सरसों को सिर्फ "कम पानी वाली फसल" मानकर नहीं बोना चाहिए। मिट्टी में शुरुआती नमी पर्याप्त न हो, तो अंकुरण प्रभावित हो सकता है।
3. मसूर: कम नमी वाले क्षेत्रों में उपयोगी दलहन विकल्प
सीमित नमी या कम सिंचाई साधनों वाले रबी क्षेत्रों में मसूर भी किसानों के लिए विकल्प हो सकती है। भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान के अनुसार, मध्य क्षेत्र में जहां नमी प्रमुख बाधा है या सिंचाई के साधन कम हैं, वहां मध्य अक्टूबर के आसपास अगेती बुवाई उपयोगी हो सकती है।
मसूर की खेती में इन बातों का ध्यान रखें:
- खेत में पानी जमा नहीं होना चाहिए।
- खरीफ फसलों की कटाई के बाद खेत में बची नमी का उपयोग करते हुए समय पर बुवाई करें।
- स्थानीय जलवायु के लिए सुझाई गई उन्नत किस्म चुनें।
- बीज उपचार और उचित बीज दर अपनाएं।
- जरूरत के अनुसार ही सिंचाई करें।
धान उत्पादक क्षेत्रों में फसल कटने के बाद मिट्टी में बची नमी का इस्तेमाल करके भी कुछ जगहों पर मसूर की खेती की जाती है। इसलिए कम सिंचाई उपलब्ध होने पर यह फसल किसानों के लिए उपयोगी विकल्प बन सकती है।
4. जौ: कम पानी की स्थिति में गेहूं का विकल्प
जौ की खेती (Barley Farming) रबी सीजन में किसानों के लिए एक और विकल्प है। इसका उपयोग खाद्यान्न के अलावा पशु आहार और माल्ट उद्योग में भी होता है। इसकी खेती में गेहूं की तुलना में कम पानी की जरूरत होती है।
जौ को प्रतिकूल परिस्थितियां सहने वाली रबी फसलों में गिना जाता है। इसलिए जहां गेहूं के लिए पर्याप्त सिंचाई उपलब्ध नहीं है, वहां मिट्टी, क्षेत्र और बाजार की स्थिति के अनुसार जौ की खेती पर विचार किया जा सकता है।
जौ की खेती के लिए जरूरी बातें:
- क्षेत्र के अनुसार सही किस्म चुनें और प्रमाणित बीज का इस्तेमाल करें।
- बीज दर प्रति एकड़ 35 से 45 किलो रखें।
- खेत में उचित जल निकासी रखें और बुवाई के लिए शुरुआती नमी पर्याप्त रखें।
- प्रति किलोग्राम बीज को 2 ग्राम बिटावैक्स या कार्बेंडाजिम से उपचारित करें।
- बुवाई ट्रैक्टर से चलने वाली सीड ड्रिल या पलेवा विधि से करें।
- खेत तैयार करते समय कम्पोस्ट, कार्बनिक खाद या अच्छी सड़ी गोबर की खाद डालें।
- रासायनिक उर्वरक की मात्रा मिट्टी जांच के आधार पर तय करें।
- सिंचाई उपलब्ध हो, तो महत्वपूर्ण फसल अवस्थाओं को प्राथमिकता दें।
ICAR-भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए जौ की उन्नत किस्मों और उत्पादन तकनीक की जानकारी देता है।
5. कुसुम: शुष्क क्षेत्रों के लिए तिलहन फसल का विकल्प
कुसुम की खेती (Safflower Farming) अपेक्षाकृत शुष्क परिस्थितियों में उगाई जाने वाली महत्वपूर्ण तिलहन फसलों में शामिल है। इसकी गहरी जड़ें मिट्टी की निचली परत में मौजूद नमी का उपयोग करने में मदद करती हैं। इसलिए सीमित पानी वाले कुछ क्षेत्रों में किसान कुसुम पर विचार कर सकते हैं।
उत्तरी कर्नाटक में ICAR से जुड़े एक अध्ययन में अक्टूबर के दौरान कुसुम की बुवाई का परीक्षण किया गया। इसमें अक्टूबर के पहले पखवाड़े की बुवाई ने बेहतर नतीजे दिए। हालांकि, बुवाई का सही समय क्षेत्र की परिस्थितियों के अनुसार अलग होगा।
कुसुम की खेती में क्या देखें:
- बुवाई से पहले खेत अच्छी तरह तैयार करें और जल निकासी अच्छी रखें।
- क्षेत्र के लिए सुझाई गई किस्म चुनें।
- उपलब्ध नमी को ध्यान में रखकर बुवाई करें।
- कतार से कतार की दूरी लगभग 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 25 सेंटीमीटर रखें।
- बीज 3 से 4 सेंटीमीटर गहराई में बोना सही रहता है।
- एक हेक्टेयर खेत के लिए लगभग 15 से 20 किलो बीज पर्याप्त होता है।
- प्रति किलो बीज को कैप्टान, थीरम या मैंकोजेब की 3 ग्राम मात्रा से उपचारित करें।
- नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की मात्रा मिट्टी जांच के अनुसार तय करें।
- जरूरत और उपलब्ध पानी के अनुसार सिंचाई करें।
चना, सरसों, मसूर, जौ और कुसुम का 2027-28 का नया MSP कितना है?
