अनार की खेती : अनार की बागवानी से हर साल कमाएं लाखों रुपए

पोस्ट -02 जून 2022 शेयर पोस्ट

जानें, कैसे करें अनार की खेती, किस महीने में लगाएं अनार के पौधे

अनार उपोष्ण जलवायु का पौधा है। यह दुनिया के गर्म प्रदेशों में पाया जाता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से यह एक महत्त्वपूर्ण फल है। भारत में अनार के पेड़ अधिकतर महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और गुजरात में पाए जाते हैं। भारत में अनार को कई नामों में जाना जाता है। बांग्ला भाषा में अनार को बेदाना कहते हैं, हिन्दी में अनार, संस्कृत में दाडिम और तमिल में मादुलई कहा जाता है। भारत में अनार की खेती मुख्य तौर पर महाराष्ट्र में की जाती है। भारत में अनार का क्षेत्रफल 113.2 हजार हेक्टेयर, उत्पादन 745 हजार मैट्रिक टन एवं उत्पादकता 6.60 मैट्रिक टन प्रति हेक्टेयर है। इसके फलों में रस की मात्रा अधिक पाई जाती है, इसका रस स्वादिष्ट तथा औषधीय गुणों से भरपूर होता है। अनार एक बहुत ही उपयोगी फल है, जिसमे कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, प्रोटीन और विटामिन की मात्रा सबसे अधिक पाई जाती है। अनार का सेवन मानव शरीर के लिए काफी लाभदायक होता है, यह मनुष्य के शरीर में अधिक तेजी से रक्त की मात्रा को बढ़ाता है। इसके बीज और छिलको का इस्तेमाल आयुर्वेदिक दवाईयो को बनाने में भी किया जाता है। इस कारण भारतीय बाजारों से लेकर विदेशी बाजारों में अनार की मांग हमेशा अधिक रहती है। अनार का पूर्ण विकसित पौधा 15 से 20 वर्षो तक पैदावार देता है, जिससे किसान भाई अनार की खेती कर अधिक लाभ कमा सकते हैं। यदि आप भी अनार की खेती करने का मन बना रहे हैं, तो आज की ट्रैक्टरगुरु की इस पोस्ट में आपको अनार की खेती कैसे करे तथा अनार की खेती से होने वाली कमाई के बारे में जानकारी दी जा रही है। 

अनार में पाये जाने वाले पोषक तत्व

अनार का रस स्वादिष्ट तथा औषधीय गुणों से भरपूर होता है। अनार में प्रचुर मात्रा में लाभदायक प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, विटामिन और खनिज पाए जाते हैं। 100 ग्राम अनार दाने खाने पर हमारे शरीर को लगभग 65 किलो कैलोरी ऊर्जा मिलती है। अनार के बीज और छिलको का इस्तेमाल कई आयुर्वेदिक दवा बनाने में भी किया जाता है। इसके बीजों से निकले तेल का प्रयोग औद्योगिक क्षेत्र में किया जाता है। इस पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि अनार रक्तसंचार वाली बीमारियों से लड़ता है, उच्च रक्तचाप को घटाता है, सूजन और जलन में राहत पहुँचाता है, गठिया और वात रोग की संभावना घटाता और जोड़ों में दर्द कम करता है, कैंसर की रोकथाम में सहायक बनता है, शरीर के बुढ़ाने की गति धीमी करता है और महिलाओं में मातृत्व की संभावना और पुरुषों में पुंसत्व बढ़ाता है। अनार को त्वचा के कैंसर, स्तन-कैंसर, प्रोस्टेट ग्रंथि के कैंसर और पेट में अल्सर की संभावना घटाने की दृष्टि से भी विशेष उपयोगी पाया गया है। अनार की डाली से बनी हुई कलम पूजा-उपासना और तांत्रिक प्रयोगों में भी इस्तेमाल की जाती है। 

