पराली जलाने का टिकाऊ हल: कुबोटा PRO588i-G कंबाइन हार्वेस्टर
PRO588i-G हार्वेस्टर: किसानों की आमदनी और पर्यावरण दोनों सुरक्षित
आज के समय में पराली जलाना किसानों और पर्यावरण दोनों के लिए एक बड़ी समस्या बन गया है। खासकर हरियाणा और पंजाब जैसे धान उत्पादक राज्यों में यह चुनौती और भी गंभीर है। इसी समस्या का टिकाऊ समाधान देने के लिए एस्कॉर्ट्स कुबोटा ने अपना नया कंबाइन हार्वेस्टर ‘PRO588i-G’ लॉन्च किया है। इसे विशेष रूप से किसानों की पारंपरिक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए जापान की एडवांस्ड तकनीक से तैयार किया गया है। यह आधुनिक हार्वेस्टर धान की फसल की कटाई के बाद बचे हुए अवशेषों (पराली) को खेतों में जलाने की जरूरत को खत्म करती है। यह मशीन न सिर्फ किसानों के लिए काम को आसान बनाती है, बल्कि पराली का बेहतर तरीके से प्रबंधन करके आय का एक नया रास्ता भी खोलती है। आइए, जानते हैं कि कंबाइन हार्वेस्टर ‘PRO588i-G पर्यावरण को सुरक्षित रखने और किसानों की आमदनी बढ़ाने में कैसे मददगार साबित हो सकती है।
उल्लेखनीय है कि एस्कॉर्ट्स कुबोटा लिमिटेड (ईकेएल) ने अपना नया कंबाइन हार्वेस्टर “Kubota Pro588i-G” कृषि दर्शन एक्सपो 2025 में पेश किया। यह आयोजन सिरसा रोड, हिसार स्थित उत्तरी क्षेत्र कृषि मशीनरी प्रशिक्षण एवं परीक्षण संस्थान (टीटीसी केंद्र) में हुआ।
पराली पशुओं के चारे के रूप में या बायोमास प्लांट्स में इस्तेमाल
कुबोटा ‘प्रो588i-G’ कंबाइन हार्वेस्टर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह धान की फसल को जड़ के पास से काटता है, जबकि सामान्य फुल-फीड हार्वेस्टर ऐसा नहीं कर पाते। इससे पूरा भूसा (लंबा स्टॉ) सुरक्षित रहता है और पूरी लंबाई का पुआल इकट्ठा किया जा सकता है। किसान इस पुआल का उपयोग पशुओं के चारे के रूप में या बायोमास प्लांट्स में कर सकते हैं। कुबोटा की यह नई तकनीक किसानों को पराली जलाने की जगह एक बेहतर और टिकाऊ विकल्प प्रदान करती है, जिससे उत्तर भारत में वायु प्रदूषण कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, पुआल किसानों के लिए अतिरिक्त आय का साधन भी बन सकता है।
जापानी थ्रेशिंग मैकेनिज्म से युक्त
नया कंबाइन हार्वेस्टर ‘प्रो588i-G’ विशेष जापानी थ्रेशिंग मैकेनिज्म टेक्नोलॉजी से लैस है। यह तकनीक थ्रेशिंग के दौरान बासमती चावल के नाजुक और लंबे दानों को टूटने से बचाती है। पारंपरिक हार्वेस्टरों में अक्सर दाने टूट जाते हैं, जिससे चावल का बाजार मूल्य घट जाता है। लेकिन ‘प्रो588i-G’ की उन्नत तकनीक दानों की गुणवत्ता बनाए रखती है, जिससे न केवल कीमत बेहतर मिलती है, बल्कि चावल की निर्यात क्षमता भी बढ़ती है।
खेत की मिट्टी को कोई नुकसान नहीं
‘PRO588i-G’ का वजन सिर्फ 2700 किलो है, जबकि पारंपरिक कंबाइन हार्वेस्टर्स का वजन लगभग 9000 किलो होता है। इसका मतलब है कम वजन होने से यह मशीन खेत की मिट्टी पर बहुत कम दबाव डालती है। मिट्टी का कम दबाव होने से अगली फसल के लिए जुताई का काम आसान हो जाता है और किसानों का जमीन तैयार करने का खर्च भी घटता है। इसके अतिरिक्त, इसमें क्रॉलर सिस्टम (रेंगने वाले पहियों) लगा है, जिससे यह गीले खेतों में भी आसानी से चल सकता है। खासकर धान की फसल कटाई के समय, जब खेतों में नमी अधिक होती है, वहां यह बिना फंसे बेहतर प्रदर्शन करता है। इसका एर्गोनॉमिक डिजाइन किसानों को लंबे समय तक काम करने की क्षमता प्रदान करती है और थकान को भी कम करती है।
एस्कॉर्ट्स कुबोटा के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर निखिल नंदा का बयान
एस्कॉर्ट्स कुबोटा के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर निखिल नंदा ने बताया कि हम भारत के किसानों की ज़िंदगी को बेहतर बनाने वाली नई टेक्नोलॉजी लाने के लिए हमेशा समर्पित हैं। हमारा नया कुबोटा कंबाइन हार्वेस्टर इसी का सबूत है। “हमारी यह नई मशीन न केवल किसानों के लिए मुनाफे का जरिया बनेगी बल्कि उत्तर भारत में प्रदूषण की समस्या को भी कम करने में मदद करेगी।” वहीं कंपनी के डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर अकीरा काटो ने कहा, “यह तकनीक भारतीय खेती को एक नई दिशा देगी। इससे उत्पादन बढ़ेगा, लागत घटेगी और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं होगा। यह किसानों की उत्पादकता और आमदनी बढ़ाएगा। इसी के साथ-साथ प्रिसीजन फार्मिंग के जरिए स्थायी खेती के लक्ष्यों को भी पूरा करने में मदद करेगा।“इस नई मशीन से एस्कॉर्ट्स कुबोटा कृषि उपकरण उद्योग में अपनी सफलता को और मज़बूत करेगा।”
भारतीय परिस्थितियों के अनुसार डिजाइन
एस्कॉर्ट्स कुबोटा एग्री सॉल्यूशंस बिज़नेस डिवीजन के चीफ ऑफिसर राजन चुघ ने बताया कि “PRO588i-G कंबाइन हार्वेस्टर भारतीय परिस्थितियों के अनुसार डिजाइन किया है। यह अपने वर्ग में देश की हार्वेस्टिंग टेक्नोलॉजी में काफी उन्नत है। धान की फसल के लिए एस्कॉर्ट्स कुबोटा पहले से ही विश्व-स्तरीय हार्वेस्टर्स और राइस ट्रांसप्लांटर्स के साथ अग्रणी है। इस नए उत्पाद के जुड़ने से हमारी स्थिति और भी मजबूत होगी। यह मशीन खेती को आधुनिक, पर्यावरण-संवेदनशील और आर्थिक रूप से फायदेमंद बनाने की दिशा में एक बड़ी पहल है। पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में जहां धान की खेती प्रमुख है, वहां यह मशीन किसानों को कटाई में सुविधा और लाभ देने के साथ-साथ पराली जलाने की समस्या का भी प्रभावी समाधान पेश करती है।
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