अक्टूबर 2026 में बोई जा रही रबी फसलों के लिए सरकार ने मार्केटिंग सीजन 2027-28 का एमएसपी घोषित कर दिया है। इनमें कुसुम के MSP में सबसे ज्यादा 675 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है। इसके बाद रेपसीड और सरसों के MSP में 413 रुपए प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है।
| फसल | MSP RMS 2026-27 (₹/क्विंटल) | MSP 2027-28 (₹/क्विंटल) | बढ़ोतरी (₹/क्विंटल) |
|---|---|---|---|
| चना | 5,875 | 5,958 | 83 |
| सरसों | 6,200 | 6,613 | 413 |
| मसूर | 7,000 | 7,390 | 390 |
| जौ | 2,150 | 2,286 | 136 |
| कुसुम | 6,540 | 7,215 | 675 |
सरकार ने मसूर, जौ, चना और गेहूं के MSP में क्रमशः 390, 136, 83 और 25 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) बाजार सुरक्षा का संभावित संकेत है, लेकिन खेती से असली कमाई उपज, उत्पादन लागत, स्थानीय मंडी भाव, गुणवत्ता और खरीद व्यवस्था पर निर्भर करेगी। इसलिए सिर्फ MSP देखकर फसल का चुनाव न करें।
नमी कम हो, तो फसल चुनने से पहले इन 5 बातों को जरूर देखें
- मिट्टी में उपलब्ध नमी: देखें कि बुवाई और शुरुआती अंकुरण के लिए खेत में पर्याप्त नमी है या नहीं। कम पानी वाली फसल का मतलब बिना नमी के फसल लेना नहीं है।
- सिंचाई की उपलब्धता: आकलन करें कि पूरे रबी सीजन में कितनी सिंचाई मिल सकती है। उसी के अनुसार फसल और उन्नत किस्म चुनें।
- बुवाई का समय: अक्टूबर में हर फसल और हर क्षेत्र के लिए बुवाई की अवधि एक जैसी नहीं होती। बहुत देर या बहुत जल्दी बुवाई से उपज प्रभावित हो सकती है।
- मिट्टी और क्षेत्र के अनुसार किस्म: बारानी खेती के लिए क्षेत्र में सुझाई गई कम अवधि या सूखा सहने वाली किस्मों को प्राथमिकता दी जा सकती है।
- बाजार और लागत: कम पानी की जरूरत के साथ यह भी देखें कि आपके क्षेत्र में फसल कहां बिकेगी और संभावित उत्पादन लागत कितनी होगी।
कम पानी में कौन-सी फसल सबसे बेहतर?
अगर खेत में बची नमी अच्छी है और दलहन के लिए परिस्थितियां अनुकूल हैं, तो चना या मसूर पर विचार किया जा सकता है। तिलहन के लिए सरसों या कुसुम विकल्प चयन कर सकते हैं। स्थानीय परिस्थितियों और बाजार के अनुसार जौ भी रबी सीजन में एक बेहतर विकल्प बन सकता है।
इनमें से कई फसलों की बुवाई अक्टूबर से शुरू हो जाती है, लेकिन सही समय राज्य और कृषि-जलवायु क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग है। इसलिए कम पानी देखकर जल्दबाजी में फसल चुनने के बजाय मिट्टी की नमी, उपलब्ध सिंचाई, सही किस्म, बुवाई का समय, उत्पादन लागत और स्थानीय बाजार, इन सभी का आकलन करके फैसला करें।
अपने क्षेत्र के लिए सही किस्म और बुवाई का समय जानने के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), कृषि विश्वविद्यालय या राज्य कृषि विभाग की सलाह लेना उपयोगी रहेगा।
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