अनार के बारें मे सामान्य जानकारी 

अनार का वानस्पतिक नाम-प्यूनिका ग्रेनेटम है, यह एक फल हैं, यह लाल रंग का होता है। स्वास्थ्य की दृष्टि से यह एक महत्त्वपूर्ण फल है, जो कई सारी बीमारियों से शरीर का बचाव करता है। अनार के फल में प्रोटीन, आयरन, विटामिन ए, विटामिन सी, विटामिन ई, विटामिन के, पोटैशियम, थाइमिन जैसे तत्व पाये जाते हैं। इस फल में फाइबर्स भी मौजूद होते है। अनार एक मीठा फल है। अनार के फल में लाल रंग के दाने होते हैं। ये दाने एक लाल रंग के छिलके से कवर होते हैं। इन दानों को सीधे ही सेवन कर सकते हैं।। सलाद के रूप में अनार को खाया जाता है। अनार का ज्यूस के रूप में भी सेवन करना लाभदायक है। अनार का ज्यूस पीने से सेहत अच्छी रहती है।

अनार का पौधा कितने साल में फल देना शुरू कर देता है?

पौधा रोपण के बाद अनार के पौधे को पूर्ण विकसित होने में 2 से 3 साल का समय लगता है। अनार का पौधा 2 से 3 साल में पेड़ बन जाता है और फल देना शुरू कर देता है। अनार के पौधों में फल सेट होने के बाद अनार के फल 5 से 7 महीनों में पककर तैयार हो जाते हैं। सामान्य भाषा में बोला जाये तो 130 से 150 दिनों के बाद तुड़ाई के तैयार हो जाते हैं। पके फल पीलापन लिए लाल हो जाते हैं। अच्छी तरह से विकसित पौधा 15 से 20 किलोग्राम फल हर साल 25-30 सालों तक देता रहता है। एक हेक्टेयर के खेत में तकरीबन 600 से अधिक पेड़ों को लगाया जा सकता है। अनार के एक हेक्टेयर के खेत से 90 से 120 क्विंटल की पैदावार प्राप्त हो जाती है, जिससे किसान भाई अनार की एक बार की फसल से 5 से 7 लाख रूपये सालाना आमदनी प्राप्त कर सकते हैं। 

अनार की खेती सबसे ज्यादा कहां होती हैं?

आप सभी जानते है कि स्वास्थ्य की दृष्टि से अनार एक महत्त्वपूर्ण फल है, जो कई सारी बीमारियों से शरीर का बचाव करता है। अनार की खेती फल के रूप में की जाती है। अनार का सेवन मानव शरीर के लिए काफी लाभदायक होता है, यह मनुष्य के शरीर में अधिक तेजी से रक्त की मात्रा को बढ़ाता है, जिस वजह से बाजारो में अनार की मांग अधिक रहती है।  इसकी खेती से किसान अच्छी कमाई कर सकते हैं। देश में अनार का क्षेत्रफल 276000 हेक्टेयर, उत्पादन 3103000 मीट्रिक टन है। भारत में अनार की खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र के पुणे, अहमदनगर, पुणे, सांगली, सोलापुर और वाशिम में होती है।

अनार की किस्म

अनार की सबसे अच्छी किस्म सिन्दूरी अनार है। अनार की अन्य किस्मो की बजाए सिन्दूरी अनार टिकाऊ, स्वादिष्ट व निर्यात योग्य होते हैं। सिंदूरी अनार की खेती में एक पेड़ से लगभग 100 किलो से अधिक फल मिल सकते हैं। इस तरह देखा जाए तो एक हेक्टयर से 8 से 10 लाख रुपए सालाना कमाई हो सकती है। सिन्दूरी अनार की किस्म मूलतः महाराष्ट्र इलाके की है। कम समय में अगर आप भी अच्छा मुनाफा कमाना चाहते हैं, तो सिंदूरी अनार की खेती आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकती हैं। इसकी खेती कर किसान लाखों का मुनाफा कमा रहे हैं। सिन्दूरी अनार का पौधा तीन वर्ष में उपज देना शुरू कर देता है। इसके अलावा अनार की कई अन्य उन्नत  किस्में जैसे ढोलका जालोर बेदाना, ज्योति पेपर सेल, अरक्ता कंधारी, रूबी मृदुला, भगवा गणेश, फूले अरक्ता इत्यादि पाई जाती हैं, जिन्हें आप अपने क्षेत्र के अनुसार इसका खेती के लिए चयन कर सकते है एवं अच्छी कमाई कर सकते हैं।

अनार की खेती के लिए पौध तैयार कैसे करें? 

अनार के पौधों की रोपाई पौध के रूप में की जाती है, इसके लिए अनार के बीजों से नर्सरी में पौधों को तैयार किया जाता है। इसके पौधों को कलम विधि द्वारा तैयार करना अच्छा माना जाता है, कलम द्वारा तैयार पौधा तीन वर्ष में पैदावार देना आरम्भ कर देता है। इसकी कलमों को कई विधि द्वारा तैयार किया जा सकता है। 

  • गूटी विधि द्वारा : अनार का व्यावसायिक पौधा गूटी द्वारा तैयार किया जाता है। इस विधि में जुलाई-अगस्त में एक वर्ष पुरानी पेन्सिल समान मोटाई वाली स्वस्थ, ओजस्वी, परिपक्व, 45 से 60 से.मी. लम्बाई की शाखा का चयन करें। चुनी गई शाखा से कलिका के नीचे 3 से.मी. चौड़ी गोलाई में छाल पूर्णरूप से अलग कर दें। छाल निकाली गई शाखा के ऊपरी भाग में आई. बी.ए. 10,000 पी.पी.एम. का लेप लगाकर नमी युक्त स्फेगनम मास चारों और लगाकर पॉलीथीन शीट से ढ़ँककर रस्सी से बाँध दें। जब पालीथीन से जड़े दिखाई देने लगें उस समय शाखा को स्केटियर से काटकर क्यारी या गमलो में लगा दें। 

  • कलम द्वारा : एक वर्ष पुरानी शाखाओं से 20-30 से.मी. लम्बी कलमें काटकर पौधशाला में लगा दी जाती है। इन्डोल ब्यूटारिक अम्ल (आई.बी.ए.) 3000 पी.पी.एम. से कलमों को उपचारित करने से जड़े शीघ्र एवं अधिक संख्या में निकलती हैं।

तैयार खेत में अनार के पौधों की रोपाई

अनार के पौधों की रोपाई पौध के रूप में की जाती हैं। पौधों की रोपाई के लिए बारिश का मौसम सबसे अच्छा माना जाता है। अनार की बुवाई अगस्त से सितंबर या फरवरी से मार्च के बीच में जब वातावरण का तापमान 25 से 30 डिग्री सेल्सियस हो, तब इसके तैयार पौध की रोपाई खेत में करना होता है। अगर किसान अनार की खेती कर रहे हैं तो पौधा रोपण से लगभग 1 महीना पहले गड्ढे खोद लें। ध्यान रहे कि ये गड्ढे लगभग 60 सेमी लंबे, 60 सेमी चौड़े और 60 सेमी गहरे होने चाहिए। साथ ही इनकी सामान्यतः दूरी 4 से 5 मीटर की होनी चाहिए। अब गड्ढों को लगभग 15 दिनों तक खुला छोड़ दें। इसके बाद लगभग 20 किग्रा सड़ी हुई गोबर की खाद, 1 किग्रा सिंगल सुपर फॉस्फेट, 0.50 ग्राम क्लोरो पायरीफास का चूर्ण तैयार कर इन सभी को गड्‌ढों की सतह से 15 सेमी. ऊंचाई तक भर दें। अब इन गड्ढ़ों मे पौधों की रोपाई से पहले अनार के पौधों को क्लोरपाइरीफोस पाउडर से उपचारित कर लें। इसके बाद उपचारित पौधों को पहले तैयार गड्‌ढों में लगाकर उन्हें चारो तरफ मिट्टी से अच्छे से ढकने के लिए उँगलियों से अच्छी तरह दबा दें, ताकि जड़ क्षेत्र में हवा नहीं रहे। पौध लगाते समय खेत की मिट्टी गीली होनी चाहिए। हलकी बारिश के समय रोपण अत्यंत लाभकारी होता है।

खाद व उर्वरक की मात्रा 

अनार के 80-85 प्रतिशत पत्तियों के गिरने के एक सप्ताह बाद खाद एवं उर्वरक, पौधों की आयु के अनुसार कार्बनिक खाद एवं नाइट्रोजन, फॅास्फोरस और पोटाश का प्रयोग करें। सड़ी हुई गोबर की खाद नाइट्रोजन, फॉस्फोरस तथा पोटाश की दर को मृदा परीक्षण तथा पत्ती विश्लेषण के आधार पर उपयोग करें। खाद एवं उर्वरकों का उपयोग पौधों के नीचे चारों ओर 8-10 सेमी.गहरी खाई बनाकर देना चाहिए। नाइट्रोजन एवं पोटाश युक्त उर्वरकों को तीन हिस्सों में बांटकर पहली खुराक सिंचाई के समय या बहार प्रबंधन के बाद और दूसरी खुराक पहली खुराक के 3-4 सप्ताह बाद दें, फॉस्फोरस की पूरी खाद को पहली सिंचाई के समय दें।

अनार के पौधे की सिंचाई

अनार के पौधों को अधिक सिंचाई की आवश्यकता होती है। यदि इसके पौधों की रोपाई बारिश के मौसम में की गई है, तो इसकी पहली सिंचाई को 3 से 5 दिन के अंतराल में करना होता हैं। बारिश का मौसम हो जाने के बाद पौधों को 10 से 15 दिन के अंतराल में पानी दे। जब इसके पौधों पर फूल आने लगे उस दौरान इन्हे एक से डेढ़ महीने में पानी देना होता है। इसके पौधों की सिंचाई के लिए ड्रिप विधि को सबसे उपयुक्त माना जाता हैं। ड्रिप विधि द्वारा की गई सिंचाई से पौधों को उचित मात्रा में पानी प्राप्त हो जाता हैं। जिससे पौधा अच्छे से वृद्धि करता है।

अनार के पौधे की देखभाल

कॉट-छॉट करना - ऐसे बगीचे जहाँ पर ऑइली स्पाट का प्रकोप ज्यादा दिखाई दे रहा हो वहाँ पर फल की तुड़ाई के तुरन्त बाद गहरी छँटाई करनी चाहिए तथा ऑइली स्पाट संक्रमित सभी शाखों को काट देना चाहिए। संक्रमित भाग के 2 इंच नीचे तक छँटाई करें तथा तनों पर बने सभी कैंकर को गहराई से छिलकर निकाल देना चाहिए। छँटाई के बाद 10 प्रतिशत बोर्डो पेस्ट को कटे हुऐ भाग पर लगायें। बारिश के समय में छँटाई के बाद तेल युक्त कॉपर ऑक्सीक्लोराइड (500 ग्राम कॉपर ऑक्सीक्लोराइड और 1 लीटर अलसी का तेल) का उपयोग करें।

  • फल धब्बा - इस रोग से बचाव के लिए अनार के पौधों पर हेक्साकोनाजोल, मैन्कोजेब या क्लोरोथॅलोनील की उचित मात्रा का छिड़काव किया जाता हैं।

  • अनार की तितली - इस रोग से बचाव के लिए अनार के पौधों पर इन्डोक्साकार्ब, स्पाइनोसेडकी या ट्रायजोफास की उचित मात्रा का छिड़काव करना होता है।

  • माहू -  इस रोग से बचाने के लिए प्रोफेनोफॉस या डायमिथोएट की उचित मात्रा का छिड़काव किया जाता है। इसके अतिरिक्त यदि रोग का प्रकोप अधिक बढ़ जाता है, तो इमिडाक्लोप्रिड की उचित मात्रा का छिड़काव पौधों पर करें।

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